दवा से मुनाफे का बेरहम कारोबार

पिछले दिनों सैल टेक्नोलॉजी में काम करने के लिए वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिला है। बताया जा रहा है कि उनकी खोज से पता चला कि सैल आक्सीजन के साथ कैसे रिएक्ट करते हैं। इससे रक्ताल्पता (एनीमिया) और कैंसर के इलाज में सफलता मिलेगी। अच्छा है कि ऐसा हो कि कैंसर जैसी बीमारी से लड़ाई आसान हो। साथ ही इसका इलाज अत्यधिक महंगा न होकर सस्ता हो, जिससे कि गरीब आदमी की भी जान बच सके। कैंसर से निपटने के लिए अक्सर हम विज्ञापन देखते हैं कि कैंसर लाइलाज नहीं है। मगर, यह कोई नहीं बताता कि कैंसर का इलाज करवाते-करवाते आदमी कंगाल हो जाता है। उसके बर्तन-भांडे तक बिक जाते हैं, मगर अधिकांश मामलों में वह पूरी तरह ठीक नहीं होता। बीमारी कभी भी लौटकर उसे अपनी जकड़न में ले लेती है। सालों पहले इस लेखिका ने एक डाक्टर के बारे में एक पत्रिका में पढ़ा था, जिसे कैंसर हुआ था। उसने अपनी पत्नी से आग्रह किया कि वह इसका इलाज नहीं कराना चाहता क्योंकि उसे पता था कि जो भी थोड़ी बहुत बचत है वह बेहद महंगे इलाज में लग जाएगी और उसके जाने के बाद परिवार का क्या होगा। इस लेखिका की एक परिचित महिला बहुत युवा अवस्था में कैंसर से प्रभावित हुई। इलाज कराते-कराते अंत में यह हालत हुई कि शरीर पर कीमोथेरैपी ने भी काम करना बंद कर दिया। कुछ ही सालों में उसके आठ आपरेशन हुए, मगर वह बच न सकी और परिवार का पैसा इतना खर्च हुआ कि रोटी के भी लाले पड़ गए।

