चीनी सत्ता के खिलाफ बुलंद होते सुर

हालांकि हांगकांग स्पेशल एडमिनिस्ट्रेटिव रीजन (एचकेएसएआर) की प्रशासनिक व्यवस्था में हाल ही में 18 जिला परिषदों की 452 सीटों का लोकतांत्रिक महत्व इस द्वीप के प्रशासनिक ढांचे में सबसे निचले पायदान पर है। इनको मिली शक्तियां भी अत्यंत सीमित हैं, फिर भी 24 नवम्बर को 452 जिला परिषदों के चुनाव परिणामों को काफी महत्वपूर्ण दृष्टि से देखा जा रहा है। एक तरह से इसे हांगकांग में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की वैधता पर जनमत संग्रह की तरह लिया जा रहा है। परिणाम बताते हैं कि हांगकांग की मुख्य धरा चीन (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाईना) में पुनः विलय होने के 22 साल बाद भी न बीजिंग बैठकर राज चलाने वाली केंद्रीय सरकार और न ही चीन की कम्युनिस्ट पार्टी हांगकांग के अधिकांश निवासियों का विश्वास जीत पाए हैं। ताजा चुनाव परिणाम लगभग एकतरफा हैं, जिसमें 452 सीटों में 396 यानी 90 फीसदी पर कम्युनिस्ट सरकार विरोधी प्रत्याशी जीतकर आए हैं जो संकेत है कि आम लोगों को विश्वास नहीं है कि चीन ‘एक देश- दो व्यवस्था’ नामक उस वादे को ईमानदारी से लागू करेगा, जिसे टापू की लीज समाप्ति होने पर यूके के साथ मिलकर तय किया गया था। चुनाव से पहले हांगकांग की चीनी यूनिवर्सिटी द्वारा करवाए गए सर्वेक्षण के मुताबिक 50 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को इस द्वीप की पुलिस और सरकार पर भरोसा नहीं है। चीन समर्थक प्रत्याशी 300 सीटों से सिमटकर केवल 58 पर रह गए हैं। नतीजे परिलक्षित करते हैं कि लोगों के अंदर चीन के प्रति विरोध किस कदर गहरे पैठा हुआ है, यही लोग वहां होने वाले प्रदर्शनों को भारी समर्थन दे रहे हैं। हालांकि चीन-समर्थक मीडिया हालात कुछ इस तरह पेश कर रहा है कि प्रदर्शनकारियों का समर्थन लगातार कम होता जा रहा है।

