जीवन्त हो उठी मृतप्राय: बीकानेरी चांदी नक्काशी

ओम मिश्रा

बीकानेर की विश्व प्रसिद्ध उस्ता कला ने ऊंट की खाल पर स्वर्णयुक्त मीनाकारी को बुलंदी पर पहुंचाया है। कला के इसी सफर में चांदी पर कलात्मक नक्काशी का बेजोड़ काम करके देवदत्त ने चांदी पर नक्काशी के क्षेत्र में नये आयाम जोड़े हैं। बीकानेर के देवदत्त जांगिड़ यूं तो चांदी के काम के एक कारीगर है लेकिन उन्होंने चांदी पर नक्काशी के शिल्प में नूतन प्रयोग करके अपनी एक अलग पहचान बनाई है। बीकानेर शैली पर नक्काशी के नये-नये प्रयोग करने वाले देवदत्त मुगल शैली, राजपूत शैली, अरबियन शैली में सिद्धहस्त हैं लेकिन उन्होंने बीकानेर के महल, हवेलियों, मंदिरों में प्रयुक्त पत्थर, लकड़ी, पीतल की शिल्पकारी का सूक्ष्म अध्ययन कर बीकानेर  शैली को गहराई से समझा और फिर अपनी जमीन से जुड़ी परम्परागत बीकानेर शैली में चांदी पर नक्काशी कर चांदी के कलात्मक शिल्प को न केवल जीवंतता दी बल्कि इस विलुप्त प्राय: हो चुकी शिल्पकारी को नये आयाम और ऊंचाई भी दी है। आह्वान दी पर नक्काशी का काम करने लगे। हम मूलत: चूरू के हैं और महाराजा गंगा सिंह के आमंत्रण पर बीकानेर आये थे। हमारे दादा ने बीकानेर के जूनागढ़ किले में तो काम किया ही, बीकानेर राज्य के राज्य सिंह, शील्ड, फर्नीचर, हाथी के हौदे एवं चांदी के कलात्मक बर्तनों को बनाया। मेरे पिताश्री पोकर मल जांगिड़ चांदी पर नक्काशी का काम करने वाले बेजोड़ शिल्पी माने जाते हैं। चांदी कला को विधिवत सीखने तथा पारंगत होने के प्रश्न पर वह कहते हैं कि—'मैंने विधिवत् इस कला का प्र्रशिक्षण दस साल की अवस्था में अपने पिता से लेना शुरू किया। उस समय केवल छोटे-छोटे सामान मसलन चांदी की छोटी डिब्बियां, इत्रदान, काजलदानी बनाना सीखा। पुरानी कलाकृतियों की मरम्मत का भी काम किया। इस दौरान बीकानेरी शैली की शिल्पकारी पर विशेष काम किया। कारण बीकानेरी शैली की शिल्पकारी शने: शने: खो रही थी। विलुप्त प्राय: होती बीकानेरी शैली को मैंने अपनी मौलिक शिल्पकारी से चांदी शिल्प में नये आयाम देने की कोशिश की है। काम तो मुगल शैली, राजपूत शैली और अरबियन शैली पर भी किया है लेकिन बीकानेरी शैली से मेरा गहरा आत्मीय लगाव है और यही कारण है कि आज चांदी के शिल्प में की गई बीकानेरी शैली की नक्काशी ही मेरी अलग पहचान बन गई है। चांदी पर नक्काशी का काम देश भर में होता है लेकिन इस शैली के काम के लिए दूर-दूर से लोग (ग्राहक) आते हैं। चांदी की कलाकृतियों में शुद्ध 999 चांदी का इस्तेमाल करने वाले देवदत्त अपनी बनाई कलाकृतियों के बारे में पूछने पर बताते हैं कि—'मंदिरों के चांदी के कलात्मक द्वार, गुबंज, स्तंभ, झाड़-फानूस, चांदी के हुक्के, सुराहियां, हाथी, घोड़े, मोर, मछली, रथ, शेर, फूलदान, छडिय़ां, फर्नीचर ढाल, तलवार शाही जूतियों के अतिरिक्त देवताओं की प्रतिमाएं तथा मंदिरों के छत्र आदि का काम बराबर चलता रहता है। सभी काम में जो नक्काशी की जाती है, वहीं जटिल तथा अनूठा काम होता है। चांदी की सुराही में अंकित चित्र, फूल-पक्षी सभी सजीवता का एहसास कराते हैं। चांदी का नक्काशीदार वृक्ष और उसमें अंकित देव प्रतिमाएं, चांदी की एक इंच की कलात्मक जूती, फोटो फ्रेम, तलवार की मूठ, गुलदस्ते, हुक्के, शृंगारदानी, ढोला-मारू की कलाकृतियां सभी को पसंद आती हैं। चांदी की चौकी के ऊपर बने स्तंभ गुबंज और उस पर कलश यह आइटम भी काफी चलता है।' चांदी पर कलात्मक नक्काशी की निर्माण प्रक्रिया के बारे में देवदत्त से पूछने पर वह कहते हैं कि—'कलात्मक नक्काशी का काम इतना सहज नहीं है, जितना कि लोग समझते हैं। नक्काशी के काम से पहले आकृति का मूल ढांचा तैयार करना होता है। चांदी के छोटे आइटम तो लंबी प्रक्रिया से नहीं गुजरते हैं क्योंकि छोटी आकृति के कारण वह तैयार जल्दी हो जाते हैं लेकिन बड़े आइटम को बनाने से पहले उसकी पूरी नापतौल तथा रूपरेखा कागज पर बनानी पड़ती है। फिर आकृति के अनुसार सांचे तैयार करना बड़ा काम होता है। इसमें ही ज्यादा समय तथा श्रम लगता है। सांचे भी कई भागों में बनाने पड़ते हैं। किसी भी आकृति को केवल एक सांचे से बनाना संभव नहीं होता है अत: कई सांचों को जोडऩे के बाद मूल आकृति का स्वरूप तैयार हो पाता है। देवदत्त अपने पुत्र कमल दत्त को यह कला सिखा रहे हैं। कमल दत्त भी अपने पिता से नक्काशी का यह हुनर सीखते हुए उनके काम में हाथ बढ़ाते हैं। उनका कहना है कि चांदी पर नक्काशी द्वारा मैंने बीकानेर शैली को जीवंत किया है और मैं चाहता हूं कि इस कला की जीवंतता बनी रहे।

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