कामवाली की बात

चेतना

सीख तो किसी से भी मिले, लेनी चाहिए। कहने का मतलब यह कि दूसरे का अनुभव आपको बड़ी से बड़ी मुसीबत से टाल सकता है। शायद दूसरे के अनुभव को भगवान की आकाशवाणी मानने में ही भलाई होती है। ऐसा सब नहीं मानते, पर पहली बार मैंने माना। तकरीबन पांच साल पुरानी बात है। मेरे घर की कामवाली इतना घुल-मिल गई है कि अपने परिवार से लेकर दूसरों के चौके-चूल्हे की सब बात बिना झिझक कर लेती है। साथ ही उसे यह भी भरोसा है कि यहां से बात कहीं और नहीं जाएगी। एक दिन वह रसोई में बर्तन साफ कर रही थी। तभी विम बार से सने हाथों में चाकू लेकर मेरे पास आई। उसे देख मैं डर गई। लगा मानो गीता, यही उसका नाम है, का कुछ और ही इरादा हो। वह तपाक से बोली-आप तो बहुत पढ़ी-लिखी हैं, समझदार हैं और चाकू। तब भी मैं नहीं समझी। हिचकिचाते हुए मैंने पूछा कि गीता क्या हुआ तुम्हें? तब वह बोली कि यदि मेरा हाथ कट जाता तो। आप बर्तनों में चाकू क्यों रखती हैं? मेरा ही नहीं, किसी का भी हाथ कट सकता है। मैं तो जल्दी-जल्दी काम निपटा रही थी, तभी अचानक मुझे नोक चुभी। देखा तो बर्तनों के बीच चाकू रखा था। ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। दीदी, चाकू और तेज़धार वाले औज़ारों को सिंक में न रखा करो। अगर एक बार हाथ कट गया तो कई दिन काम से छुट्टी अलग होगी और दर्द जो होगा सो अलग। डॉक्टर के पास जाने की नौबत भी आएगी। वाकई, कितनी सुंदर सीख दी गीता ने। आज इस बात को बीते चार साल हो गए हैं और मैंने चाकू उस दिन के बाद कभी सिंक में नहीं रखा। गीता की सीख को मैं तो अपनाती ही हूं और दूसरों को भी बताती हूं।

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