तप-त्याग और भक्ति के चारधाम

केदारनाथ केदारनाथ

योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ चारधाम भारत के चार धार्मिक स्‍थलों का एक समूह है। इस पवित्र परिधि के अंतर्गत भारत के चार दिशाओं के महत्‍वपूर्ण मंदिर आते हैं। ये चार मंदिर हैं- जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारिका और बद्रीनाथ। इन मंदिरों को 8वीं शती में आदि शंकराचार्य ने एक सूत्र में पिरोया था। इसके अलावा ‘छोटे चारधाम’ का  हिंदू धर्म में अपना अलग और महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। हिमालय की गोद में बसे चार तीर्थस्‍थलों- केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को ‘छोटे चारधाम’ कि संज्ञा दी गई है। धर्मग्रंथों के अनुसार ये हिंदुओं के सबसे पवित्र स्थलों में शामिल हैं। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि यहां का दर्शन करने वालों के न केवल इस जन्म के पाप धुल जाते हैं, बल्कि वे जीवन-मरण के बंधन से भी मुक्‍त हो जाते हैं। इन चार धामों के संबंध में यह भी कहा जाता है कि यही वही स्‍थल है, जहां पृथ्‍वी और स्‍वर्ग एकाकार होते हैं। तीर्थयात्री इस यात्रा के दौरान सबसे पहले यमुनोत्री (यमुना) और गंगोत्री (गंगा) का दर्शन करते हैं और यहां से पवित्र जल लेकर भगवान शिव के धाम ‘केदारेश्वर’ पर जलाभिषेक करते हैं और अाखिर में भगवान विष्णु के प्रतीक बद्रीनाथ धाम की यात्रा करते हैं। उत्तराखंड राज्य में स्थित इन चारों धाम की यात्रा कुछ समय पूर्व तक तो अत्यंत कठिन हुआ करती थी, लेकिन अब सुविधाएं बढ़ने और सड़कों की स्थिति अच्छी हो जाने के कारण पहले के मुकाबले सुगम हो गई है। परंपरागत तौर पर इस यात्रा का मार्ग है- हरिद्वार- ऋषिकेश- देव प्रयाग- टिहरी- धरासु- यमुनोत्री- उत्तरकाशी- गंगोत्री- त्रियुगनारायण- गौरीकुंड- केदारनाथ। यात्रा का यह मार्ग हिंदू धर्म में होने वाली पवित्र परिक्रमा के समान है। केदारनाथ जाने के लिए दूसरा मार्ग ऋषिकेश से होते हुए देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, अगस्‍तमुनि, गुप्‍तकाशी और गौरीकुंड से होकर भी जाता है। केदारनाथ के समीप ही पवित्र नदी मंदाकिनी का उद्गम स्‍थल है। यह मंदाकिनी नदी रुद्रप्रयाग में पहुंच कर अलकनंदा नदी में मिलती है। यमुनोत्री p2 copyहिमालय में  बंदरपूंछ के पश्चिमी छोर पर पवित्र यमुनोत्री का मंदिर स्थित है। परंपरागत रूप से यमुनोत्री ही चारधाम यात्रा का पहला पड़ाव है। जानकी चट्टी से लगभग छह  किलोमीटर की चढ़ाई के बाद यमुनोत्री पहुंचा जा सकता है। माना जाता है कि यहां स्थित यमुना मंदिर का निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं शताब्दि में करवाया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार यमुना सूर्य-पुत्री हैं और यम उनके भाई हैं। यही वजह है कि यमुना में श्रद्धापूर्वक स्नान करने वालों के साथ यम कभी सख्ती नहीं बरतते। यमुना का उदगम स्थल यमुनोत्री से लगभग एक किलोमीटर दूर 4,421 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर है। यमुनोत्री मंदिर के समीप गर्म पानी के कई कुंड हैं। इनमें सूर्य कुंड प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि अपनी बेटी को आशीर्वाद देने के लिए भगवान सूर्य ने गर्म जलधारा का रूप धारण किया। श्रद्धालु इसी कुंड में चावल और आलू कपड़े में बांधकर कुछ मिनट तक छोड़ देते हैं, जिससे यह पक जाते हैं। तीर्थयात्री पके हुए इन पदार्थों को प्रसाद स्वरूप घर ले जाते हैं। सूर्य कुंड के नजदीक ही एक शिला है, जिसे 'दिव्य शिला' कहा जाता है। तीर्थयात्री यमुना जी की पूजा करने से पहले इस दिव्य शिला का पूजन भी करते हैं। इसके नजदीक ही 'जमुना बाई कुंड' है, जिसका निर्माण आज से कोई सौ साल पहले हुआ था। इस कुंड का पानी हल्का गर्म होता है, जिसमें स्नान किया जाता है। गंगोत्री p3 copyपावन गंगोत्री धाम समुद्र