कोचिंग को बढ़ावा मिलेगा नये फार्मूले से

इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा

शशांक द्विवेदी आईआईटी और केंद्रीय इंजीनियरिंग कालेजों में प्रवेश को लेकर आम राय से जो फार्मूला बना है वह देश में कोचिंग उद्योग को और भी ज्यादा बढ़ावा देने वाला है। प्रवेश परीक्षा के नये फार्मूले में अगले साल से बोर्ड परीक्षाओं के शीर्ष 20 प्रतिशत पर्सेंटाइल वाले छात्रों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के पहले चरण यानी कॉमन इंट्रेंस एग्जाम में शामिल होने की इजाजत होगी। फिर एकल दाखिला प्रक्रिया में शामिल हुए परीक्षार्थियों में से डेढ़ लाख छात्रों को योग्यता के आधार पर चुना जाएगा जो आईआईटी की अग्रिम परीक्षा में शामिल हो पाएंगे। इस नये फार्मूले से कोचिंग सेंटर मालिकों की पौ-बारह हो गयी क्योंकि अब छात्र तीन परीक्षाओं, 12वीं में अच्छे नंबर लाने के लिए, इंजीनियरिंग की एकल प्रवेश प्रक्रिया के लिए और आईआईटी की अग्रिम परीक्षा के लिए मजबूरी में कोचिंग करेंगे। ग्रामीण और सुविधाहीन छात्रों के लिए मुश्किलें बहुत बढं़ेगी क्योंकि देश के अधिकांश प्रदेशों में सरकारी माध्यमिक शिक्षा की स्थिति बहुत दयनीय है। देश के सरकारी विद्यालयों में या तो अध्यापक नहीं है यदि हैं तो उनमें से ज्यादातर विद्यालय में पढ़ाते नहीं। जबकि यही अध्यापक कोचिंग में बहुत अच्छा पढ़ाते हैं। कहने का मतलब है देश में सरकारी शिक्षा का बुनियादी ढांचा इतना कमजोर है कि वहां आप गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद ही नहीं कर सकते। ऐसे में गरीब छात्र भी कोचिंग के लिए मजबूर होंगे। निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच एक बड़ी खाई है। सरकार का यह फैसला गरीब विद्यार्थियों के विरुद्ध जाता है। नये परीक्षा पैटर्न से संबंधित नियम कोचिंग संस्थानों के लिए नए कारोबारी अवसर के तौर पर सामने आए हैं। इस समय कोचिंग संस्थानों ने तो अतिरिक्त सामग्री की आवश्यकता को देखते हुए अपने-अपने शुल्कों में भी इजाफा कर दिया है। बहुत जल्दबाजी में लिया गया यह फैसला वर्तमान सत्र में आईआईटी की तैयारी कर रहे छात्रों को हतोत्साहित करेगा और क्योंकि अब उन्हें आईआईटी में जाने के लिए त्रिस्तरीय परीक्षा की तैयारी करनी पड़ेगी जिसकी वजह से उन पर दबाव बढ़ेगा। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और कोचिंग से मुक्ति के लिए हमें देश में माध्यमिक शिक्षा के ढांचे को मजबूत करना पड़ेगा। उद्योग संगठन ऐसोचैम के एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में 70 फीसदी मां-बाप अपने बच्चों को कोचिंग दिलाना चाहते हैं। सर्वे के मुताबिक कोचिंग उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और अब उसकी लागत करीब 17000 करोड़ रुपए तक हो गई है। यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष और वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल कहते हैं, आपको महसूस कराया जा रहा है कि कोचिंग में सिखाए गए जवाबों से नंबर मिलने पर आप होशियार हो गए हैं, लेकिन ये रचनात्मकता और अलग सोचने की शक्ति को खत्म करता है, इस बड़े उद्योग ने शिक्षा का सत्यानाश कर दिया है। अब कोचिंग सफलता का फार्मूला बेचने का व्यापार कर रही है, जो शिक्षा व्यवस्था के भविष्य के लिए ठीक नहीं है। लेकिन इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा का नया फार्मूला देश के सभी छात्रों को कोचिंग की तरफ जाने के लिए मजबूर करेगा। गरीब और सुविधाहीन छात्रों को भी कर्ज लेकर कोचिंग लेनी ही पड़ेगी, बिना इसके सरकारी शिक्षा के बलबूते तो वे आईआईटी में जा नहीं पायेंगे। इसलिए इस व्यवस्था ने ग्रामीण और गरीब बच्चों के भविष्य के साथ कुठाराघात ही किया है। 