कोरोना संक्रमण पर अमेरिका-चीन में तल्खी

वुहान से शुरू हुई जिस महामारी का भारत सामना कर रहा है उसका खुलासा तब हुआ जब वुहान में संक्रमण से ग्रस्त होकर 80,298 लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, जिनमें 3,245 की मौत हुई है। इस त्रासदी का जिम्मेवार ‘वुहान कोरोना वायरस’ बताया जा रहा है। हालिया रिपोर्ट बताती है कि मानवीय शरीर में कोरोना वायरस की प्रविष्टि चमगादड़, रेंगने वाले कुछ जीवों से हो सकती है। वुहान की हुआनान थोक सी-फूड मंडी में आमतौर पर इन जीवों का मांस बिकता आया है। जब वुहान में मानव क्षति हो रही थी और जब चीन इसका प्रभाव क्षेत्र सीमित और खत्म करने में जुटा था, अगर उसी वक्त वह तुरंत पारदर्शिता से बाकी दुनिया को आगाह कर देता तो बाकी देशों की तैयारी इस महासंकट का सामना करने के लिए आज के मुकाबले ज्यादा बेहतर हो सकती थी। नि:संदेह जिस तरीके से चीन ने वुहान में कोरोना से उत्पन्न हुई चुनौती को संभाला है, वह काबिलेतारीफ है। ऐसे समय में जब कोरोना को लेकर अंतर्राष्ट्रीय चिंता लगातार बढ़ रही है, वहीं चीन हालांकि महामारी की शुरुआत अपने यहां से तो मान रहा है लेकिन वुहान त्रासदी को भुनाते हुए भोंडे तरीके से अपनी छवि यह कहकर सुधारने की कोशिश कर रहा है कि वह वुहान में स्थिति बहुत जल्द सामान्य करने में सफल रहा है। कोरोना को लेकर अमेरिका-चीन संबंध खराब होने के साथ राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट कर कहा है कि अमेरिका दुनियाभर के उन मुल्कों के साथ पूरी ताकत से खड़ा है जो ‘चीनी वायरस’ से त्रस्त हुए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन ने भी अपने संबोधन में ‘चीनी वायरस’ बोलते हुए कहा कि अमेरिका उसे जिम्मेवार ठहराएगा, जिसने इसे दुनियाभर में फैलाया है। वुहान त्रासदी पर तल्ख होते हुए अमेरिका के विदेश मंत्री पोम्पियो ने इस संकट को वुहान वायरस का नतीजा बताया है। इसके बाद तो चीन-अमेरिका में आरोप-प्रत्यारोपों की झड़ी लग गई। प्रत्युत्तर में चीन ने कहा कि संभव है यह संकट अमेरिकियों के जरिए चीन में आया हो। आज अमेरिका की हालत यह है कि तेजी से बढ़ते संक्रमण की वजह से वहां के शहरों में लोग घरों के अंदर नजरबंद होने को मजबूर हो गए हैं। इसी बीच चीन-अमेरिका वाक‍्युद्ध भी तीखा होता जा रहा है। दरअसल, चीन इस बात पर की जा रही अपनी आलोचना के प्रति असहिष्णु है कि उसने कोरोना का पता चलने के बावजूद एक महीने से ज्यादा समय तक कुछ विशेष नहीं किया था। अमेरिका द्वारा यह कहना कि चीन ने हकीकत बताने में देर की है, ट्रंप प्रशासन और चीन के बीच तलवारें खिंच गई हैं। चीन चाहता है कि वुहान संकट का अंत करने में किए उसके प्रयासों को मान्यता देते हुए दुनिया उसकी तारीफ करे। यह अजीबोगरीब प्रयास उस वक्त किया गया जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव से बात की थी। चीनी मीडिया ने स्तुतिगान किया कि ऐसे समय में जब दुनियाभर में कोरोना का फैलाव हो रहा था उस वक्त वुहान में स्थिति को बहुत अच्छे ढंग से निपटा गया है। चीन हरचंद यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि वुहान से शुरू होकर जो संक्रमण वैश्विक महामारी में बदल गया है उसके लिए जो जिम्मेवारी बनती है, इस बात को और ज्यादा तूल न दिया जाए। वैसे भी यह समय दोषारोपण का नहीं है। इस गंभीर घड़ी में सभी देशों को एकजुट होना चाहिए ताकि मानव जाति पर पैदा हुए इस अभूतपूर्व संकट से संयुक्त रूप से निपटा जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने कोरोना वायरस से उत्पन्न होने वाले संकट से निपटने में अपने देश, दक्षिण एशियाई पड़ोसी मुल्कों और बाकी दुनिया के देशों के साथ संवाद किया है। यह एक योग्य प्रशासक के गुण हैं। सरकार ने विदेश नीति को कुशलतापूर्वक निभाया है। प्रधानमंत्री ने दक्षिण एशियाई और दक्षेस संगठन के सदस्य देशों को दरपेश चुनौती को लेकर उनके नेताओं के साथ वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संवाद किया है। इसके अलावा मोदी सरकार ने जी-20 देशों के साथ मिलकर कोरोना की चुनौती से निपटने में वैश्विक स्तर पर निर्णायक रूप से प्रयास करने की बात की है। भारत ने पर्दे के पीछे रहकर खामोशी से सऊदी अरब और अन्य मुल्कों के अलावा जी-20 के नेताओं के साथ टेली-काॅन्फ्रेंस के माध्यम से वार्ताएं की हैं। यह संकेत है कि सभी देश मिल-जुलकर कोरोना वायरस से लड़ाई करने को तैयार हैं। भारत के लोगों को प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन जहां भरोसा देने वाला था, वहीं उन्होंने भारत के लोगों को दरपेश होने जा रही गंभीर चुनौतियों और कुछ तकलीफों के बारे में भी बड़ी बेबाकी से आगाह किया है। दक्षेस देशों के साथ हुई वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग में पाक के अलावा सभी राष्ट्राध्यक्ष खुद प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इमरान खान, जो अपने पूर्ववर्ती समकक्षों की तुलना में भारत के प्रति ज्यादा तल्ख और नकारात्मक रुख रखते हैं, उन्होंने खुद भाग लेने की बजाय अपने कार्यालय में काम करने वाले एक अधिकारी डॉ. ज़फर मिर्जा को पाकिस्तान का प्रतिनिधि नियुक्त किया था। डॉ. मिर्जा के पास कोरोना पर कहने को कम ही था, इसकी बजाय उन्होंने मौजूदा हालात की दुश्वारियों को जम्मू-कश्मीर में टेलीकम्युनिकेशन और लोगों की आवाजाही पर लगाए गए प्रतिबंधों से जोड़कर पुराना कश्मीर राग छेड़ दिया। अलबत्ता प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो काॅन्फ्रेंस में समस्या की गंभीरता पर ही अपना ध्यान केंद्रित किए रखा। साथ ही दक्षेस सदस्यों को कोरोना महामारी से दरपेश मुसीबतों में भारत की ओर से दी जानी वाली सहायता की पेशकश की है। उन्होंने भारत की ओर से संयुक्त फंड में 1 करोड़ डॉलर का आरंभिक योगदान करने देने की बात कही है। नि:संदेह, भारत को पाकिस्तान के बेमानी बयानों पर और ज्यादा समय नहीं गंवाना चाहिए। अफगानिस्तान को ज्यादा मुश्किल का सामना कर पड़ रहा है क्योंकि ईरान के साथ लगती सीमा से होकर संक्रमित लोगों की घुसपैठ की संभावना बढ़ गई है। वहीं मालदीव और श्रीलंका को तुरंत सहायता की जरूरत है। मालदीव जिसका पर्यटन उद्योग कोरोना महामारी के चलते लगभग तबाह हो गया है। भारत की ओर से नेपाल, भूटान, मालदीव, श्रीलंका और अफगानिस्तान को मेडिकल इमदाद देने की तैयारी चल रही है, जिसमें मास्क, डिजीटल थर्मामीटर, दवाएं और सर्जिकल उपकरणों के अलावा विशेषज्ञ मेडिकल टीम भी शामिल है।

