चीन का भारत विरोधी कारोबारी चक्रव्यूह

पुष्परंजन

पहली जुलाई, 2020 से बांग्लादेशी उद्योग जगत में बहार आई है, जो चीन के बाज़ार में अपना माल एक्सपोर्ट करते हैं। 8 हज़ार 256 ऐसे प्रोडक्ट हैं, जिनके निर्यात पर कोई कर चीन को नहीं देना है। यह कुल निर्यात का 97 प्रतिशत है। इससे बांग्लादेश में गारमेंट, फ्रोज़न फूड, दवाएं, मछली, सब्जियों के काम-धंधे में 40 फीसद मूल्यवर्द्धन होगा। उद्योग में ‘वैल्यू एडेड’ किसे बुरा लगता है? चीन यह सब इसलिए कर रहा है, क्योंकि बांग्लादेश में लेबर सस्ती है। माल इस ग़रीब देश में बनवाओ और चीन के बाज़ार में मंगवा लो। बांग्लादेश के आम नागरिक को इस गुणा-भाग से मतलब नहीं कि चीन दे कितना रहा है और उनके यहां से कितना वसूल रहा है। चीन 83 करोड़ 10 लाख डॉलर का माल बांग्लादेश से ले रहा है, बदले में 17.8 अरब डॉलर का माल बांग्लादेश के बाज़ार में खपा रहा है। यानी, जो आयात है, उसके मुकाबले एक फीसद निर्यात भी बांग्लादेश चीन को नहीं कर पा रहा है। दुनिया में ऐसे 46 अल्प विकसित देश (एलडीसी) हैं, जिन्हें चीन इस तरह की ज़ीरो टैरिफ सुविधाएं देने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की सूची में 47 ऐसे लिस्ट डेवलेप्ड कंट्री (एलडीसी) नुमायां हैं। उनमें दक्षिण-पूर्व एशिया में अफग़ानिस्तान, नेपाल, म्यांमार, भूटान, बांग्लादेश जैसे पांच देश हैं। भूटान को छोड़कर, जिन देशों से चीन के कूटनीतिक संबंध हैं, उन्हें ज़ीरो टैरिफ की सुविधाएं देने का निर्णय कर लिया है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने 19 जून को बयान दिया था कि हम पहले से ‘एशिया-पैसेफिक ट्रेड एग्रीमेंट’ के तहत 3 हज़ार 95 उत्पादों पर करमुक्त प्रणाली का लाभ प्राप्त कर रहे थे। तो क्या चीन ने इस बार अढ़ाई गुणा से अधिक 8 हज़ार 256 आइटम्स पर ज़ीरो टैरिफ लगाकर क्या कोई मास्टर स्ट्रोक खेला है? 16 मई, 2020 को ख़बर आई कि भारत एक बार फिर से बांग्लादेशी माल के आयात पर शुल्क बाधाएं (टैरिफ बैरियर) आयद कर रहा है, ताकि उसके उत्पाद धड़ल्ले से भारतीय बाज़ार में आने से रोके जाएं। ढाका स्थित एक्सपोर्ट प्रोमोशन ब्यूरो के डाटा बताते हैं कि बांग्लादेश, भारत के लिए सवा अरब डॉलर के माल का निर्यात 2018-19 में कर चुका था। इनमें सब्जियां, टेक्सटाइल्स, पेपर व जूट यार्न, फिशिंग नेट, जूट और लैदर के सामान हैं। उस अवधि में भारत ने साढ़े सात अरब डॉलर का निर्यात बांग्लादेश को किया था। यह दिलचस्प है, बांग्लादेश पशुओं की तस्करी भारत से करोड़ों की संख्या में कराता है, उनके चमड़े वाले उत्पाद भारत, चीन समेत 11 देशों को निर्यात करता है। ढाका स्थित थिंक टैंक, ‘सेंटर फॉर पॉलिसी डॉयलाग’ के सीनियर फेलो, मुस्तफिज़ुर रहमान बताते हैं, ‘2019 में भारत-बांग्लादेश का व्यापार घाटा 7.35 अरब डॉलर का था। 2020 में यह खाई और बढ़ेगी।’ वजह साफ दिखती है। एक तरफ चीन ज़ीरो टैरिफ का चक्रव्यूह रच रहा है, उसके बिल्कुल उलट एंटी डंपिंग टैक्स हम बांग्लादेश पर आयद करने की ज़िद में आ गये। बांग्लादेश के टैरिफ कमीशन ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के विरुद्ध शिकायत की थी कि कपड़ा उद्योग के काम आने वाले केमिकल, ‘हाइड्रोजन पेरोऑक्साइड’ और जूट यार्न व बैग, फिशिंग नेट जैसे आइटम पर कई सौ गुना कर लादे गये हैं। बांग्लादेश पर ‘एंटी डंपिंग टैरिफ’ की यह हरि अनंत कथा जनवरी, 2017 से जारी है। आप इन्हीं लालफीताशाही में उलझे रहिए, चीन को ऐसे अवसर का लाभ उठाने दीजिए। सवाल यह है, चीन करने क्या जा रहा है? बांग्लादेश में इस समय 88 स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (एसईज़ेड) हैं, जिसमें सरकार के नियंत्रण में 59 और प्राइवेट हाथों में 29 हैं। 