नवरात्र : दुर्गुणों पर विजय का पर्व

अम्मा अमृतानंदमयी नवरात्रि एक अवसर है सकल जगत-कारिणी, पराशक्ति की पूजा-उपासना करने का। इन नौ दिनों की पूर्णाहुति होती है विजयादशमी के दिन। ये नौ दिन व्रत-उपवास, साधना-उपासना के लिए होते हैं। आलस्य, काम-क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या-द्वेष, अधीरता व अविश्वास– ये सब दुर्गुण साधना के मार्ग में बाधाएं हैं। तप के माध्यम से इन पर विजय पाकर आध्यात्मिक पूर्णता को प्राप्त करना नवरात्रि का उद्देश्य है। हमें शिक्षा मिलती है कि जप-तप से हमें शक्ति, मांगल्य और ज्ञान की प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में हमें परमात्मा को किसी भी मनचाहे रूप में पूजने की छूट है। हम उसकी उपासना चाहे मां के रूप में करें, पिता के रूप में, गुरु रूप में, मित्र, भगवान के रूप में, यहां तक कि अपने बच्चे के रूप में भी। बस, हमारी भक्ति निष्काम हो और उसका आधार अध्यात्म हो। सांसारिक संबंधों में, मां-बच्चे का संबंध सबसे पवित्र है। बच्चे को मां के साथ पूर्ण-स्वतंत्रता का अनुभव होता है। वो जो चाहे, रो कर, ज़िद करके मांग लेता है। चाहे उसकी पिटाई भी क्यों न हो रही हो, बच्चा मां को कसकर चिपका रहता है। उसका भाव होता है, ‘मेरी मां के सिवा, मेरा कोई और ठिकाना नहीं है!’ बच्चे की परेशानी का कारण जो भी हो, उसे आराम मां की गोद में आकर ही मिलता है। हमारा भी परमात्मा के प्रति ऐसा ही भाव होना चाहिए। और मां तो धैर्य की मूरत होती ही है। उसका बच्चा कितनी भी गलतियां क्यों न करता रहे, वो माफ करती रहती है और अपना वात्सल्य बरसाती रहती है। सभी माताओं का अपने बच्चों के प्रति ऐसा ही वात्सल्य-भाव होता है। देवी-मां भी अपने सब प्राणियों पर समान रूप से प्रेम की वर्षा करती हुईं, मानव को अध्यात्म की ओर लिए चलती हैं। कई लोग प्रश्न करते हैं, ‘देवी को माया क्यों कहते हैं? माया तो हमें मोह, दुःख और बंधन में डालती है। तो यदि देवी माया है तो फिर उसकी पूजा-अर्चना क्यों करें?’ यह जगत देवी का व्यक्त-रूप है। देवी की सृजनात्मक शक्ति अपनी समस्त सृष्टि में व्याप्त है। वो शक्ति जो एकमेव शुद्ध, अनन्त चेतन शक्ति को नाम-रूप के सीमित संसार में अभिव्यक्त होने देती है, उसका नाम है माया। तो, इस मायाशक्ति के माध्यम से ही ईश्वर हमें अपने कर्मफल के भोग के योग्य बनाता है। इसी शक्ति के चलते ईश्वर हमारे सामने परमात्मा को इस प्रकार से प्रस्तुत करता है कि हमारी समझ में आ सके और हम मुक्ति पा सकें। जब हम देवी की उपासना माया के रूप में करते हैं तो हम इस सत्य को स्वीकार कर, उसे सविनय प्रणाम करते हैं। वास्तव में, माया का बंधनात्मक पहलू हमारा मन ही है, कोई बाहरी वस्तु या शक्ति नहीं। माया इस मन का मूल रूप है, जो बंधन का भी कारण है और मोक्ष का भी। एक बार एक आदमी को डकैतों ने लूट कर पेड़ के साथ बांध दिया और फिर कुएं में फेंक दिया। इस आदमी ने सहायता के लिए पुकारा तो कोई राहगीर आया और कुएं में रस्सी फेंकी, जिसे पकड़ कर वो बाहर आ गया। तो यहां देखो, एक रस्सी ने उसे बंधन में डाला तो दूसरी रस्सी ने उसकी रक्षा की। इसी प्रकार, मन हमारे बंधन और मोक्ष का कारण बनता है। जब यह सांसारिक वस्तुओं में रम जाता है तो बंधन का कारण बनता है और जब हम अपने शुद्ध-बुद्ध स्वरूप के प्रति जाग्रत हो उठते हैं तो मोक्ष का। तो मन से ही मन पर विजय पानी है। मान लो, हमारे पांव में कांटा चुभ जाये तो क्या हम उसे बाहर निकालने के लिए दूसरे कांटे का सहारा नहीं लेते? और फिर दोनों कांटों को फेंक देते हैं। इसी प्रकार, हमें अपने मन के द्वारा ही राग-द्वेष से परे जाना है और सद‍्गुणों व ज्ञान का विकास करना है। इस तरह मन द्वारा ही हमें मानसिक शुद्धि प्राप्त करनी है और फिर अपने सत्स्वरूप को जान कर मन की सीमा के पार चले जाना है। समस्त सृष्टि को परमात्म-स्वरूप जान कर, उसकी सेवा करो। इससे हम परमात्मा के कृपापात्र बन जाएंगे। यह जरा कठिन हो सकता है, लेकिन हमें कोशिश करनी चाहिए कि हमसे जितना बन पड़े, उतना करें। छोटी-छोटी चीजें जैसे मीठी-सी मुस्कान, दूसरों की गलतियों को माफ कर देना …सहायक सिद्ध होती हैं। ये सद‍्गुण किसी टॉर्च की तरह हमारी राह को रोशन कर देंगे।

(www.amrita.in से साभार)

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