नानाजी का इनाम

वन्दना यादव

मम्मी से ओट बनाकर नानाजी हम भाई-बहनों से गुफ्तगू कर रहे थे। मम्मी कनखियों से हमारी ओर देख भर लेती। कुछ समय बाद एकांत पाकर मम्मी ने उत्सुकता की पोटली खोली, ‘सबसे अलग बैठकर नाना से क्या बातें हो रही थी?’ भाई-बहनों में बड़ी होने के कारण उत्तर मुझे देना था। मैंने कहा-नानाजी खबर ले रहे थे कि तुम्हारे घर में चाय कितनी बाऱ बनती है और चाय का सबसे शौकीन कौन है? मैंने बता दिया कि हमारे घर में चाय तो बनती ही नहीं। न मम्मी-पापा चाय के शौकीन हैं, न हम। य़ह सुनकर नानाजी बहुत खुश हुए और बोले कि बहुत ठीक करते हो। चाय सेहत के लिए अच्छी नहीं होती, यह भूख को मारती है और....। शाम के समय नानाजी बाहर से आये और मम्मी के नाम की हांक लगाई। मम्मी उनके सामने जा खड़ी हुई तो स्टील का छोटा कनस्तर आगे बढ़ाते हुए बोले– ‘तुम्हारा इनाम। मुझे खुशी है कि मेरी ओर से दी गई हिदायत की सख़्ती से पालना कर रही हो। इन दिनों अपनी भैंस दूध नहीं दे रही, इसलिए पड़ोसी गांव के एक भरोसे के घर से घी लाया हूं। बच्चों को खिलाना, तुम लोग भी खाना।’ उस पल भावुकता की देहरी पर खड़ी मम्मी चाहकर भी कुछ न बोल सकी। इस प्रसंग ने मुझे समझा दिया कि माता-पिता का कहना मानने में बरकत ही बरकत होती है।

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