दूध की ‘सेहत’ खराब

अभिषेक कुमार सिंह इसमें कोई शक नहीं कि दूध पूरा इंडिया पीता है। इसका ब्रांड कौन-सा है? इसे दूधवाला (मिल्कमैन) लाता है या बूथों से इसकी सप्लाई घरों तक होती है, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जिस देश में दूध, दही और घी की नदियां बहने की कल्पना की गई उसका दूध उत्पादन में नंबर वन होना स्वाभाविक है। हालांकि, आश्चर्य तब होता है, जब पता चलता है कि देश में बिक रहा 50 फीसदी से ज्यादा दूध नकली और मिलावटी है और इसे पीने वालों की सेहत बनती नहीं, बिगड़ती है। जब देश की बड़ी आबादी को दूध बड़ी मुश्किल से मिल पा रहा हो और वह मिलावटी हो तो सरकार व आम लोगों की चिंता समझी जा सकती है। सवाल यह है कि आखिर दूध में मिलावट क्यों नहीं रुक पा रही है? क्या इसकी वजह दूध उत्पादकों का लालच है या कुछ और? दूध में मिलावट की चिंता हाल ही में उस समय बढ़ गई जब, खाने-पीने की वस्तुओं के मानक तय करने वाली सरकारी संस्था सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) ने सर्वे के आधार पर दावा किया कि प्रोसेस्ड और कच्चे दूध के नमूनों में से 50 फीसदी दूध मानकों के मुताबिक नहीं था। हालांकि, एफएसएसएआई का मानना है कि इनमें से सिर्फ 10 फीसदी को स्वास्थ्य के लिए घातक दूध की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन 39 प्रतिशत में पानी या अन्य चीजों की मिलावट थी। इसमें भी प्रोसेस्ड दूध (यानी जिस दूध को बड़ी कंपनियां प्रोसेस करके घरों तक पहुंचाती हैं) के 46.8 प्रतिशत नमूने मानकों पर फेल हो गए और इसी में 17.3 फीसदी सेहत के लिए हानिकारक थे। इसके मुकाबले कच्चे दूध के 45.4 प्रतिशत नमूने तय मानकों के अनुरूप नहीं थे और उनमें 4.9 फीसदी हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने वाले थे। यही नहीं अक्तूबर 2018 में एनिमल वेलफेयर बोर्ड की रिपोर्ट में भी देश में 68.7 प्रतिशत दूध और दूध उत्पादों को उनमें मौजूद दूषित तत्वों के कारण नुकसानदेह बताया गया था। गौरतलब है कि एफएसएसएआई ने नवंबर 2018 में 'राष्ट्रीय दुग्ध गुणवत्ता सर्वे 2018' की जो अंतरिम रिपोर्ट जारी की है, उसमें देशभर से 6432 नमूने लिए गए। इसे अब तक का सबसे बड़ा अध्ययन कहा गया है। सर्वे के दौरान दूध में 13 तरह की मिलावटों की जांच की गई। इनमें वनस्पति तेल, डिटर्जेंट, ग्लूकोज, यूरिया और अमोनियम सल्फेट शामिल हैं। दूध के नमूनों में एंटीबायोटिक अवशेष, कीटनाशक अवशेष और एफ्लैटॉक्सिन एम-1 की मिलावट की भी जांच की गई। सर्वे में यह तथ्य भी सामने आया कि दूध में वसा (फैट) और ठोस गैर वसा (एसएनएफ) मानक के अनुरूप नहीं हैं। ऐसा उन्हीं नमूनों में पाया गया, जो सीधे दूधवालों से लिए गए। प्रोसेस्ड दूध अपेक्षाकृत सही पाया गया। एंटीबायोटिक अवशेष के मामले में केवल 1.2 फीसद नमूने फेल हुए। इसकी वजह मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली आक्सी-टेट्रासाइक्लिन है। अलग-अलग राज्य भी अपने स्तर पर बताते रहे हैं कि वहां किस पैमाने पर नकली और मिलावटी दूध बेचा जा रहा है। जैसे, सर्विंग इन ऑर्गेनाइजेशन इन लीगल इनिशिएटिव संस्था की ओर से दाखिल एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यूटी प्रशासन ने माना है कि चंडीगढ़ में 60 फीसदी लोगों को मिलावटी दूध परोसा जा रहा है। हालांकि, पंजाब में मिलावटी दूध, पनीर और खोये के खिलाफ 'तंदुरुस्त पंजाब' नाम से एक मुहिम चलाई जा रही है। फिर भी आंकड़े साबित करते हैं कि हर दस में