नानी का घर

बाल कहानी

राजेन्द्र श्रीवास्तव

यश और गौरव बहुत खुश थे। गर्मियों की छुट्टियों में इस बार भी वह अपनी मम्मी के साथ आज नानी के घर जा रहे हैं। ट्रेन में खिड़की से सटकर बैठे दोनों भाई बाहर के दृश्य देखकर खुश हो रहे थे। यश ने अंगूर खाते हुए कहा - ‘भाई देखो ! कितनी बड़ी नदी...’ गौरव ने सेवफल का स्वाद लेते हुए कहा - ‘हां वह देखो वहां कुछ लोग नहा भी रहे हैं।’ ‘हम लोग भी नानी के साथ यहां नहाने आएंगे’ यश ने चहकते हुए कहा। ‘यहां कैसे आएंगे, यहां से तो नानी का घर बहुत दूर है।’ गौरव ने कहा। यश का सारा उत्साह ठंडा हो गया। वह फिर बाहर के दृश्य देखने लगा। दोनों बीच-बीच में कुछ गाते-गुनगुनाते या साथ मे लेकर आये मैग्जीन्स के पन्ने पलट लेते, थोड़ा बहुत चुहलबाजी कर लेते या मम्मी से कोई फरमाइश कर बैठते। शाम होने से पहले आखिरकार वह नानी के घर पहुंच ही गये। वहां नाना-नानी, मामा-मामी सभी इन दोनों से मिलकर बहुत खुश हुए। बड़े मामाजी के दोनों बच्चे रिया और राजा तो अब एक पल को भी इनसे अलग नहीं हो रहे थे। कभी अपने खिलौने दिखाते तो कभी खाने की कोई नयी चीज लेकर आ जाते। मम्मी भी अब इन दोनों की ओर से निश्चिंत हो गयीं थीं। कभी-कभी वह भी बच्चों की ही तरह नाना से जिद करके मनचाही मिठाई व कपड़े मंगवातीं, कभी मामी के साथ किचन में कोई गीत गुनगुनातीं। कुछ दिन बड़े अच्छे बीते। लेकिन बाद में वही खेल-खिलौने खेल-खेल कर बोरियत होने लगी। सुबह और शाम तो यहां-वहां घूमने में निकल जाती, लेकिन दोपहर काटना मुश्किल हो जाता। धूप में निकलना तो बीमारी को न्यौता देना था। वैसे तो घर बहुत बड़ा था। कई कमरे और एक बड़ा आंगन भी था, लेकिन ज्यादा धमा-चौकड़ी भी तो अच्छी नहीं। एक कमरा अक्सर बंद रहता था। उस कमरे में यश और गौरव ने केवल नानी या नाना को ही जाते देखा है। नानी का खाली समय उसी कमरे में बीतता था। एक दोपहर चारों बच्चे बैठक में चुपचाप समय निकाल रहे थे। केवल यश सोफा पर बंदर जैसी उछल-कूद कर रहा था। गौरव टोक देता तो कुछ देर शांत रहता फिर वही उछल-कूद शुरू कर देता। नानी ने जब बच्चों को इस तरह उदास और बोर होते देखा तो उन्होंने यश के छोटे मामा को कुछ इशारा किया। छोटे मामा ने चारों बच्चों को साथ लिया और उस बंद कमरे का दरवाजा खोल कर उस कमरे में पहुंच गये। यश और गौरव तो उस कमरे की सजधज देखकर अचंभित रह गये। वहां बहुत सारी ‘बुक शेल्फ’ में बहुत सारी किताबें करीने से जमा कर रखी हुई थी। कुछ छोटी, कुछ मोटी, कुछ रंगीन कुछ हिंदी में तो कुछ अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में लिखी हुई थी। एक आलमारी में बहुत सारी शील्ड, कप व अन्य पुरस्कार शोभा बढ़ा रहे थे। बीच में एक टेबल और कुछ कुर्सियां भी रखीं थी। टेबल पर बच्चों की मनपसंद मैग्जीन्स भी थी। ‘मामा इतनी सारी किताबें! इन्हें कौन पढ़ता है?’ गौरव ने पूछा ‘यह तुम्हारी नानी की लाइब्रेरी है।’ मामा ने कहा। ‘नानी किस कक्षा में पढ़ती हैं? क्या उनकी भी छुट्टियां चल रही हैं?’ यश ने पूछा तो सभी एक साथ मुस्करा दिये। ‘दादी ने भी कई किताबें लिखी हैं।’ रिया ने यह नयी बात इन दोनों को बड़े गर्व के साथ बतायी। ‘हां वह कहतीं हैं कि यह किताबें ही उनकी सबसे अच्छी दोस्त हैं।’ मामा ने एक किताब के पन्ने पलटते हुए कहा। मामा ने कहा-अच्छा अब तुम यहां इन किताबों के साथ दोपहर बिताओ। यहां बहुत सारी बाल कहानी व बाल कविताओं की किताबें हैं।’ ‘मामा, हमारे लिए ड्रॉइंग के लिए स्केच पेन व शीट्स भी ला दीजिए।’ यश ने कहा।‘ हां! ला देंगे, लेकिन एक शर्त पर कि तुम अपनी कलाकारी यहां दीवारों और किताबों पर नहीं, केवल ड्रॉइंग शीट पर करोगे।’ मामा ने कहा और बाहर चले गये। बच्चे किताबों का यह नया संसार देखकर बहुत खुश हुए। अब दोपहर बिताने का एक अच्छा, सरल व ज्ञानवर्धक साधन उन सभी को मिल गया था।

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