जीएसटी राजस्व बढ़ाने को प्रोत्साहन जरूरी

 

भरत झुनझुनवाला केंद्र सरकार ने राज्यों को आश्वासन दिया था कि अगले पांच वर्षों में जीएसटी के राजस्व में जो भी कमी होगी उसकी भरपाई केन्द्र सरकार करेगी। उस समय अनुमान लगाया गया था कि जीएसटी में प्रति वर्ष 14 प्रतिशत की वृद्धि होगी। लेकिन जीएसटी की वसूली पिछले दो वर्षों में सपाट रही है और वर्तमान संकट में इसमें गिरावट आ रही है। इस परिस्थिति में फ़िलहाल राज्यों को पर्याप्त राजस्व मिल जायेगा चूंकि जीएसटी में गिरावट की भरपाई केन्द्र सरकार के द्वारा कर दी जाएगी। लेकिन 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद तमाम राज्यों पर भारी संकट आएगा। जैसे पंजाब की जीएसटी की वसूली में 44 प्रतिशत की गिरावट आई है। पांच वर्षों तक पंजाब को इस गिरावट का अहसास नहीं होगा क्योंकि इसकी भरपाई केंद्र सरकार द्वारा कर दी जाएगी। लेकिन 5 वर्षों के बाद एकाएक उनके राजस्व में 44 प्रतिशत की गिरावट आएगी, जिसको उन्हें स्वयं वहन करना होगा। जीएसटी लागू करने के तीन प्रमुख उद्देश्य थे। पहला यह कि सम्पूर्ण देश में माल के वर्गीकरण को समान कर दिया जाये। जैसे पूर्व में किसी राज्य में क्राफ्ट पेपर को कागज के वर्ग में रखा जाता था और दूसरे राज्य में उसे पैकिंग मैटेरियल के वर्ग में। ऐसे में सीमा पर विवाद उत्पन्न हो जाते थे कि उस माल का वर्गीकरण क्या हो, और उस पर किस दर से सेल टैक्स वसूल किया जाये। दूसरा उद्देश्य था कि टैक्स की चोरी पर अंकुश लगे जो कि ई-वे बिल की व्यवस्था के अंतर्गत हासिल करने का प्रयास किया गया है। इसके अंतर्गत सभी माल के आवागमन का जीएसटी के पोर्टल पर पंजीकरण करना होता है, जिसके आधार पर कोई भी निरीक्षक देख सकता है कि माल पर जीएसटी अदा की गई है अथवा इसे नम्बर दो में एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा रहा है। तीसरा उद्देश्य था कि सब राज्यों द्वारा एक ही समान दर से जीएसटी आरोपित की जाये, जिससे कि उद्यमी को एक राज्य से दूसरे राज्य में माल ले जाने में सुविधा हो, सम्पूर्ण देश एक बाजार का रूप धारण कर ले। मान लिया जाये कि जीएसटी से सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को लाभ हुआ है, तो भी इसमें कोई संशय नहीं है कि जीएसटी के कारण राज्यों की स्वायत्तता में कमी आई है। आज पंजाब जैसा राज्य यदि अपने राज्य में बिके हुए माल पर जीएसटी की दर में परिवर्तन करना चाहे तो यह उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गया है। इसलिए पंजाब की स्थिति उस व्यक्ति के जैसी हो गयी है जिसे कम भोजन से ही अपना जीवनयापन करना पड़ेगा। उसके पास पर्याप्त भोजन हासिल करने का विकल्प समाप्त हो गया है। अतः हमें इस पर विचार करना चाहिए कि जीएसटी के प्रथम दो कारकों—यानी माल का समान वर्गीकरण और ई-वे बिल की व्यवस्था—को बनाये रखते हुए राज्यों को अलग-अलग दर से अपने राज्य में जीएसटी वसूल करने का अधिकार दे दिया जाये। जैसे दिल्ली से पंजाब भेजे गये माल पर पंजाब में लागू दर से टैक्स दिल्ली का विक्रेता वसूल करे। ऐसा करने से अंतर्राज्यीय व्यापार सरल बना रहेगा क्योंकि माल का वर्गीकरण समान रहेगा और ई-वे बिल व्यवस्था जारी रहेगी। लेकिन साथ-साथ राज्यों को अपने राज्य के अंतर्गत बिकने वाले माल पर अलग-अलग दर से जीएसटी वसूल करने का अधिकार प्राप्त हो जायेगा और वे अपनी जरूरत के अनुसार जीएसटी की दर में परिवर्तन कर सकेंगे। वर्तमान कोरोना के संकट में जीएसटी में स्वायत्तता का विशेष प्रभाव पड़ेगा। जैसे इस समय हर राज्य के सामने तीन विकल्प