से 6 लोगों को मिलावटी दूध मिल रहा है। अगर अंदाजे को राष्ट्रीय फलक पर फैलाया जाए तो अनुमान है कि देश में हर रोज 15 करोड़ लोग मिलावटी दूध पी रहे हैं। यह आंकड़ा इस तरह निकलकर सामने आया है कि देश में 14 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है, लेकिन खपत 65 करोड़ लीटर की है। उत्पादन और खपत के बीच करीब 50 करोड़ लीटर के इस बड़े अंतर से सवाल उठता है कि मांग कैसे पूरी होती है। तो इसका जवाब है मिलावट खोरी। क्यों हो रही मिलावट दूध में मिलावट की 2 मुख्य वजहें हैं। पहली, यह कि दूध व्यापारी सिर्फ अपनी कमाई की चिंता करते हैं। उन्हें इनसानी जान की कोई परवाह नहीं है। चूंकि पानी की मिलावट वाला दूध पतला होने के कारण आसानी से पकड़ में आ जाता है और बिक नहीं पाता, इसलिए कई व्यापारी सिंथेटिक दूध बनाने लगते हैं। इसे पकड़ना थोड़ा मुश्किल है। दूसरा, मांग और सप्लाई में भारी अंतर। देश में दूध की बढ़ती मांग की पूर्ति नहीं हो पा रही है। इस मांग को मिलावटी और सिंथेटिक दूध से पूरा किया जा रहा है। यही वजह है कि मिलावटी दूध की रोकथाम के लिए कड़े कानून के साथ दूध के उत्पादन और सप्लाई के लिए एक समग्र नीति की मांग की जाती रही है। जहां तक सवाल कड़े कानूनों से दूध की मिलावट रोकने का है, तो इस बारे में अब तक जो अनुभव रहा है- वह बहुत उम्मीद नहीं बंधाता। सच तो यह है कि खाने-पीने की चीजों में मिलावट को प्रशासन ने कभी गंभीरता से लिया ही नहीं है। कहने को कुछ छापेमारी होती है, निचले स्तर के कुछ कारोबारी और कर्मचारी पकड़े जाते हैं, लेकिन यह जाल कभी पूरी तरह टूट नहीं पाता। प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन एक्ट, 1954 के तहत फूड इंस्पेक्टर को यह अधिकार है कि वह कहीं भी जाकर खाने-पीने की चीजों की जांच कर सकता है। लेकिन यह कानून नाकाफी साबित हुआ और वर्ष 2006 में इसकी जगह फूड सेक्रटी एंड स्टैंडर्ड एक्ट लाया गया। लेकिन खाद्य पदार्थों में मिलावट का कारोबार अब उससे भी आगे निकल गया है। एक वजह यह भी है कि देश में खानपान की जांच करने वाला तंत्र काफी कमजोर है और उसकी व्यवस्थाएं नाकाफी हैं। जैसे देश में एफएसएसएआई के कुल 3,500 फूड इंस्पेक्टर हैं, जबकि 33 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में 14,200 फूड इंस्पेक्टर हैं। इसी तरह हमारे पूरे देश में एफएसएसएआई की कुल 213 टेस्टिंग लैब्स हैं। साफ है कि आबादी और कारोबार की विशालता के आगे ये इंतजाम बौने पड़ जाते हैं। न ही स्थापित कानून ठीक से लागू हो पाते हैं और न ही मिलावट करने वालों को सजा मिल पाती है। ऐसे जानें मिलावटी है क्रोमोथेरेपी और स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक का इस्तेमाल करके दूध में मिलावट का पता लगाया जाता है, लेकिन सामान्य तौर पर ऐसी तकनीकों के लिए महंगे उपकरणों की आवश्यकता होती है। इसकी बजाय कुछ प्रचलित तरीके हैं जिनसे दूध में मिलावट को पता लग जाता है। 0 मिलावट होने पर दूध का रंग हल्का पीला दिखाई देता है 0 गर्म करने पर हल्का लाल या पीला हो जाता है 0 सिंथेटिक दूध में दूध जैसी गंध नहीं आएगी 0 हथेली पर दूध लेकर रगड़ने से झाग निकलता है 0 लैक्टोमीटर से पानी की मिलावट जांची जा सकती है स्मार्ट फोन एप से भी आईआईटी हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन आधारित एक प्रणाली विकसित की है। इससे स्मार्टफोन में लगा डिटेक्टर सिस्टम एक सेंसर स्ट्रिप (संकेतक पेपर) का इस्तेमाल करके दूध में