दूध-दही मिलता नहीं, मिलती खूब शराब!

हरियाणा के करनाल जनपद स्थित गांव पाधा से एक सुकूनभरी खबर आई है कि विवाहोत्सव के दौरान शराब पीकर ऊधम मचाने वालों को जुर्माना लगेगा। पंचायत ने अभूतपूर्व फैसला लेकर शराब पीकर ऊधम मचाने वाले पर ग्यारह हजार जुर्माना लगाने का फैसला किया है। इतना ही नहीं, कानफोड़ू संगीत पर भी रोक लगाने का फैसला पंचायत ने किया है। अकसर देखने में आया है कि विवाहोत्सवों में शराब पीकर भड़कीले गीत-संगीत पर गुंडागर्दी करने का लाइसेंस पाना कुछ लोग अपना अधिकार समझ लेते हैं। सामान्य तौर पर विवाह को शुभकार्य मानकर लोग इसके नाम पर की जाने वाली गुंडागर्दी का विरोध नहीं करते लेकिन अब जबकि पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो पाधा गांव की पंचायत को अनूठा व आवश्यक कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा। विश्वास से कहा जा सकता है कि इससे हरियाणा की अन्य पंचायतें भी प्रेरणा लेंगी। यदि ऐसा नहीं होता तो हरियाणा की प्रगति पर अपसंस्कृति का दाग यूं ही लगता रहेगा। पंचायत की इस बात की तारीफ करनी होगी कि उसने व्यक्तिगत आज़ादी के बजाय सार्वजनिक जीवन में व्यवधान डालने वालों पर प्रतिबंध लगाने की पहल की। यानी कोई पीना चाहे तो पिये लेकिन दूसरों की आज़ादी व निजता को प्रभावित न करे। वाकई शराब पीने और सार्वजनिक जीवन में व्यवधान डालने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ रही है। इससे जहां अपराधों में वृद्धि हुई, वहीं कई तरह की दुर्घटनाओं-झगड़ों में भी इजाफा हुआ है। हरियाणा में नशाखोरी की इस घातक प्रवृत्ति पर तंज़ करते हुए हरियाणा के राजकवि उदयभानू हंस सटीक टिप्पणी करते हैं :- मदिरा के दुर्गुणों का नहीं कोई हिसाब, आस्तीन का यह सांप करे खाना-खराब। एक व्यक्ति नहीं इससे बिगड़ता केवल, परिवार को कर देती है बरबाद शराब। दूध-दही के खाने के लिए मशहूर हरियाणा में विकास व समृद्धि की बयार के साथ जो क्लब संस्कृति पनपी है उसने शराब के प्रसार में बेतहाशा वृद्धि की है। पीने वालों को तो बस पीने का बहाना चाहिए। खुशी का मौका आया नहीं कि बोतलें खुलनी शुरू हो जाती हैं। दूध-दही के प्रयोग के लिए चर्चित हरियाणा में आज शराब की नदियां बहने लगी हैं। सरकार की राजस्व जुटाने की लालसा और मुनाफे के मोटे धंधे ने इसके प्रचलन को बढ़ावा दिया है। दूध-दही मिले न मिले शराब कोने-कोने  में मिल जाएगी। शराब माफिया ने इसकी दुकानें गांव-गांव तक पहुंचा दी हैं। ग्रामीण यदि विरोध करते भी हैं तो शराब माफिया अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके गांवों की आवाज़ दबाने में कामयाब हो जाता है। शराब नई पीढ़ी को घुन की तरह खाने लगी है। इस नशे को पूरा करने के लिए शराबी अपनी जमीन व अन्य संपत्ति बेचने में भी गुरेज नहीं करते। गांवों में शराब-संस्कृति के सिर चढ़कर बोलने से व्यथित कवि रघुविन्द्र यादव सटीक बात कहते हैं :- केशव तेरे गांव की, हालत हुई खराब, दूध-दही मिलता नहीं, मिलती खूब शराब। पता नहीं इंसान ने अपने सुख-दु:ख की अभिव्यक्ति का माध्यम क्यों शराब को बना लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जो लोग शराब नहीं पीते क्या वे अपने सुख-दु:ख का इज़हार नहीं कर पाते? सुख-दु:ख का अहसास तो स्त्रियां भी करती हैं तो इसका निष्कर्ष यह निकाला जाये कि उन्हें भी इसी तरह अपनी अभिव्यक्ति देनी चाहिए? सही मायनों में हम शराब पीने का बहाना तलाशते हैं। सबसे भयावह पहलू यह है कि बच्चे भी बड़ों को देखकर इसका अनुसरण करने लगते हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि छात्रों में भी नशाखोरी की प्रवृत्ति का ग्राफ बढऩे लगा है। किसी राष्ट्र की युवा पीढ़ी का नशे से खोखला होना उसकी प्रगति पर सवालिया निशान लगाता है। डॉ. बलजीत एक कड़वे भावार्थ का बोध कराते हैं :- मदिरा में डूबी सखे, अब तक इतनी जान, डुबो न पाया आज तक, कोई सिंधु महान। वास्तव में हरियाणा में पांव पसार रही अपसंस्कृति को दूर करने की पहल ग्राम पंचायतों को ही करनी होगी। राजनेताओं के फैसले तो वोट के समीकरणों पर आधारित रहते हैं। इस दिशा में खाप-पंचायतें न केवल हरियाणा बल्कि सारे देश को रचनात्मक संदेश दे सकती हैं। आज हरियाणा खेल से लेकर विकास के दस्तावेजों में नई इबारतें लिख रहा है। लेकिन कतिपय सामाजिक विद्रूपताएं उसकी ख्याति के चांद पर दाग लगा रही है। अब चाहे ऑनर किलिंग के मामले हों, भू्रणहत्या व लिंगानुपात की गहराती खाई हो अथवा पांव पसारती शराब-संस्कृति हो, ग्राम पंचायतों को रचनात्मक आंदोलन करने की जरूरत है। गांवों से उठी बदलाव की बयार पूरे प्रदेश की आवाज़ बन सकती है, बशर्ते ईमानदार आगाज़ हो सके। कमोबेश, यही स्थिति नशाखोरी की बढ़ती प्रवृत्ति की है। स्वयंसेवी संगठन इसमें निर्णायक भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। सदियों पहले कबीर भी शराब के अवगुणों के बारे में बता चुके हैं :- अवगुण कहूं शराब का, आपा अहमक होय, मानुष से पशुआ भया, दाम गांठ से खोय। हकीकत यह है कि सरकारों के दोगले व्यवहार के कारण शराबखोरी की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। भारी राजस्व की लालसा में देसी-विदेशी शराब के कारोबार के लिए दरवाजा खोलने वाली सरकारों ने भारत को मदिरापान का खुला बाजार बना दिया है। माना कि शराब से सरकार को मोटी आय होती है, लेकिन कितनी बड़ी कीमत देश को चुकानी पड़ती है? फिर इससे होने वाली बीमारियों पर सरकारी अस्पतालों पर सरकार को कितना पैसा खर्च करना पड़ता है? हमारे तथाकथित नायक, मसलन फिल्मों के कलाकार व क्रिकेटर निर्लज्जता से शराब का विज्ञापन करके इसे महिमामंडित करते हैं। काश! ये सचिन से सबक लेते जिसने 20 करोड़ के विज्ञापन इसीलिए ठुकरा दिये थे। जनता को राजनेताओं को कवि शायक के शब्दों में समझाना चाहिए :- तेरे नगर में मदिरा की नदियां झरझर बहती हैं, मेरे गांव में आकर देख, सूखा जोहड़ पायेगा।

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