चांद के आर-पार पारखी नजर

अरुण नैथानी

किसी लक्ष्य को पाने में जुनून किस हद तक कामयाबी दे सकता है, भारत के एक अनाम युवक के रातों-रात हीरो बनने में उसकी बानगी नजर आती है। भारत के महत्वाकांक्षी चंद्रयान मिशन-2 के हाथों अंतिम क्षणों में फिसली सफलता ने हर भारतीय को व्यथित किया। मगर चेन्नई के शनमुग सुब्रह्मण्यम ने क्रैश हुए विक्रम लैंडर के मलबे को तलाशने का बीड़ा उठाया। दरअसल, विक्रम लैंडर हार्ड लैंडिंग की वजह से क्रैश हो गया था और उसका मलबा मिल नहीं पाया था। यहां यह सवाल चौंकाता है कि नासा और इसरो में अनुभवी वैज्ञानिकों व प्रशिक्षित शोधकर्ताओं की टीम जिस मलबे को तलाश नहीं पाये, उसे एक सामान्य मैकेनिकल इंजीनियर ने अपनी मेहनत और लगन से कैसे तलाश लिया। पूरी दुनिया में शनमुग सुब्रह्मण्यम की प्रतिभा और मेहनत की मुक्तकंठ से प्रशंसा हुई। नासा ने भी संदेश देकर उसके प्रयासों को सराहा। शनमुग सुब्रह्मण्यम मूलत: मदुरई के रहने वाले हैं और फिलहाल चैन्नई में सेवारत हैं। वे एक मैकेनिकल इंजीनियर और कंप्यूटर प्रोग्रामर हैं जो लेनोक्स इंडिया टेक्नालॉजी सेंटर चेन्नई में काम करते हैं। इससे पहले सुब्रह्मण्यम एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी में भी काम कर चुके हैं। दरअसल, शनमुग की अंतरिक्ष विज्ञान में गंभीर रुचि रही है। उसने कभी किसी प्रक्षेपण को नहीं छोड़ा और उससे जुड़े पहलुओं के बारे में जानना चाहा। सारा देश विक्रम लैंडर की विफलता को नियति मानकर चुप बैठ गया मगर शनमुग ने उसके मलबे को तलाशने का बीड़ा उठाया कि वह आखिर कहां गया। उसके पास न तो वैसे उच्च तकनीक वाले संसाधन थे और न ही इस तरह का अनुभव। उसने स्वयं नासा के लूनर रिकनाइसांस आर्बिटल कैमरा यानी एलआरओसी द्वारा ली गई तस्वीरें डाउनलोड की। एलआरओसी की पहली तस्वीरें इतनी स्पष्ट नहीं थी मगर 14-15 अक्तूबर और 11 नवंबर को ली गई तस्वीरों के परिणाम बेहतर थे। हालांकि, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने दावा किया था कि उसने विक्रम लैंडर को खोज लिया है मगर उसने कोई प्रामाणिक तस्वीर जारी नहीं की थी। नि:संदेह विक्रम लैंडर के क्रैश होने के बाद तमाम लोगों की रुचि उसके बारे में जानने की हुई मगर इस दिशा में जुनूनी प्रयास किसी ने नहीं किये। शनमुग ने इसके बाद इस बाबत नासा द्वारा खींची गई तस्वीरों को स्कैन करना शुरू किया। उसने विक्रम की गति और स्थिति की अंतिम जानकारी का अवलोकन किया। आखिरकार उसने उस जगह को तलाश लिया जहां क्रैश होने के बाद विक्रम लैंडर का मलबा गिरा था। उसने उस जगह की कुछ साल ली गई तस्वीर और क्रैश के बाद की तसवीरों का गहन अध्ययन किया। फिर उस जगह में बदलाव को महसूस करते हुए क्रैश की जगह के निकट विक्रम के मलबे को खोज निकाला। शनमुग ने इसकी जानकारी नासा को दी। कुछ समय बाद नासा ने शनगुम की खोज की पुष्टि की। नासा ने मलबा खोज निकालने के लिये शनमुग का आभार जताया। साथ ही इस बात के लिये माफी मांगी हमने इसकी घोषणा देर से की। दरअसल, नासा तथ्यों की पुष्टि करने के लिये पूरी टीम की राय जानना चाहता था। वास्तव में नासा इस मामले में पूरी तरह संतुष्ट होना चाहता था। नासा के अधिकारियों ने कहा कि आपने इस खोज में इतना समय लगाया और मेहनत की, इसके लिये बधाई। विडंबना देखिये कि इस देश में जहां करोड़ों युवा इंटरनेट पर मसालेदार सामग्री के लिये घंटों बर्बाद कर देते हैं, वहीं शनमुग ने सकारात्मक सोच के साथ कड़ी मेहनत करके अप्रत्यशित सफलता हासिल की। एक साधारण से एप डेवलेपर ने ऐसा लक्ष्य हासिल कर लिया, जिसके लिये अंतरिक्ष विज्ञान के दिग्गजों ने हाथ खड़े कर दिये थे। दुनिया ने उसके उत्साह को सलाम किया है। नि:संदेह यह सकरात्मक मानवीय चिंतन का परिणाम है, जो बदलाव के प्रतिमान स्थापित करने जैसा है। नि:संदेह, शनमुग की कामयाबी यही बताती है कि यदि इनसान में लगन हो तो अपने घर में बैठकर भी चांद की सतह पर अपनी तलाश पूरी कर सकता है। उसकी कामयाबी हमें यह सबक भी देती है कि जहां चाह होती है, वहां राह भी निकल आती है। यह भी कि इंटरनेट सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं है, इसके जरिये देश-दुनिया ही नहीं अंतरिक्ष तक की खैर-खबर ली जा सकती है। बहुत कुछ ऐसा रचनात्मक तलाशा जा सकता है जो मानवता के ज्ञान में वृद्धि कर सकता है। यह भी कि आम लोग भी घर बैठे न केवल अंतरिक्ष से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकते हैं बल्कि शोध-अनुसंधान की दिशा में आगे बढ़कर नई मिसाल पेश कर सकते हैं। अपनी कामयाबी के भी नये दरवाजे खोल सकते हैं। दिन भर निजी कंपनी में नौकरी करने और रात को चांद के धरातल पर विक्रम लैंडर की तलाश में जुटने वाले शनमुग सुब्रह्मण्यम नि:संदेह नई पीढ़ी के लिये प्रेरणा के स्रोत हैं।

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