क्षमा शर्मा

सच तो यह है कि कैंसर दवा बनाने वाली कम्पनियों के लिए बहुत फायदे का सौदा है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि अमेरिका तक में डाक्टरों ने उन लोगों को कैंसर बता दिया, जिन्हें कैंसर था ही नहीं। पिछले दिनों फेसबुक पर एक मुहिम चली थी, जिसमें कहा गया था कि कैंसर कुछ नहीं है, सिवाय विटामिन 17 की कमी के। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा कि अरसा पहले स्कर्वी रोग विटामिन-सी की कमी के कारण, बहुत जानलेवा होता था। लेकिन अब इसका नाम भी कहीं सुनाई नहीं देता। मशहूर पत्रकार आलोक तोमर कैंसर का शिकार हुए थे। उन्होंने एक वेबसाइट पर पूरी सीरीज लिखी थी कि कैसे कैंसर की दवाओं के नाम पर ग्राहक या मरीज को लूटा जाता है। यह सब अस्पतालों, दवा बनाने वाली कम्पनियों और डाक्टरों की मिलीभगत के कारण होता है। वैज्ञानिक खोजों का वह जमाना जा चुका है, जब खोजें मनुष्य के भले के लिए हुआ करती थीं। किसी भी रोग का खात्मा करने के बारे में सोचा जाता था। मैडम क्यूरी ने रेडियम की खोज की थी। मगर अपनी इस खोज को उन्होंने मानवता की भलाई के लिए समर्पित कर दिया। आज ऐसा नहीं है। हर शोध के पीछे अक्सर कोई न कोई कारपोरेट खड़ा रहता है। उसके निहित स्वार्थ होते हैं। बहुत से मामलों में वैज्ञानिकों को पहले से यह तक बता दिया जाता है कि उन्हें कौन से निष्कर्ष निकालने हैं। इसके पीछे कम्पनी के उत्पादों को लोकप्रिय करने और उनसे मुनाफा कमाने की ख्वाहिश रहती है। अब दवा बनाकर कोई मानवता की सेवा नहीं करना चाहता। वे दवा से केवल मुनाफा और मुनाफा कमाना चाहते हैं—नाम भले ही लोगों की सेवा का हो। पिछले दिनों एक बहुत बड़ी अमेरिकी कम्पनी के सीईओ ने कहा था कि उसकी चिंता कंज्यूमर या मरीज नहीं, उसके अपने शेयर होल्डर्स हैं, जिनके मुनाफे का ध्यान उसे हर हाल में रखना है। इन महाशय ने अपनी दवाओं की कीमत सैकड़ों गुना बढ़ा दी। जब आलोचना हुई तो बिल्कुल न शरमाए न दवाओं की कीमतें कम कीं। इस आदमी को अमेरिका में मोस्ट हेटेड मैन कहा जाता है। सालों पहले डॉ. विनिक टाइप वन डायबिटीज पर काम कर रहे थे। उन्होंने इन गैप नाम से जीन थेरैपी खोजी। उनका कहना था कि इससे टाइप वन को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। उनकी इस रिसर्च में इंसुलिन बनाने वाली एक बहुत बड़ी कम्पनी आर्थिक मदद कर रही थी। जब डॉ. विनिक कम्पनी के कर्ता-धर्ता के पास पहुंचे और उन्हें अपनी खोज के बारे में बताया तो कर्ता-धर्ता साहब बोले कि अगर आपकी खोज से टाइप वन ठीक हो गई तो हमारा बनाया इंसुलिन कौन खरीदेगा। हम क्या करेंगे। इसके बाद डॉ. विनिक के काम को पूरी तरह से रोक दिया गया। सोचिए, अगर डायबिटीज की यह दवा बन जाती तो कितने बच्चे इस रोग से मुक्त हो जाते। टाइप वन डायबिटीज अक्सर बच्चों को होती है और जीवनभर उन्हें इंसुलिन लेना पड़ता है। तरह-तरह के दुष्प्रभाव होते हैं, वे अलग। दवा बनाने वाली कम्पनियों को मालूम है कि बीमार मनुष्य और उसके घर वाले उसे किसी भी कीमत पर ठीक करना चाहते हैं। इसीलिए वे मनमाफिक दाम बढ़ाती हैं। कई बार तो दाम लागत के मुकाबले सैकड़ों गुना अधिक होते हैं जैसा कि आलोक तोमर ने लिखा था। ये कम्पनियां इतनी सम्पन्न और ताकतवर हैं कि किसी को भी ठिकाने लगा देती हैं। बड़े-बड़े राजनेताओं के इनमें शेयर्स होते हैं। इसका फायदा भी इन्हें मिलता है। किसी भी विरोध को राजनीति की शक्ति के जरिए दबा दिया जाता है। तरह-तरह के रसायनों के इस्तेमाल और उद्योग ने जो अलामतें दुनिया को सौंपी हैं, उनका खमियाजा गम्भीर रोगों के रूप में लोगों को भुगतना पड़ता है। कैंसर उन्हीं बीमारियों में से एक है। कम्पनियां नित नई दवा तो बनाती हैं, मगर वे इस रोग के खात्मे के लिए शायद ही कुछ करती हैं। सरकारों की दिलचस्पी भी ऐसी रिसर्च में नहीं होती। आदमी क्या करे। कहां जाए। पहले जहां सोचता था कि अस्पताल में जाएगा तो ठीक होकर आएगा। मगर अब अस्पतालों के वे किस्से भी आम हो चले हैं, जहां मरीज के आते ही उसकी जेब किस-किस प्रकार से ढीली की जाए, यह सोचा जाता है। बहुत से बड़े अस्पतालों का नाम भी ऐसी कारगुजारियों में आता रहता है। हाल ही में एक अखबार ने अस्पताल, प्रबंधन, दवा बनाने वाली कम्पनियों और डाक्टरों की मिलीभगत पर कई दिन तक एक सीरीज छापी थी। पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते थे। जिन अस्पतालों को मंदिर और जिन डाक्टरों देवता मानकर बीमार लोग वहां जाते हैं, लेकिन इलाज के नाम पर उनका भरोसा कैसे तोड़ा जाता है, कैसे उन्हें लूटा जाता है, इसके किस्से आए दिन आते रहते हैं। मगर, इस तरह की मुनाफाखोरी पर कोई लगाम नहीं लगाई जाती है।

लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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