'एक देश, एक प्रवेश परीक्षा' प्रणाली को कारगर बनाने के लिए पहले देश भर में 12वीं में एक सामान पाठ्यक्रम और मूल्यांकन की व्यवस्था करने की जरूरत है। देश में 44 स्टेट बोर्ड हैं। सबकी मूल्यांकन प्रक्रिया अलग है। पिछले दिनों देशभर में एक जैसी माध्यमिक शिक्षा प्रदान किए जाने की दिशा में योजना आयोग की शिक्षा पर गठित विशेषज्ञ समिति ने 12वीं कक्षा तक को माध्यमिक शिक्षा अभियान में शामिल कर पूरे देश में समान पाठ्यक्रम लागू करने की सिफारिश की है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा की मौजूदा प्रणाली 10+2+3 को गड़बड़ बताते हुए 10+5 या 10+7 जैसी व्यवस्था करने का भी सुझाव दिया गया है। इसके पीछे विचार यह है कि स्टूडेंट्स किस ट्रेड में जाना चाहते हैं वह दसवीं से ही तय हो जाए और तभी से उसी के अनुरूप पढ़ाई शुरू हो जाए। मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि सभी व्यावसायिक विषयों को इस व्यवस्था में लाने की कोशिश की जा रही है। इस व्यवस्था को 2017 तक पूरी तरह लागू कर देने की तैयारी है। वर्तमान में माध्यमिक शिक्षा हर राज्य अपने तरीके से चलाता है। देशभर में एक जैसी माध्यमिक शिक्षा प्रदान किए जाने की योजना काफी अच्छी है लेकिन यह कार्यरूप में क्रियान्वित हो पाती है या नहीं यह तो भविष्य ही बताएगा। ग्रामीण विद्यालयों में अब भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है तथा शिक्षकों की गुणवत्ता में कमी है। ऐसे में वहां के छात्रों को आईआईटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना आसान नहीं होगा। राज्य के बोर्डों के परिणाम हमेशा छात्रों की प्रतिभा को प्रतिबिम्बित नहीं करते हैं। अगर निजी, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा प्रणाली एक समान हो तो यह फैसला समझ में आ सकता था परंतु दुर्भाग्य से देश में ऐसा नहीं है। देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि देश में स्कूल तो हैं पर योग्य शिक्षक नहीं हैं, बच्चे तो हैं पर शिक्षा नहीं है। ऐसे में कैसे हम देश के निर्माण की कल्पना कर सकते हैं? भारत में 14 से 18 आयु वर्ग के समूह का अनुपात भारत की कुल जनसंख्या का 10 प्रतिशत है। राष्ट्रीय स्तरीय शैक्षिक सांख्यिकी प्रतिवेदन के अनुसार देश में माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 106084 तथा उच्च माध्यमिक विद्यालयों की संख्या 53619 है। फिलहाल इनमें पढऩे वाले विद्यार्थियों की कुल संख्या लगभग 4 करोड़ है जिसमें उतरोत्तर वृद्धि हो रही है। राष्ट्र के समग्र उत्थान के लिए पहले माध्यमिक शिक्षा को मजबूत करना होगा। माध्यमिक शिक्षा देश के विकास में प्रारंभिक और उच्च शिक्षा के बीच कड़ी का कार्य करके बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कोचिंग के जंजाल को खत्म करने के लिए हमें ठोस कदम उठाने होंगे। आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के दौर में हमारी माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता विश्व स्तरीय होनी चाहिए, इसके लिए सरकार को सकारात्मक पहल करनी होगी तभी देश में इंजीनियरिंग कालेजों में प्रवेश की प्रक्रिया पारदर्शी हो पायेगी। माध्यमिक शिक्षा को ठीक किये बिना कोई भी प्रयोग सिर्फ ऊपरी स्तर पर ही होंगे। आईआईटी और केंद्रीय इंजीनियरिंग कालेजों में प्रवेश लेकर बने नये फार्मूले पर सरकार को फिर से विचार करना चाहिए क्योंकि यह फैसला गरीब और सुविधाहीन छात्रों के लिए ठीक नहीं होगा और इससे कोचिंग उद्योग और भी ज्यादा मजबूती के साथ उभरेगा जिससे शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने का हमारा संकल्प अधूरा रहेगा।

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