जी. पार्थसारथी

चीन, जो कोरोना त्रासदी से तेजी से उबर चुका है, वहीं अमेरिका और उसके यूरोपियन सहयोगी देश बुरी तरह कोरोना की भयावह स्थिति में चल रहे हैं, जबकि एशिया प्रशांत क्षेत्र में तीन मित्र देश जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर ने अभी तक कुछ हद तक अपने को बचाकर रखा है। हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने आगे पड़ने वाले लंबे रास्ते का खाका दिया है, लेकिन जब हम दावे से यह कहने लायक हो जाएंगे कि हम कोरोना के क्रूर चंगुल से बच निकले हैं, इसके लिए अभी बहुत दूरी तय करनी है। और इस सिलसिले में मेडिकल सुविधाओं को सुदृढ़ करना, कोरोना मरीजों के लिए विशेष अस्पताल और बिस्तरों के लिए फौरी नई जगह बनाना, जरूरी उपकरण जैसे कि वेंटिलेटर इत्यादि जुटाकर आसन्न चुनौती का सामना करने की जरूरत है। इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। नि:संदेह, मौजूदा संकट से उपजने वाली स्थितियों का असर मौजूदा पीढ़ी और शायद इनके बाद भी लंबे समय तक रहने वाला है।

लेखक पूर्व वरिष्ठ राजनयिक हैं।

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