जीवन मूल्यों के संवर्धक महर्षि वाल्मीकि

जयंती आज रामायण के विभिन्न पात्रों के जरिये दिखाई जीने की राह

अनुपम कुमार

महर्षि वाल्मीकि का व्यक्तित्व समाज के लिए कई रूपों में प्रेरणास्रोत है। समाज में जब हृदय परिवर्तन की बात की जाती है, तो सबसे पहले वाल्मीकि को याद किया जाता है। प्रेम में मग्न क्रौंच पक्षी के वध को देखकर, उसके दुख से दुखी होकर, जिस तरह की जिंदगी को उन्होंने अपनाया, वह हृदय परिवर्तन की बड़ी मिसाल के रूप में पेश की जाती है। किंवदंतियों के अनुसार वाल्मीकि का शुरुआती जीवन महर्षियों जैसा नहीं था। लेकिन बाद में जीवन में ऐसी परिस्थितियां आयीं कि उनके भीतर ईश्वरत्व जागा। जीवन में इस परिवर्तन के बाद ही आज उन्हें भारतीय समाज भगवान का दर्जा देता है। आदि काव्य के रूप में संस्कृत भाषा में रामायण जैसी कृति की रचना उनकी प्रतिभा की ही देन है, जिसे समाज ने अपना अमूल्य थाती माना। उनके इस ग्रंथ में चौबीस हजार श्लोक हैं। एक हजार श्लोकों के बाद गायत्री मंत्र के एक अक्षर का सम्पुट लगा हुआ है। इसके सात काण्ड हैं जो क्रमश: बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किंधाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, युद्धकाण्ड से लेकर उत्तरकाण्ड तक जाता है। इसमें सौ उपाख्यान, पांच सौ सर्ग हैं। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से हरेक काण्ड का अपना महत्व है। प्रथम सर्ग मूल रामायण के नाम से प्रसिद्ध है। देखा जाए तो जीवन के विविध आयामों के बारे में वाल्मीकि ने रामायण के विभिन्न पात्रों के चरित्रों को साकार करके समझाया है। राम को केन्द्र में रखकर उन्होंने गृहस्थ धर्म, राज धर्म और प्रजाधर्म का जो खाका खींचा, वह विलक्षण है। जब भी भारतीय समाज में सामाजिक व पारिवारिक मर्यादा की बात की जाती है, तो उनकी रचना सामने प्रस्तुत की जाती है। माना जाता है कि वाल्मीकि के दौर में भगवान श्रीराम थे। वे वनवास काल के मध्य वाल्मीकि के आश्रम में भी गए। इसलिए वाल्मीकि

श्रीराम के जीवन में घटित घटनाओं से पूरी

तरह वाकिफ थे। उन्होंने सीता को अपने आश्रम में रखा, जहां लव-कुश का जन्म और शिक्षा-दीक्षा हुई। संस्कृत भाषा में रचित रामायण भगवान राम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य से, कर्तव्य से परिचित कराती है। यह ऐसा ग्रंथ है जिसने मर्यादा, सत्य, प्रेम, भ्रातृत्व, मितृत्व एवं सेवक के धर्म की परिभाषा भारतीय समाज को सिखाई। रामायण के पात्रों के माध्यम से जो मानवीय मूल्य उन्होंने रचे, उसे दूसरे युगों ने भी अपनाया। उनके बाद हर युग और काल में भगवान राम को लेकर रचनाएं आती रहीं। मध्यकाल में तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण से प्रेरित होकर रामचरितमानस की रचना की। आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त ने पंचवटी और साकेत तथा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने राम की शक्ति पूजा जैसी रचनाएं दीं। इन सबके मूल में कहीं न कहीं वाल्मीकि रामायण और उसके मानवीय मूल्य जरूर हैं। आज जब भी मानवीय मूल्य संकट में जाता प्रतीत होता है, तब भारतीय समाज उनकी उस रचना को अपना प्रकाश स्तम्भ बनाता है। रचना में पात्रों के माध्यम से प्रदर्शित उन गुणों को अपनाता है, जिन्होंने लोगों को एक दिशा दी। जीवन जीने की कला सिखाई। कालजयी रचनाएं संस्कृति का हिस्सा होती हैं। ऐसे में महर्षि वाल्मीकि को याद करना उस संस्कृति के रचयिता को याद करना है, जिसने युगों-युगों से हमें मानवता के दायरे में जीना सिखाया। ऐसे मूल्य दिए, जिनके सहारे हम एक शताब्दी से दूसरी शताब्दी में प्रवेश करते हैं। समाज और सांस्कृतिक आकाश में जब भी अंधेरा घना हो जाता है, महर्षि वाल्मीकि की रचना और उसके मूल्य आदर्श बनकर आगे बढ़ने की लौ जगाते हैं।

जब देखी पक्षी की पीड़ा... वाल्मीकि तमसा नदी के तट पर क्रौंच पक्षी के जोड़े को निहार रहे थे। तभी एक बहेलिये ने प्रेम में मग्न उस जोड़े पर बाण चला दिया। उसने नर पक्षी के प्राण ले लिये। वियोग में मादा विलाप करने लगी। उसकी पीड़ा देखकर वाल्मीकि के मुख से स्वतः यह श्लोक फूट पड़ा - मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम।। अर्थात- हे दुष्ट, तुमने प्रेम में मग्न एक पक्षी को मार दिया है। जा तुझे कभी भी शांति की प्राप्ति न हो पाएगी। यह श्लोक संस्कृत भाषा में लौकिक छंदों में प्रथम अनुष्टुप छंद का श्लोक था। इसी छंद के कारण महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हुए। यही श्लोक रामायण का आधार बना। गुरु-मंत्र सत्य ही ईश्वर सत्य-सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः। सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम‍‍्॥ सत्य ही संसार में ईश्वर है, धर्म भी सत्य के ही आश्रित है। सत्य ही समस्त भव-विभव का मूल है, सत्य से बढ़कर और कुछ नहीं है। उत्साह सबसे बड़ा बल उत्साह-उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम‍्। सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चदपि दुर्लभम‍्॥ उत्साह बड़ा बलवान होता है, उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है। उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः। सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति॥ उत्साहहीन, दीन और शोकाकुल मनुष्य के सभी काम बिगड़ जाते हैं, वह घोर विपत्ति में फंस जाता है। जैसा कर्म, वैसा फल कर्मफल-यदाचरित कल्याणि शुभं वा यदि वाऽशुभम‍्। तदेव लभते भद्रे कर्त्ता कर्मजमात्मनः॥ मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। कर्ता को अपने कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है।

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