चिंताजनक है इंजीनियरिंग शिक्षा के प्रति घटता रुझान

चिंताजनक है इंजीनियरिंग शिक्षा के प्रति घटता रुझान

असंगत पाठ्यक्रम

शशांक द्विवेदी देश में इंजीनियरिंग के मौजूदा सत्र में भी देश के सभी राज्यों में बड़े पैमाने पर सीटें खाली रह गयी हैं। पूरे देश में लगभग साढ़े तीन लाख से ज्यादा सीटें खाली रह गयीं। राजस्थान में तो 50 प्रतिशत से ज्यादा लगभग 35 हज़ार सीटें खाली रह गयीं। यही हाल उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी है। इंजीनियरिंग के पिछले सत्र में पूरे देश में ढाई लाख से ज्यादा सीटें खाली रह गयी थीं। पिछले दिनों देश के चौदह राज्यों से 143 तकनीकी शिक्षण संस्थानों को एआइसीटीई से अपने पाठ्यक्रम बंद करने की इजाजत मांगनी पड़ी इससे सीटें न भर पाने से देश के कई कॉलेजों में जीरो सेशन का खतरा पैदा हो गया है। जहां कुछ साल पहले तक निजी तकनीकी शिक्षण संस्थान खोलने की होड़ थी तो अब इन्हें बंद करने की इजाजत मांगने वालों की लाइन लगी हुई है। अकेले आंध्र प्रदेश से ही 56 संस्थानों ने अपने पाठ्यक्रम बंद करने की इजाजत मांगी है। असल में देश में तकनीकी शिक्षा के हालात साल-दर-साल खराब होते जा रहे हैं और सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि हमारे देश के नीति नियंताओं को मौजूदा हालत नजर क्यों नहीं आ रही है? जबकि तकनीकी शिक्षा की यह स्थिति सीधे-सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी। इस बात पर राष्ट्रीय बहस होनी ही चाहिए कि लोगों का रुझान इंजीनियरिंग में कम क्यों हो रहा है और इतनी सीटें खाली कैसे रह गई? अगर कोई कमी है तो उसे कैसे दूर किया जाये? देश में इंजीनियरिंग के दाखिलों में साल-दर-साल जो गिरावट आ रही है उसके पीछे कुछ मुख्य कारण हैं जिन्हें हमें समझना होगा। मसलन तकनीकी शिक्षा के इतने विस्तार के बाद भी आज हम उसे व्यावहारिक और रोजगारपरक नहीं बना पाए हैं। कोई भी अभिभावक इंजीनियरिंग में अपने बच्चों का दाखिला सिर्फ इसलिए कराता है कि उसको डिग्री के बाद नौकरी मिले। देश में इस धारणा को समझना होगा कि इंजीनियर बनने के लिए कोई इंजीनियरिंग नहीं पढ़ता बल्कि नौकरी पाने के लिए इंजीनियरिंग पढ़ता है। नौकरी की गारंटी पर ही लोगों का इंजीनियरिंग में रुझान था लेकिन आज स्थिति एकदम बदल गयी है। बेरोजगार इंजीनियरिंग स्नातकों की पूरी फौज खड़ी हो गयी है। लोगों में यह आम धारणा हो गयी कि जब बेरोजगार ही रहना है तो ज्यादा पैसे खर्च कर इंजीनियरिंग क्यों करें, कुछ और करें। अधिकांश इंजीनियरिंग कालेजों में डिग्री के बाद प्लेसमेंट और खपत की गारंटी न होना मोहभंग होने का प्रमुख कारण है। इंजीनियरिंग स्नातकों में बेरोजगारी बढऩे की मुख्य वजह इंडस्ट्री और इंस्टीट्यूट्स के बीच दूरी बढऩा है। इनके बीच मांग और आपूर्ति का फासला बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों आई टी दिग्गज नारायणमूर्ति ने कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी इंडस्ट्री को प्रशिक्षित इंजीनियर नहीं मिलते। कॉलेज इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से इंजीनियर पैदा नहीं कर पा रहे हैं जबकि इंडस्ट्रीज़ में कुशल मानव संसाधन की कमी है। देश के 13 राज्यों के 198 इंजीनियरिंग कॉलेजों में