गांधी से मिला था किंग को अहिंसा का हथियार

विवेक शुक्ला

अगर मार्टिन लूथर किंग ने गांधी के जीवन दर्शन और अहिंसा के सिद्धांत को न जाना होता तो क्या वे अश्वेतों के अधिकारों को लेकर इतने प्रतिबद्ध होते। अश्वेतों के गांधी कहे जाने वाले मार्टिन लूथर किंग के 28 अगस्त, 1963 को दिए ऐतिहासिक भाषण को न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया स्मरण कर रही है, तब इस बात को माना जा सकता है कि अगर उनके जीवन में गांधी न आते तो वे शायद अहिंसा को अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सशक्त हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं करते। मार्टिन लूथर किंग पर महात्मा गांधी के अहिंसावाद का गहरा प्रभाव था। मार्टिन लूथर किंग के ओजस्वी भाषण ने अमेरिकी नागरिक अधिकारों की लड़ाई को एक ऐतिहासिक लम्हा बना दिया। 16 मिनट के उनके भाषण ने अमेरिका की अंतरात्मा को जगा दिया, जिसने अपनी आजादी की घोषणा में कहा था—सारे इनसानों को एक बराबर रचा गया है। मार्टिन लूथर किंग वर्ष 1959 में भारत आए थे। उस यात्रा ने उनके जीवन की दिशा को बिल्कुल बदल दिया था। बंबई में उतरने के अगले दिन वे दिल्ली आ गए थे। यहां पर वे राजघाट और गांधी स्मृति भी गए। भारत आने के बाद उन्होंने गांधीवादी दर्शन का गहरा अध्ययन किया। गांधी को लेकर उनकी दिलचस्पी इस आधार पर बढ़ी कि एक इनसान जो अश्वेत नहीं था, उसने अश्वेतों के हकों के लिए इतनी लंबी लड़ाई क्यों लड़ी। दरअसल, गांधी के इसी पक्ष के चलते किंग उन्हें जानने को लेकर इतने गंभीर हुए। नेल्सन मंडेला और बराक ओबामा भी इसी वजह से गांधी को अपने नायक के रूप देखते हैं। किंग, उनकी पत्नी कोरेट्टा और किंग के जीवनीकार लॉरेंस रेड्डिक लगभग एक महीने के लिए भारत आए। वे 9 फरवरी, 1959 को बम्बई में उतरे और अगले दिन दिल्ली पहुंच गए। एक तरह से कहा जा सकता है कि इस घटना की पृष्ठभूमि बरसों पहले तैयार हो चुकी थी जब अटलांटा, जॉर्जिया के कॉलेज के किशोर छात्र मार्टिन ने अपने टीचर बेंजामिन एलाया मेज़ के मार्गदर्शन में पहली बार गांधी का लिखा साहित्य पढ़ा। मेज़ भारत की यात्रा से बहुत से अफ्रीकी-अमेरिकियों की तरह गांधी के शिष्य के रूप में लौटे थे। किंग के जीवन पर उनका बड़ा प्रभाव रहा। किंग ने लिखा है कि भारत यात्रा पर निकलते हुए उनके कुछ मित्रों ने कहा था कि मेरी असली परख तब होगी जब गांधी को करीब से जानने वाले लोग मुझे देखेंगे। किंग ने भारत यात्रा के दौरान हजारों लोगों से बातें की, लोगों ने उनसे ऑटोग्राफ लिए, गांव में गरीब के झोपड़े से लेकर महलों तक में उनका स्वागत हुआ। दरअसल जनवरी, 1959 में वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने उन्हें भारत यात्रा का निमंत्रण दिया। उसे स्वीकार करते वक्त किंग ने कहा था—मैं बाकी देशों में तो टूरिस्ट की तरह से जाता हूं, पर मैं भारत को तीर्थस्थल मानता हूं। इसी नाते मैं वहां पर जा रहा हूं। आकाशवाणी से अपने एक उद‍्बोधन में किंग ने कहा था कि गांधी के प्रेम और अहिंसा के सिद्धांत पर चले बिना दुनिया बर्बाद हो जाएगी। भारत से वापस लौटने के बाद उन्होंने इब्नॉय मैगजीन में लिखा था—मैं आम हिन्दुस्तानी की देश-दुनिया की जानकारी के स्तर बहुत प्रभावित हूं। उन्हें अमेरिका की जितनी जानकारी है, उतनी अमेरिकियों को भारत की नहीं होगी। भारत से वापस लौटने के बाद मेरा यकीन पक्का हो गया है कि अश्वेतों को उनके अधिकारों को दिलाने के लिए अहिंसा के अलावा कोई दूसरा हथियाऱ नहीं हो सकता। किंग की यात्रा की व्यवस्था गांधी नेशनल मेमोरियल और द अमेरिकन फ्रेंड्स सर्विस कमेटी ने मिलकर की थी। भारत सरकार उनकी मेजबान नहीं थी लेकिन पंडित नेहरू ने उन्हें भोज पर निमंत्रित किया। नेहरू के साथ रात्रिभोज के दौरान बिताए चार घंटों के दौरान भी किंग ने उनसे गांधी के अहिंसा के रास्ते को और करीब से जानने की चेष्टा की। भारत में बड़े पैमाने पर गरीबी को देखकर किंग चौंके थे। नई दिल्ली में 9 मार्च को अपनी अंतिम पत्रकार वार्ता में उन्होंने भारत का आह्वान किया कि वह निरस्त्रीकरण करके संसार के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करे। अजीब इत्तेफाक है कि गांधी और किंग जैसे शांति दूतों का अंत बेहद हिंसक तरीके से हुआ। 4 अप्रैल, 1968 को मार्टिन लूथर किंग अपने मोटल की बालकनी से झांककर मित्रों से बातचीत कर रहे थे कि उन्हें गोली मार दी गई और वह तुरन्त चल बसे। बहरहाल, गांधी और किंग इस संसार से जाने के बाद भी अपने विचारों के जरिए आने वाले सैकड़ों सालों तक जीवित रहेंगे।

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