कहां गये वे देसी फल व सब्जियां

___होशियार सिंह

ग्रामीण क्षेत्रों की जान देसी सब्जियों एवं फलों का संसार अब सिमटता ही जा रहा है। वातावरण में आए परिवर्तन एवं अंधाधुंध प्रयोग किये जा रहे कीटनाशक एवं उर्वरकों  के चलते या तो वे पौधे ही लुप्त हो गए हैं या फिर उनकी संख्या नगण्य रह गई है। सूखे ने तो इनको समूल नष्ट करने में कसर नहीं छोड़ी है। ग्रामीण क्षेत्र यूं तो धरती का स्वर्ग माना जाता रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में   शुद्ध हवा, पानी, भोजन एवं फल-सब्जियां उपलब्ध होते हैं और देसी फल एवं सब्जियां सभी को लुभाते रहे हैं। इन फल एवं सब्जियों में बेर, गिलोट, टेंटी, पीचू, पील, सांगर, चौलाई, बाथू, श्रीआई, नूणखां, जंगली टिंडा, कचरी तथा कई अन्य लजीज सब्जियां मिलती थी किन्तु अब उनका संसार सिमटता जा रहा है। खेतों में बेरी पौधा मिलना स्वाभाविक होता है। इन बेरी के पौधों पर मीठे, रसीले और विभिन्न रंगों के बेर पाए जाते हैं। इन बेरों की संख्या तो अब घटती ही जा रही है। चने को कच्चे रूप में सब्जी व चटनी बनाने में काम में लेते थे,किन्तु अब चने उगाने ही बंद कर दिए हैं। वैसे भी चने की फसल की पैदावार नहीं के बराबर हो गई है। खरीफ की फसलों के साथ जंगल में उगने वाली चौलाई तथा श्रीआई भी अब लुप्तप्राय हो गई है। ग्रामीण लोग इन सब्जियों का जमकर उपभोग करते थे और खून की कमी जैसी बीमारियों से बच जाते थे। अब तो  इनके दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं और  लोग बाजार में आने वाली कीटनाशकों  से तैयार की गई फल एवं सब्जियों का  उपभोग कर रहे हैं और बीमारियों को निमंत्रण दे रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों में जाटी नामक पौधा सबसे अधिक मात्रा में मिलता है। इसी जाटी के फलों को सांगर नाम से पुकारा जाता है जो विभिन्न प्रकार की देसी सब्जियां बनाने में काम में लाया जाता था। यह फल सूख जाता था तो इसे झींझा नाम से जाना जाता है। इस सांगर एवं झींझा का भी ग्रामीण लोग जमकर उपभोग करते रहे हैं, किन्तु अब न तो सांगर लगता है और न ही झींझा बनती हैं। टेंटी ग्रामीण क्षेत्रों का उत्तम फल एवं सब्जी होता था। जब तक कैर के फल कच्चे होते हैं तब तक वे टैंटी कहलाते हैं और पक जाने के बाद उन्हें पीचू नाम से जाना जाता है। जहां कच्चा फल स्वाद में कड़वा होता है, वहीं पक जाने पर इसका स्वाद मीठा  हो जाता है। कैर के फूल भी सब्जी के रूप में काम में लाए जाते हैं। टैंटी को अचार, सब्जी एवं दवाओं में काम में लाया जाता है। उधर, पकने के बाद पीचू का स्वाद ही कुछ अनोखा होता है जिसे बच्चे और बड़े चाव से खाते थे। अब ग्रामीण क्षेत्रों की 'बणियांÓ ही समाप्त कर दी गई हैं या फिर उनमें कैर नाममात्र के ही मिलते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में एक बढिय़ा फल पील होता है। यह फल जाल नामक पौधों पर लगते हैं। ये फल कई रंगों के होते हैं, जिनमें लाल, पीला, सफेद तथा हरे रंग के फल आमजन को बड़े लुभाते रहे हैं, किंतु अब जालों पर पील लगने ही बंद हो गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में गिलोट भी एक फल होता था जो जंगल में स्वयं उत्पन्न होता था। जंगलों में खरीफ फसल के साथ कचरी तथा जंगली टिंडा भारी मात्रा में उत्पन्न होता था किन्तु अब न तो जंगली टिंडा ही बचा है और न कचरी। लोग इनके लिए तरस गए हैं। इस क्षेत्र में सबसे अधिक  मात्रा में होने वाला नूणखां भी लगभग समाप्त हो गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इनसे देसी सब्जियां बनाते थे और जीभर  खाते थे। अनेक और  भी देशी फल एवं सब्जियां भी अब लुप्तप्राय हो चुकी हैं। किसान और ग्रामीण अकसर चर्चा करते हैं कि ये फल एवं सब्जियां कहां चली गई? सच्चाई तो यह है कि किसानों ने खुद ही इनको अपने खेतों  से समाप्त कर दिया है, क्योंकि अत्यधिक मात्रा में प्रयोग किया जा रहा खाद, उर्वरक, पीड़कनाशी, रासायनिक दवाएं तथा कई अन्य दवाओं ने उनको लुप्त कर दिया है।   मौसम में हो रहे परिवर्तन के चलते भी ऐसा हो रहा है। किसानों ने स्वयं ही उन पेड़-पौधों एवं जड़ी-बूटियों का विनाश कर दिया है जो उसके लिए लाभप्रद होते हैं। देसी फल एवं सब्जियां ही नहीं, अपितु देसी अन्न उपजाना भी बंद कर दिया है। जनसंख्या बढऩे के कारण उसका पेट भरना भी जरूरी हो गया है। ऐसे में पेट तो भर दिया गया है किन्तु स्वाद गायब हो गया है। ऐसे में अब किसान पुराने स्वाद को ढूंढऩे लगेे हैं, किन्तु सफलता नहीं मिल पा रही है। किसान की एक और मजबूरी है—अधिक पैदावार लेने और अपने परिवार का पेट पालने के लिए अत्यधिक खाद एवं पीड़कनाशियों का उपयोग जिन्होंने देसी सब्जियों का विनाश कर डाला। बारिश की कमी और बारिश न होने के कारण भी देसी सब्जियां गायब हो गयी हैं। जब कभी कम मात्रा में बारिश होती है तो जंगली फल एवं सब्जियां उगती हैं किन्तु पुन: बारिश न होने के कारण भूमि के ऊपर उगे फल एवं सब्जियां गायब हो गई, वहीं भूमि से भी बीज ही गायब हो गया है।

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