दादी का चश्मा

सरोज गुप्ता

पिछले सप्ताह पारुल की दादी का चश्मा टूट गया और तब से वो बहुत परेशान थी। सुबह पूजा के समय वो प्रतिदिन गीता और सुन्दर कांड का पाठ करती थी पर अब बिना चश्मे के पढ़ना सम्भव न था। दो-तीन दिन पहले उन्होंने बेटे से कहा भी था कि बेटा-मेरा चश्मा बनवा दे। मैं अपना पाठ नहीं कर पाती हूं तथा दूर का भी कुछ दिखाई नहीं देता है। इस पर बेटे ने उत्तर दिया—मां ! अभी कुछ दिन ठहरो। इस बार राहुल की फीस अधिक देनी पड़ी है तो हाथ जरा तंग हो गया है। पहली तारीख के बाद जरूर बनवा दूंगा। मुझे तुम्हारी परेशानी पता है पर मजबूरी है। मां बेटे की बात सुनकर चुप हो गई। चार दिन के बाद की बात है। दादी मां ने पूजा समाप्त करके जैसे ही आंखें खोलीं कि अचानक उनकी पोती पारुल ने पीछे से आकर उनकी आंखों पर चश्मा पहना दिया। चश्मा लगते ही मानो उनका तो दिन निकल आया। एकदम हैरान होकर बोली—अरे, तू यह कहां से ले आई? -दादी मां! मुझे जो चार सौ रुपये इनाम के मिले थे, उन्हीं में से यह चश्मा लाई हूं। आप इसके बिना बहुत परेशान थीं न। आप उस दिन पापा से कह रही थीं तो पापा ने अगले महीने के लिए कह दिया था क्योंकि उनके पास भी पैसे नहीं थे। मैंने सोचा कि इनाम के पैसों का इससे अच्छा उपयोग और भला क्या हो सकता है कि मेरी दादी की समस्या दूर हो जाए। मैने पापा से आपके चश्मे की पर्ची ले ली और खुद ही इसे बनवा लाई। बताइए आपको पसंद तो आया ना? दादी तो निहाल हो गई। चश्मा उतार कर आंखें पोंछी और पोती को गले से लगा लिया।

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