गांवों से बेरुखी

विधायक आदर्श ग्राम योजना की विसंगतियां यह तथ्य व्यथित करता है कि हरियाणा के नब्बे विधायकों में से सिर्फ दो ने ही वित्तीय वर्ष में विधायक ग्राम विकास योजना के अंतर्गत निर्धारित राशि की मांग की है। चिंता की बात यह है कि 31 मार्च के बाद निर्धारित राशि का उपयोग नहीं किया जा सकेगा। वैसे तो इस योजना के तहत विधायक दो करोड़ रुपये की राशि विकास कार्यों के लिए स्वीकृत करा सकते हैं, लेकिन बीते चुनावी साल में एक करोड़ की राशि ही आवंटित की गई थी ताकि नई विधानसभा में पहुंचे विधायकों को शेष राशि विकास कार्यों के लिए उपलब्ध हो सके। हैरान करने वाली बात यह है कि तेरहवीं विधानसभा में भी नब्बे विधायकों में से सिर्फ 37 विधायकों ने ही इस योजना का लाभ उठाते हुए ग्रामीण विकास कार्यों को अंजाम दिया था। वहीं वर्तमान विधानसभा में केवल दो महिला जनप्रतिनिधियों ने ही अपने लक्षित गांवों के विकास के लिए धन की मांग की। इनमें विधायक नैना चौटाला और किरण चौधरी शामिल हैं। नि:संदेह यह स्थिति विधायकों की ग्रामीण विकास के प्रति उदासीनता को ही दर्शाती है जो गांवों के विकास के लिए मिले अवसर को यूं ही गंवा रहे हैं। यह स्थिति राजनेताओं की जनसरोकारों के प्रति उदासीनता को ही दर्शाती है। कह सकते हैं कि अभी आधा जनवरी ही बीता है और मार्च व्यतीत होने में ढाई माह का समय बाकी है। मगर हकीकत में इस धन के आवंटन की प्रक्रिया में ही 45 दिन का समय लगता है। ऐसे में सिर्फ एक माह में निर्धारित राशि का समुचित उपयोग हो पाना संभव नहीं लगता। जबकि संबंधित विभाग ने जनप्रतिनिधियों को लिखित और मौखिक रूप से इस बाबत अवगत भी कराया है। दरअसल, इस योजना के प्रति विधायकों की उदासीनता के कई ठोस कारण भी हैं। महात्मा गांधी के ग्रामीण उत्थान मिशन की अवधारणा को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई सांसद ग्रामीण विकास योजना की तर्ज पर ही विधायक ग्रामीण विकास योजना की भी शुरुआत की गई थी। मगर इस योजना के व्यावहारिक पक्ष की अनदेखी तथा बिना दूरगामी परिणामों का आकलन किये शुरू की गई इस योजना से जुड़ी विसंगतियां जल्दी ही सामने आने लगीं। योजना में विधायकों की अरुचि की एक वजह यह भी रही कि योजना का पैसा सीधे उनके पास नहीं पहुंचता है। वे सिर्फ अपने कार्यक्षेत्र में किये गये कार्यों का अवलोकन ही कर सकते हैं। यही वजह है कि ग्रामीण विकास विभाग द्वारा विधायकों को लिखित रूप में अवगत कराने तथा फोन द्वारा यह सूचित करने कि 31 मार्च से पहले निर्धारित राशि का उपयोग कर लिया जाये, कोई सक्रियता नजर नहीं आती। बताते हैं कि दिक्कत यह भी है कि योजना में पहले से चल रही विकास योजनाओं का भी समावेश है, अत: जनप्रतिनिधियों में उदासीनता नजर आती है। विधायकों को एक चिंता यह भी रहती है कि यदि एक ही गांव में विकास कराया जाये तो विधानसभा क्षेत्र के अन्य गांव उपेक्षा का आरोप लगा सकते हैं। एक विसंगति यह भी है कि निर्धारित राशि ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए आवंटित होती है, ऐसे में शहरी विधानसभा क्षेत्रों के जनप्रतिनिधि योजना के प्रति उदासीन नजर आते हैं। दरअसल, इस योजना में विधायकों को अपनी पसंद का गांव चुनना होता है और फिर जनपद के डीसी को सूचित किया जाता है, तब योजना का आकलन किया जाता है। फिर अनुमोदन के लिए मुख्यालय भेजा जाता है, जिसके बाद निविदाएं आमंत्रित करके विकास योजना को अंजाम दिया जाता है। दूसरा, विधायकों को यह भी चिंता रहती है कि एक गांव के लिए सक्रियता देखकर अन्य गांव नाराज हो सकते हैं जो कि राजनीतिक दृष्टि से उनके लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। क्षेत्र के विधायक और सांसद के अलग राजनीतिक दल से होने के कारण भी हितों के टकराव उत्पन्न हो सकते हैं। इसके चलते वे योजना के प्रति उदासीनता दर्शाते हैं।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

शहर

View All