चौहान का चौका

चौथी पारी की चुनौतियां भी कम नहीं लंबे राजनीतिक ड्रामे के बीच शीर्ष अदालत की दखल के बाद आखिरकार शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन ही गये। चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाले चौहान प्रदेश के ऐसे पहले नेता हैं। वर्ष 2005 से 2018 के बीच चौहान तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत का आंकड़ा नहीं मिल सका था। बहुमत तो कांग्रेस को भी नहीं मिला था, मगर कुछ निर्दलियों व अन्य दलों के विधायकों की मदद से कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। मगर विधानसभा में संख्या गणित को देखते हुए तय था कि कमलनाथ सरकार का स्थायी होना मुश्किल ही रहेगा। भाजपा भी घात लगाए बैठी थी कि कांग्रेस में अंतर्विरोध उभरे और उसे सरकार बनाने का मौका मिले। कांग्रेस पार्टी में महत्वाकांक्षाओं के ज्वार के बीच तमाम ऐसे अवसर मिल ही जाते हैं कि जिनका लाभ उठाने में भाजपा नहीं चूकती। इस बार मौका ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत ने दिलवाया और छह मंत्रियों समेत 23 विधायकों के इस्तीफे से पहले हाई वोल्टेज ड्रामा पूरे देश ने देखा। भाजपा ने पूरे प्रकरण की रूपरेखा फुलप्रूफ तैयार कर रखी थी ताकि कर्नाटक जैसी किरकिरी न हो। वह बात अलग है कि इस प्रक्रिया में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण जमकर होता रहा है। हालांकि, भाजपा दावा कर रही है कि कांग्रेस सरकार अपने ही बोझ से चरमराई है, मगर पर्दे के पीछ के खेल को बखूबी समझा जा सकता है। बहरहाल, मौजूदा हकीकत यह है कि 15 माह पुरानी कमलनाथ सरकार की विदाई हुई है। हालांकि, वे सरकार बचाने के तमाम दावे कर रहे थे। कोरोना फैक्टर को ढाल बनाने की भी कोशिश की, मगर सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे। यही वजह थी कि उन्होंने सदन में बहुमत साबित करने के बजाय इस्तीफा देना ज्यादा मुनासिब समझा, जिससे मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ। नि:संदेह, भाजपा में शिवराज सिंह चौहान ही एकमात्र ऐसा चेहरे थे, जिन्हें मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी जा सकती थी। हालांकि, कुछ अन्य नामों की भी चर्चा रही, मगर बाजी आखिर चौहान के पक्ष में रही। इसमें दो राय नहीं कि शिवराज चौहान ने मध्यप्रदेश की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनायी है। हाल ही में कई राज्यों में पार्टी को हुई क्षति के बाद कहीं न कहीं भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी यह महसूस करता रहा है कि राज्यों में लोकप्रिय नेताओं को ही सत्ता की बागडोर दी जाये ताकि पार्टी को नरेेंद्र मोदी के करिश्मे पर निर्भर न रहना पड़े। नि:संदेह शिवराज चौहान अपनी लोकप्रियता, सौम्य व्यवहार, लंबे अनुभव तथा संघ से गहरे रिश्तों के चलते पार्टी की प्राथमिकता थे। अन्य पिछड़ा वर्ग से आने वाले चौहान के पास मुख्यमंत्री के रूप में तेरह साल का अनुभव प्लस प्वाइंट था। विपक्ष में रहते हुए भी उनकी सक्रियता ने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरने नहीं दिया और लगातार सड़क पर उतरते भी रहे। फिर मौका मिलते ही कांग्रेस पार्टी में जारी असंतोष को भाजपा के लिए अवसर में बदलने के लिए पटकथा भी लिख दी। बहरहाल, पिछले कुछ समय में कई राज्यों में सरकार गंवाने से पार्टी के मनोबल को लगे झटके से उबरने में मध्यप्रदेश में पार्टी की सत्ता में वापसी मददगार साबित होगी। वैसे भी भाजपा व संघ के तालमेल से सरकार बनाने में मध्यप्रदेश एक प्रयोगशाला रही है, केंद्र में पार्टी की सत्ता होने के बावजूद राज्य में सरकार बनाने में हुई चूक को लेकर कई सवाल उठ रहे थे। बहरहाल, इस बार की शिवराज चौहान की पारी खासी चुनौती भरी होगी। सत्ता में ज्योतिरादित्य गुट की भागीदारी और इस्तीफा देने वाले बागी विधायकों को मान-सम्मान व पद देने में पार्टी के भीतर की प्रतिक्रिया का उन्हें सामना करना पड़ेगा। चौहान इन परिस्थितियों में कैसे सामंजस्य बैठा पाते हैं, ये उनके राजनीतिक कौशल पर निर्भर करेगा। बहरहाल, नई पारी पहले जैसे सुगम तो कतई ही नहीं रहेगी।

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