2025 तक शेख हसीना सरकार का लक्ष्य चीनी सहकार से सौ ‘एसईज़ेड’ बनाना है। चीन, भारत के शेष अल्प विकसित पड़ोसी देशों नेपाल, म्यांमार व श्रीलंका में बांग्लादेश वाला मॉडल तैयार करने में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए, चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा में चंडीगढ़ की परिधि से आधा, 55 वर्ग किलोमीटर जमीन ‘एसईज़ेड’ के वास्ते सरकार से ली है। इस संदर्भ में हम पाकिस्तान की चर्चा जान-बूझकर नहीं कर रहे। इस समय चीन की पहली प्राथमिकता भारत से लगी खुली-अधखुली ज़मीनी सीमा वाले देशों म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल को अपना डंपिंग ग्राउंड बनाना है। आप भारत में चीनी वस्तुएं बैन कीजिए, म्यांमार से पूरा पूर्वोत्तर, नेपाल से सिक्किम, बंगाल, उ.प्र., उत्तराखंड, बिहार की निरापद सीमाएं चीनी समान की तस्करी के वास्ते 60 और 70 के दशकों की याद दिला देगी। दक्षिणी राज्यों के लिए चीनी माल की सप्लाई चेन श्रीलंका, मालदीव के बरास्ते संभव है। यों, नेपाल की हालत, ‘जेब में नहीं हैं दाने, अम्मा चली भुनाने’ जैसी है। गोरखपुर से सौ किलोमीटर की दूरी पर है नेपाल का भैरहवा। यहां पर स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (एसईज़ेड) बनाये जाने की घोषणा नेपाल सरकार ने छह साल पहले की थी। इसके साथ जुम्ला, गोरखा, घनगढ़ी, पांचखल और विराटनगर में एसईज़ेड बनाये जाने का ऐलान हुआ। पिछले वित्तवर्ष में 72 करोड़ का आवंटन का नतीज़ा दिख रहा है। नेपाल में एक भी ‘एसईज़ेड’ चालू नहीं हो पाया। अब सारी उम्मीदें आकर चीन पर टिक गई हैं। चीन से जो सहमति एसईज़ेड के वास्ते नेपाल की बनी है, उसमें पहले से तय एसईज़ेड के अलावा तिब्बत सीमा से लगे रसुवागढ़ी बार्डर पर एक। दूसरा, दमक में चाइना-नेपाल इंडस्ट्रियल पार्क। तीसरा, बिहार के रक्सौल सीमा से लगा सेमरा है, जहां चीन की चाहत है कि यहां भी इंडस्ट्रियल पार्क बने। यह एक चक्रव्यूह है, जिसे दिल्ली में बैठे आर्थिक योजनाकारों को समझने की आवश्यकता है। चीन ने अप्रैल, 2018 में ही नेपाल के आठ हज़ार प्रोडक्ट को करमुक्त कर दिये जाने का अभय दान दे रखा है। ठीक वैसे ही, जैसे बांग्लादेश को पहली जुलाई, 2020 से चीन ने सुविधाएं बढ़ाईं। नेपाल का क़िस्सा कोताह ये है कि जितना बड़ा पेट नहीं हैं, उससे दस गुना अधिक खाता है। 1751 किलोमीटर भारत-नेपाल की खुली सीमा न हो, तो नेपाली माल के खरीदारों का टोटा ख़ुद उसी के देश में है। उससे भी भयानक मामला औद्योगिक उत्पादन और उसके डाटा में हेराफेरी का है। जुलाई मध्य से जनवरी, 2020 के शुरू तक सिर्फ़ छह माह में पाम ऑयल की सप्लाई में नेपाल ने सौ मिलियन डॉलर का चूना भारत को लगाया है। सबको हैरानी हुई थी कि जिस नेपाल में ताड़ के हज़ार-पांच सौ पेड़ नहीं दिखते, वह पाम ऑयल का एक्सपोर्टर है। पता चला सारा माल मलेशिया का था। आने वाले दिनों में चीन, नेपाल के माध्यम से ऐसे ही गोरखधंधे को विस्तार दे सकता है।

लेखक ईयू-एशिया न्यूज़ के  नई दिल्ली संपादक हैं।

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