अंतिम वर्ष के 34 हज़ार विद्यार्थियों पर हुए एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक देश के सिर्फ 12 फीसदी इंजीनियर नौकरी करने के काबिल हैं। इस सर्वे ने भारत में उच्च शिक्षा की शर्मनाक तस्वीर पेश की है। यह आंकड़ा चिंता बढ़ाने वाला भी है, क्योंकि स्थिति साल दर साल खराब ही होती जा रही है। वास्तव में इंडस्ट्री की जरूरत और छात्रों के ज्ञान में कोई तालमेल नहीं है। वजह यह है कि आज भी हमारे शैक्षिक कोर्स 20 साल पुराने हैं। पाठ्यक्रमों में सालोंसाल कोई बदलाव न होना उच्च शिक्षा की एक बड़ी कमी है। खासतौर पर इंजीनियरिंग में, क्योंकि इस क्षेत्र में नयी-नयी तकनीकें विकसित होती  रहती हैं। इसलिए इंडस्ट्री के हिसाब से छात्रों को अपडेटेड थ्योरी नहीं मिल पाती। अभी स्थिति यह है कि सारा ध्यान थ्योरी सब्जेक्ट पर है,उन्हें रटकर पास करने में ही छात्र अपनी इतिश्री समझते हैं। घिसे-पिटे कोर्स से जो शिक्षा दी जाती है, उससे तैयार होने वाले ग्रेजुएट हर दिन बदलती तकनीकी दुनिया से तालमेल नहीं बैठा पाते। ऐसे में उन्हें डिग्री के बाद तुरंत नौकरी मिलेगी इसकी उम्मीद बहुत कम होती है। पूरे 4 साल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हें फिर अपना नालेज अपडेट करने के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कोर्सेस में दाखिला लेना पड़ता है तब जाकर उन्हें कंपनियों में एक प्रशिक्षु के रूप में ही नौकरी मिल पाती है। उधर आर्थिक मंदी का भी प्रभाव इंजीनियरिंग के दाखिले पर पड़ा है। जो अभिभावक पहले आराम से इंजीनियरिंग की फीस भर देते थे मंदी के कारण अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। पिछले 5 सालों में देश के कई हिस्सों में फीस 2 से 3 गुना तक बढ़ गयी। उत्तर प्रदेश में जहां 2001-05 में बीटेक के लिए बीस हजार रुपये सालाना फीस थी, वर्तमान में लगभग एक लाख रुपये सालाना हो गयी है। यानी 7 सालों में फीस में 5 गुना वृद्धि। फीस में लगातार वृद्धि और आर्थिक मंदी ने दाखिले पर गहरा प्रभाव डाला है। लेकिन मंदी के साथ साथ इस स्थिति के जिम्मेदार कालेज संचालक भी हैं जिन्होंने गुणवत्ता की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया और इंजीनियरिंग कालेज खोलने को एक कमाऊ उपक्रम का हिस्सा मान लिया। अधिकांश निजी तकनीकी शिक्षा संस्थान बड़े व्यापारिक घरानों, नेताओं और ठेकेदारों के व्यापार का हिस्सा बन गए। जो इसके जरिए सिर्फ रुपया बनाना चाहते हैं। उनकी प्राथमिकता में गुणवत्ता और छात्रों के प्रति जवाबदेही रही नहीं। इससे इंजीनियरिंग के क्षेत्र में रुझान बहुत नकारात्मक हुआ है। दुर्भाग्य से देश में जो तकनीकी शिक्षा का स्तर है वह ठीक नहीं है। देश में इतने बड़े पैमाने पर सीटें खाली रहना बहुत बड़ा मामला है अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। सरकार का सारा ध्यान आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों पर रहता है जबकि देश के विकास में निजी इंजीनियरिंग कालेजों का ज्यादा योगदान है क्योंकि 95 प्रतिशत इंजीनियर यही कालेज पैदा करते हंै। अगर इनकी दशा खराब होगी तो इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा।

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