मिलावट का पता लगाया जा सकता है। सेंसर स्ट्रिप दूध में मौजूद अम्लता के मुताबिक अपने रंग में बदलाव करती रहती है। मिलावट जानने के लिए इस सेंसर स्ट्रिप को दूध में डुबोया जाता है। अगर दूध में किसी भी तरह की मिलावट होगी तो इसका रंग बदल जाएगा। खास बात यह है कि यह सेंसर सिर्फ एसिडिक चीजों के संपर्क में आने पर ही अपना रंग बदलती है। सेंसर को दूध में डुबोने के बाद जब स्मार्टफोन से स्ट्रिप की फोटो ली जाएगी तो इसका डेटा पीएच में बदल जाएगा। इससे दूध में उपस्थित सोडा, बोरिक अम्ल, यूरिया, पानी और शर्करा का पता चल सकेगा। हालांकि दावा है कि वैज्ञानिकों ने परीक्षण में इससे 99.71 फीसदी सटीक नतीजे हासिल किए हैं। पशु कल्याण बोर्ड के मुताबिक यह तकनीक लोगों के बहुत काम आ सकती है। शुद्धता के लिए अभियान हाल ही में, 26 नवंबर को 'नेशनल मिल्क डे' के मौके पर एक संस्था मूफॉर्म ने डेयरी कारोबार से जुड़े 2 लाख किसानों को 'दूध कितना सफेद है' नामक अभियान से जोड़ने की पहल की है। इसमें दूध की शुद्धता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत पंजाब के संगरूर में 4 हजार किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है। जल्द ही हरियाणा व यूपी में 9 हजार से अधिक किसानों को मूफॉर्म प्रशिक्षित करेगी। मिलावट कैसी-कैसी दूध में पानी मिलाना ताे शायद सदियों से चला आ रहा है, लेकिन मिलावट के कई घातक किस्से भी हैं। जैसे मार्च 2016 में संसद में प्रश्नकाल के दौरान यह जानकारी दी गई थी कि देश में जिस दो तिहाई (68 फीसदी) से ज्यादा दूध को मानकों पर सही नहीं पाया गया था, उसमें डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, ग्लूकोज, सफेद पेंट और रिफाइंड तेल आदि की मिलावट की गई थी। मिलावटी दूध से गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। 5 साल पहले वर्ष 2013 में दूध में मिलावट से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि मिलावटी दूध का धंधा करने वालों के लिए उम्रकैद की सजा होनी चाहिए। अदालत ने राज्य सरकारों को कानून में आवश्यक संशोधन करने की भी सलाह दी थी। यूपी, प. बंगाल और ओड़िशा ने मिलावटी दूध पर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया हुआ है। हालांकि, ज्यादातर राज्यों में इसके लिए अधिकतम 6 महीने की सजा का प्रावधान है। सजा के बावजूद इस धंधे पर रोक नहीं लग पाई है। कितनी खतरनाक डाक्टर बताते हैं कि दो साल तक लगातार मिलावटी दूध पीने से आंत, लिवर और किडनी जैसी जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं। यह नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि दूध में मिलावट कैसी है। अगर दूध बैक्टीरिया की वजह से दूषित हुआ है तो फूड पॉयजनिंग, पेट दर्द, डायरिया, आंतों का इंफेक्शन, टाइफाइड, उल्टी-दस्त हो सकते हैं। दूध में कीटनाशक या कैमिकल्स की मिलावट है तो इसका पूरे शरीर पर लंबे समय के लिए बुरा प्रभाव पड़ता है। दूध में कुछ ऐसे रसायनों की मिलावट भी होती है, जिसका सेवन 10 साल या इससे अधिक समय तक किया जाए तो कैंसर होने की आशंका भी रहती है। दूध को पॉश्चराइज्ड करके सेहत को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है। यदि प्रोसेस्ड दूध भी मिलावटी हो तो इसमें बहुत ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। हालांकि, टेट्रा पैक वाले दूध को प्रमुखता देकर कुछ हद तक इससे बचा जा सकता है।

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