तल से 9,980 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह गंगा का उदगम स्थल है। ऐसा माना जाता है कि 18वीं शती  में गोरखा कैप्टन अमर सिंह थापा ने आदि शंकराचार्य के सम्मान में गंगोत्री मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर भागीरथी नदी के बाएं किनारे पर स्थित सफेद पत्थरों से निर्मित है। इसकी ऊंचाई लगभग 20 फीट है। मंदिर बनने के बाद राजा माधोसिंह ने 1935 में इसका जीर्णोद्धार किया। फलस्वरूप मंदिर की बनावट में राजस्थानी शैली की झलक मिलती है। मंदिर के समीप वह 'भागीरथ शिला' है, जिसपर राजा भागीरथ ने बैठकर गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस मंदिर में देवी गंगा के अलावा यमुना, भगवान शिव, देवी सरस्वती, अन्नपूर्णा और महादुर्गा की भी पूजा की जाती है। गंगोत्री से लिया गया गंगा जल केदारनाथ और रामेश्वरम के मंदिरों में भी अर्पित किया  जाता है। केदारनाथ p4भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ समुद्र तल से 11,746 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदाकिनी नदी के उदगम स्थल के ऊपर है। यमुनोत्री से केदारनाथ के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिषेक को हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है। यह तीर्थ ‘त्याग की भावना’ का भी प्रतीक है। वायुपुराण के अनुसार भगवान विष्णु मानव जाति की भलाई के लिए पृथ्वी पर निवास करने आए। उन्होंने बद्रीनाथ में अपना पहला कदम रखा। इस जगह पर पहले भगवान शिव का निवास था, लेकिन उन्होंने नारायण के लिए इस स्थान का त्याग कर दिया और केदारनाथ में निवास करने लगे। पौराणिक ‘पंच केदार यात्रा’ में केदारनाथ को अहम स्थान प्राप्त है। यह वही स्थान है, जहां आदि शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु में समाधि में लीन हुए थे। केदारनाथ मंदिर न केवल अध्यात्म के दृष्टिकोण से, बल्कि स्थापत्य कला में भी अन्य मंदिरों से भिन्न है। यह मंदिर ‘कात्युरी शैली’ में बना हुआ है। इसके निर्माण में भूरे रंग के बड़े पत्थरों का प्रयोग बहुतायत में किया गया है। इसकी छत लकड़ी की बना हुई है, जिसके शिखर पर सोने का कलश रखा हुआ है। मंदिर के बाहरी द्वार पर पहरेदार के रूप में नंदी की विशालकाय मूर्ति है।  यहां भगवान गणेश,  ऋद्धि-सिद्धि, पार्वती, विष्णु, लक्ष्मी, कृष्ण, कुंती, द्रौपदि, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की भी पूजा की जाती है। बद्रीनाथ p5 copyचारधाम यात्रा का अंतिम पड़ाव बद्रीनाथ हिमालय के  नर और नारायण नामक पर्वतों के मध्य स्थित है। यह समुद्र तल से 10,276 फीट की ऊंचाई पर है। अलकनंदा नदी इस मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगाती है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु इस स्थान पर ध्यानमग्न रहते हैं। लक्ष्मीनारायण को छाया प्रदान करने के लिए देवी लक्ष्मी ने ‘बेर’ (बदरी) के पेड़ का रूप धारण किया। नारद मुनि जो इन दोनों के अनन्य भक्त हैं, उनकी आराधना भी यहां की जाती है। कालांतर में जो मंदिर बना हुआ है, उसका निर्माण दो शताब्दी पहले गढ़वाल के राजा ने कराया था। यह मंदिर ‘शंकुधारी शैली’ में बना हुआ है। इसकी ऊंचाई लगभग 15 मीटर है, जिसके शिखर पर गुंबद है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण वैदिक काल में हुआ था, जिसका पुनरुद्धार बाद में आदि शंकराचार्य ने 8वीं शती में किया। इस मंदिर में नारायण के अलावा देवी लक्ष्मी, शिव-पार्वती और गणेश समेत 15 मूर्तियां हैं। मंदिर के तीन भाग हैं- गर्भगृह, दर्शन मंडप (पूजा करने का स्थान) और सभा गृह (जहां श्रद्धालु एकत्रित होते हैं)। वेदों और ग्रंथों में बद्रीनाथ के संबंध में कहा गया है, 'स्वर्ग और पृथ्वी पर अनेक पवित्र स्थान हैं, लेकिन बद्रीनाथ इन सभी में अग्रगण्य है।'

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