जयदेव रानाडे

नतीजों पर चीनी मीडिया की प्रतिक्रिया तुरंत आई। चीन की आधिकारिक अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ के संपादक हू शिनजिंग ने 24 नबम्बर के अपने ट्वीट में चुनावी पराजय को ‘पश्चिम की दखलअंदाजी’ ठहराया है, उदाहरणस्वरूप उन्होंने वह मीडिया रिपोर्टें गिनाई हैं, जिसमें कहा गया है कि चीन के एक जासूस ने पलायन करते हुए ऑस्ट्रेलिया में शरण ली है और यह भी कि चीनी अधिकारियों ने एक हांगकांग निवासी को पकड़कर यातनाएं दी हैं, जिस पर ब्रिटेन के लिए जासूसी का आरोप था। हाल ही में दो हांगकांग पुस्तक विक्रेताओं का अपहरण चीनी एजेंटों ने किया था। हांगकांग से निकलने वाली चीन समर्थक दो अखबारों ने भी दावा किया है कि ताजा नतीजे लोगों की चीन के प्रति नापसंदगी का सही रूप में प्रतिनिधित्व नहीं करते । चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया थोड़ा ठहरकर आई थी, किंतु वह भी हू शिनजिन के ट्वीट की ताईद कर रही थी। पार्टी के समाचार पत्र ‘पीपुल्स डेली’ ने चुनाव संपन्न होने की खबर तो दी लेकिन परिणामों को साफ गोल कर दिया! चीन की आधिकारिक न्यूज़ एजेंसी ‘शिनहुआ’ में एक टिप्पणी में कहा गया : ‘पिछले पांच महीनों के दौरान प्रदशर्नकारियों, दंगइयों ने विदेशी ताकतों से सांठगांठ करते हुए हिंसक कृत्यों में तेजी ला दी है, समाज बंटा है और आर्थिकी को भी धक्का पंहुचा है।’ वहीं ‘चाईना डेली’ का आकलन है : ‘रविवार को हुए जिला परिषद चुनाव के परिणामों से हांगकांग की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की प्रगति को धक्का लगा है।’ हांगकांग में पिछले छह महीनों से लोकतांत्रिक व्यवस्था बचाने को लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं जिसमें लाखों लोग सड़कों पर निकलकर इन्हें समर्थन दे रहे हैं और इससे लोगों की इच्छाशक्ति और दृढ़ हुई है। प्रदर्शन में भाग लेने वालों की संख्या कम से कम 3 लाख तो किसी-किसी में 10 लाख से ज्यादा होती रही है। सरकारी तंत्र का यह प्रचार कि हिंसा में बढ़ोतरी से प्रदर्शनकारियों के लिए लोगों की सहानुभूति कम होती जा रही है, यह नागरिकों के भारी मतदान से झूठा पड़ा गया। कुल 43.1 लाख मतदाताओं में से 29.4 लाख वोट पड़े जो 71 प्रतिशत बैठता है। चीन समर्थक कुछ संगठन जैसे कि ‘हांगकांग फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन्स’ और हांगकांग स्थित चीन के सरकारी दफ्तरों ने मौजूदा स्थिति को रफादफा करने और प्रदर्शन खत्म करवाने हेतु लोगों को साथ जोड़ने की कोशिशें की थीं। इस सिलसिले में पहली बार मतदान करने जा रहे 3.9 लाख मतदाताओं को पंजीकृत किया भी है, लेकिन लगता है इनमें से अधिकांश ने प्रदर्शनकारियों के पक्ष में ही वोट डाले हैं। उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने संसद द्वारा पारित एक विधेयक को अपने हस्ताक्षरों से कानून का रूप दे दिया है। इसके मुताबिक गृह विभाग को प्रत्येक साल अपना सत्यापित आकलन देना जरूरी होगा कि चीन मानवाधिकारों का पालन सही ढंग से कर रहा है या नहीं। इस पर चीन ने बीजिंग स्थित अमेरिकी राजदूत को बुलाकर चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने इस नए कानून पर अमल किया तो वह भी ठोस ‘प्रतिकर्मात्मक उपाय’ करेगा। वहीं उक्त विधेयक का हांगकांग में लोकतंत्र-समर्थकों ने व्यापक स्वागत किया है। होंगहोंग में हुए प्रदर्शनों ने अंतर्राष्ट्रीय ध्यान खींचा है। अमेरिका, यूके, ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटाइना में इनके प्रति सहानुभूति दिखाने हेतु छात्रों ने पैदल मार्च निकाले हैं लेकिन ताइवान के लोगों पर इसका असर सीधा पड़ा है। वे इस घटनाक्रम पर पैनी नजर गड़ाए हुए हैं और वहां डीपीपी पार्टी के नेतृत्व वाली आजादी समर्थक सरकार ने भरोसा दिया है कि जरूरत पड़ने पर हांगकांग से मजबूर होकर भागने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मांगने पर शरण सुनिश्चित की जाएगी। वहां रैलियां करके हांगकांग के प्रदर्शनकारियों के लिए चंदा इकट्ठा किया गया है। इससे ताइवान के राष्ट्रपति त्साई-वेन के प्रति लोगों का समर्थन फिर से बढ़ गया है। चीन द्वारा प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए कार्रवाई के आदेश देने में दो महीने से ज्यादा की देऱी बताती है कि खुद पोलित ब्यूरो में इस पर एक राय नहीं है। खबरों का दावा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग तिनानमिन चौक जैसी बर्बर कार्रवाई की पुनरावृत्ति नहीं चाहते और अपने ही चीनी लोगों का खून बहाने के पक्ष में नहीं हैं। हांगकांग के निजाम के लिए उत्तरदायी पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग समिति के सदस्य हान झेंग भी फिलहाल उतनी ज्यादा सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। चीन के सुरम्य तटीय नगर बिदाइही में हर साल चीन का वर्तमान और सेवानिवृत्त शीर्ष नेतृत्व अनाधिकारिक सम्मेलन में सरकारी नीतियों और दशा-दिशा पर मंथन करता है, इस बार ‘वरिष्ठों’ ने इस प्रदर्शनों को ‘रंगीन क्रांति’ ठहराया है। लगता है इसके बाद ही चीन ने हांगकांग पर सक्रिय होना शुरू किया है। दशकों तक हांगकांग में अपने अनेकानेक चीन समर्थक संगठनों को पालन-पोसने के बावजूद लगता है इनमें कोई भी प्रदर्शनों पर समय रहते माकूल जानकारी मुहैया नहीं करवा पाया है। इस कोताही के लिए चीन इनके कारकुनों को दंडित अवश्य करेगा, यह तय है। निश्चित है हांगकांग पर अब चीन अपना पंजा और मजबूत करेगा।

लेखक चीन संबंधी आकलन एवं रणनीति केंद्र के अध्यक्ष हैं।

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