किताब, घर और मैं

उठाती हूं मैं किताब सास रसोई में बर्तन खड़काती है ससुर की आंख खुलती और गालियों का तांडव भी मेरे हाथों में किताब अधिक कसी जाती है। भूमिकाएं कितनी आसान होती वे भूमिकाएं जो होती हैं हू-ब-हू तुम्हारे अपने जैसी। बहुत कठिन हैं निभाने वे किरदार जिन्हें निभाने की खातिर होना पड़ता किसी और की तरह। खाली जगहें ये खाली जगहें भी अजीब हैं कई वार डरते-डरते छोड़ देते हैं खाली और खाली जगहें रह जातीं सिर्फ खाली ही। कुछ खाली जगहें, सदैव खाली ही रहती हैं नियतिवश। खाली रहकर भी भरीपूरी होतीं ये अजीब खाली जगहें। कविता युद्ध में से जन्मती कविता कविता युद्ध को जन्म देती कविता युद्ध में हथियार बनती हथियारों को युद्ध देती है कविता। द्वंद्व अधिक से अधिक हो, मेहमान कमरे में सामान कम से कम आएं, घर में मेहमान सामान और मेहमान का यह कैसा द्वंद्व है? अनुवाद : फूलचंद मानव

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