धुंध में घुला ज़हर

दिसंबर व जनवरी का महीना उत्तर भारत को फॉग और स्मॉग की चादर में लपेट लेता है। यह मौसम कई बीमारियों को न्योता देता है। इस मौसम में साइकोसिस, मेनिया धुंध से डर लगने की बीमारियां अधिक होती हैं। इन बीमारियों को व्यक्ति झेल नहीं पाते और उन्हें मानसिक रोग के लक्षण दिखने लगते हैं। ऐसे में सांस की दिक्कत, खांसी, आंखों में जलन, भारीपन जैसी समस्याएं भी होती हैं। फॉग क्या है फॉग यानी कोहरा तब बनता है जब हवा में मौजूद जलवाष्प ठंडे होकर हवा में जम जाते हैं और पानी की बूंदें हवा में तैरती हैं। यह सफेद चादर की तरह हवा को ढक देती है, जिसे फॉग या कोहरा कहते हैं।

स्मॉग क्या है स्मॉग यानी कोहरे और धुएं का ऐसा कॉम्बिनेशन, जिसमें सल्फर डाइऑक्साइड, बेन्जीन जैसी खतरनाक और जानलेवा गैसें भारी मात्रा में पाई जाती हैं जो कि स्मॉग बनाती हैं। फिर फॉग से रिएक्शन करके केमिकल कंपाउंड बनाती हैं, जिससे स्मॉग बनता है।

फॉग के कारण हो सकती हैं ये परेशानियां बेल्स पाल्सी फेसियल पेरालिसिस सर्दियों में आम समस्या है। इसमें मुंह टेढ़ा हो सकता है, आंख खराब हो सकती है। कान के पास से सेवेंथ क्रेनियल नस गुज़रती है, जो तेज़ ठंड होने पर सिकुड़ जाती है। इसकी वजह से यह बीमारी होती है। इसमें मुंह टेढ़ा हो जाता है, मुंह से झाग निकलने लगती है। मरीज़ की ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है और आंख से पानी आने लगता है। खासकर ड्राइविंग करने वालों, रात में बिना सिर को ढके कहीं जाने वालों में इसका ख़तरा बढ़ जाता है। फेफड़ों में संक्रमण हवा में मौजूद प्रदूषित कण फेफड़ों में पहुंचकर उसकी कार्य क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। इससे आपको सांस की तकलीफ और घबराहट की शिकायत हो सकती है। सर्दियों में बढ़ रही धुंध से घुटन, डर, बेचैनी के लक्षण दिखने लगते हैं। मौसम परिवर्तन के कारण लोगों में उदास रहना, चिढ़चिढ़ापन, अत्यधिक सुस्ती तथा थकान जैसे लक्षण नज़र आने लगते हैं। केमिकल न्यूमोनिटिक्स धुंध की वजह से लोगों में केमिकल न्यूमोनिटिक्स या केमिकल निमोनिया की समस्या भी हो सकती है। केमिकल न्यूमोनिटिक्स केमिकल निमोनिया के नाम से भी जाना जाता है। इसका मतलब होता है कि दूषित हवा का सांस द्वारा फेफड़ों में पहुंचना। इस कारण होने वाले न्यूमोनिया को केमिकल न्यूमोनिया कहा जाता है। गठिया और मधुमेह कड़ाके की सर्दी में जोडों की समस्याएं और खास तौर पर रूमेटाइड आर्थराइटिस का प्रकोप बढ़ जाता है। ऐसे में अार्थराइटिस के मरीज़ों को बहुत ध्यान रखने की ज़रूरत होती है। बुजुर्गों और महिलाओं को इस मौसम में ज्यादा परेशानी होती है। सर्दियों में तेज़ ठंड के कारण हाइपोथर्मिया, उच्च रक्तचाप, दिल के दौरे और मधुमेह के मरीज़ भी बढ़ जाते हैं। स्ट्रोक उत्तर भारत में अधिक ठंड के कारण पक्षाघात यानी स्ट्रोक की समस्याएं अधिक होती हैं। हृदय के अलावा मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों की धमनियां भी सर्दी के सिकुड़ती हैं। इस कारण खून के प्रवाह में रुकावट आती है और रक्त के थक्के बनने की आशंका बढ़ती है। ऐसे में हृदय के अलावा मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों में स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ जाता है। जुकाम-खांसी प्रदूषण के कारण सांस लेने में परेशानी होने लगती है, जिस वजह से आपको खांसी की समस्‍या हो सकती है। धुंध आपके वायु मार्ग को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। ब्रोंकाइटिस लंबे समय तक धुंध पड़ने से ब्रोंकाइटिस की अवस्था में तबीयत और भी बिगड़ जाती है। प्रदूषण के कारण श्लेष्मा झिल्ली में सूजन हो जाती है, जिससे बहुत समस्‍या होती है।

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