हैं। पहला विकल्प है कि राज्य सख्त लॉकडाउन लागू करे, जिससे कि मृत्यु की संख्या कम हो, राजनीतिक लाभ मिले; लेकिन इससे राजस्व में गिरावट आएगी। दूसरा विकल्प है कि अर्थव्यवस्था को खुला छोड़ दे, जिससे मृत्यु की संख्या बढ़ने की सम्भावना है और राजनीतिक नुकसान हो सकता है; लेकिन राजस्व में लाभ होगा क्योंकि आर्थिक गतिविधियां चलती रहेंगी। तीसरा विकल्प है कि राज्य अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करें और सोशल डिस्टेंसिंग आदि नियमों को सख्ती से लागू कराएं और साथ-साथ अर्थव्यवस्था को खोलें। ऐसा करने से मृत्यु भी कम हो सकती है और राजस्व में वृद्धि भी हो सकती है। जाहिर है कि ऐसी परिस्थिति में सर्वश्रेष्ठ उपाय यह है कि राज्य अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारें, जिससे कि राजनीतिक और राजस्व दोनों उद्देश्य हासिल हो सकें। लेकिन वर्तमान जीएसटी व्यवस्था में राज्यों को फिलहाल राजस्व बढ़ने का प्रोत्साहन नहीं है। यदि किसी को राजस्व में वृद्धि होती भी है तो उतना केंद्र से कम मिलेगा। जैसे यदि पंजाब को 100 करोड़ रुपये की जीएसटी की गारंटी केन्द्र सरकार ने दे रखी है तो वर्तमान में पंजाब द्वारा 60 करोड़ रुपये की जीएसटी वसूल की जाती है अथवा 80 करोड़ रुपये की जीएसटी वसूल की जाती है इससे राज्य को तनिक भी अंतर नहीं पड़ता है। यदि पंजाब 60 करोड़ रुपये की जीएसटी वसूल करता है तो केन्द्र सरकार से 40 करोड़ रुपये का कम्पनसेशन मिलेगा और यदि वह 80 करोड़ रुपये की प्राप्ति करता है तो उसे 20 करोड़ रुपये का कम्पनसेशन मिलेगा। इसलिए आज के दिन किसी भी राज्य को इंसेंटिव नहीं है कि वह अपने राजस्व को सुधारे। और चूंकि राजस्व में वृद्धि हासिल करने का इंसेंटिव नहीं है इसलिए राज्यों द्वारा प्रशासनिक सुधार करने के स्थान पर सख्त लॉकडाउन को लागू करना लाभप्रद हो जाता है। इससे उन्हें राजनीतिक लाभ मिलेगा, लेकिन राजस्व में गिरावट की भरपाई केन्द्र सरकार द्वारा कर दी जाएगी। लेकिन इसी लॉकडाउन से आम जनता और राज्य की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए हमें ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें कि राज्यों को अपने राजस्व में वृद्धि करने का इंसेंटिव तत्काल उपलब्ध हो जाये और वे प्रशासनिक सुधार के साथ लॉकडाउन में ढील देने के विकल्प की तरफ बढ़ें। इसलिए जीएसटी में राज्यों को दर को निर्धारित करने की स्वायत्तता तत्काल दे देनी चाहिए। साथ-साथ व्यवस्था बनानी चाहिए कि जितना अतिरिक्त राजस्व एकत्रित किया जायेगा, उसके कारण केन्द्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले कम्पनसेशन में कटौती नहीं होगी। तब राज्यों के लिए इंसेंटिव बनेगा कि वे अपने प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारें और लॉकडाउन को खोलते हुए राजस्व में वृद्धि भी हासिल करें। वर्तमान जीएसटी की व्यवस्था ऐसी है कि छात्रों के हॉस्टल में खिलाड़ी स्पोर्ट्सवूमेन या आर्टिस्ट को एक ही प्रकार का भोजन परोसा जा रहा है। हमें व्यवस्था करनी चाहिए कि हर राज्य अपने विवेक और अपनी जरूरत के अनुसार जीएसटी की दरों में परिवर्तन करे और इसका अंतर्राज्यीय व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। ऐसा करने से हम राज्यों की स्वायत्तता को बचा सकेंगे और उन्हें अच्छे प्रशासन के साथ लॉकडाउन खोलने की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरणा दे सकेंगे।

लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।

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