करतारपुर के संदेश को जीवंत बनायें

रूपिंदर सिंह

सिख पंथ की रोजाना होने वाली अरदास में एक अभिन्न अंग—‘हे ईश्वर! गुरु नानक देव जी के अनुयायियों को जिन गुरुधामों से जुदा होना पड़ा है, उनके खुले दर्शन-दीदार करने का वरदान दीजिए।’ इस किस्म की विनती की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि देश बंटवारे में पंजाब और इसकी आबादी के दो टुकड़े हो गए थे, अनेक ऐतिहासिक पवित्र गुरुद्वारे पाकिस्तान की सीमा के अंदर रह गए थे और सिखों की पहंुच इन तक बंद हो गयी थी। ननकाना साहिब वह जगह है, जहां गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था और करतारपुर, जिसकी नींव खुद उन्होंने डाली थी, वह दो दशकों तक उनकी कर्मभूमि रही और इसी जगह पर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के बाद उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली थी, इसलिए इस स्थान की महत्ता सिख पंथ के लिए अपने पहले गुरु के यादगारी गुरुद्वारों में बहुत ज्यादा है। गुरु नानक देव जी और उनके बाद आए गुरुओं की याद से जुड़े अनेकानेक गुरुद्वारे हैं, जिनके दर्शनों से उन्हें 1947 के बाद से महरूम रहना पड़ा है। वहां जाने की आस के कारण अरदास में उपरोक्त वर्णित पंक्तियां जोड़नी पड़ी हैं। इसलिए जब कभी भी सिखों को इन गुरुधामों की यात्रा का मौका मिलता है तो उनका उत्साह और खुशी लाज़िमी है, खासकर जब मौका गुरु नानक देव जी की 550वें जन्मदिवस का हो। प्रारंभ : जब स्थापना के समय के करतारपुर की कल्पना करें तो यूं लगता है मानो खुद ईश्वर का निवास स्थल हो। उस वक्त वहां बसने आए लोगों में अधिकांश वे थे, जिन्होंने खुद को और अपने परिवार को गुरुजी और उनकी शिक्षाओं के प्रति समर्पित कर दिया था। गुरुजी की माता तृप्ता और उनकी पत्नी बीबी सुलखनी और उनके दो बेटे श्रीचंद और लक्ष्मी चंद भी उनके साथ रहते थे। वे एक ठेठ पंजाबी किसान की जिंदगी जिया करते थे। गुरुजी, उनका परिवार और उनके अनुयायी ठीक वही जिंदगी जी रहे थे जैसी कायदे से जीनी चाहिए और उनके अनुयायी किस तरह के थे? पांचवें गुरु अर्जन देव ने उन्हें ‘संत’ की उपाधि दी है यानी वे लोग जो सच के साथ जीते हैं। जाहिर है करतारपुर से खिंचे बहुत से लोग वहां आते थे लेकिन बसे हुए वही थे जो वाकई में प्रतिबद्ध थे। उन्होंने खुद को एकमेव जगत-रचयिता के प्रति समर्पित कर दिया था। कामकाज के साथ गुरु नानक की वाणी का गायन करते रहते थे क्योंकि वे सही मायनों में जिंदगी के दुनियावी और आध्यात्मिक पक्षों से खुद को जोड़कर रखना चाहते थे। जो कोई भी मिलने आता था गुरुजी उससे मिलते थे, इनमें कई जिज्ञासु थे तो कुछ पाने की इच्छा रखने वाले और अनुयायी भी होते थे। यहां गुरुजी की वाणी को लिखा, पढ़ा और गाया जाता था। अब खुद गुरु नानक देव जी अपने उस परिवार से साथ समय व्यतीत कर रहे थे, जिससे उन्हें अपनी उदासियों (यात्राओं) की वजह से दूर रहना पड़ा था, इस सिलसिले में वे दक्षिण में श्रीलंका, उत्तर मंे तिब्बत, पूरब में बांग्लादेश तो पश्चिम में सुदूर सऊदी अरब तक गए थे। करतारपुर में पुण्यशीलता की वर्षा होती थी। ‘सृष्टि का रचनाकार एक ही ईश्वर है’, इस सच पर यकीन रखने वाले वहां के बांशिदे रूहानियत का अनुगमन करते और अपनी जरूरतें खुद पूरी करते हुए सच मायनों में जिंदगी जी रहे थे। यहीं से संगत, पंगत और लंगर की शुरुआत हुई थी, वे रीतें जो आगे चलकर यहां पर संस्थागत बनीं। यह करतारपुर की संगत की सामूहिक भावना थी जो गुरु नानक द्वारा बसाए इस नगर से बाकी संसार तक पहुंची थी। यह भावना आगे चलकर अन्य सांसारिक रूपों में ढलती गई। गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारियों ने भी नये शहर बसाए। उन सभी ने भी वहां करतारपुर जैसा वातावरण बनाने का प्रयास किया। दरबार साहिब, करतारपुर : करतारपुर में बने गुरुद्वारे का सिख चित्त में विशेष स्थान है। देश का बंटवारा होने तक इसकी काफी सेवा-संभाल होती थी। विभाजन से ठीक पहले सिख नेतृत्व ने ब्रितानी हुकूमत से पाकिस्तान की सीमा में रह जाने वाले सभी गुरुद्वारों तक मुक्त पहुंच बनाए रखने का इंतजाम करने की पुरजोर अपीलें-दलीलें की थीं। दिवंगत न्यायमूर्ति तेजा सिंह ने सीमा निर्धारण आयोग के सामने पेश की गई अपनी अपील में कहा था ः ‘सिखों के लिए अमृतसर शहर, शेखूपुरा जिले में ननकाना साहिब और गुरदासपुर जिले की शहारगढ़ तहसील में करतारपुर का महत्व वही है जो मुसलमानों के लिए मक्का-मदीना का और हिंदुओं के लिए बनारस एवं हरिद्वार का है।’ लेकिन इन दलीलों और यहां तक कि ननकाना साहिब में हुए भारी प्रदर्शनों में कई जानें गंवाने के बावजूद कोई असर नहीं हुआ था। विभाजन के बाद पाक स्थित गुरुद्वारे और उनसे जुड़ी जमीन-जायदादों को ‘पलायनकर्ताओं की जायदाद’ की श्रेणी में रखा गया था। आने वाले सालों में भू-राजनीतिक समीकरणों और धार्मिक पर्यटन की संभावना से हालांकि, परिदृश्य में कुछ बदलाव आया था, परंतु भौतिक रूप से यह जगहें भारत-पाक रिश्तों के उतार-चढ़ाव में फंसकर रह गई थीं। पिछले कुछ महीने सिखों के लिए बहुत उम्मीद से भरे थे। दरबार साहिब, करतारपुर के आसपास का ढांचा-परिदृश्य बदल गया, सुल्तानपुर लोधी शहर को संवारा गया। दोनों देशों ने मतभेदों को एक किनारे रखकर यात्रियों के लिए इंतजाम हेतु अनेक व्यवहार संहिताएं बनाई हैं। आम सिख तो उस दिन का इंतजार कर रहा था जब वह इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में अपनी अकीदत पेश कर पाएगा। 550वां गुरुपर्व मनाना : गुरु नानक का करतारपुर उन सिद्धांतों के बोध का स्थान था, जिसमें कहा गया कि ‘सृष्टि का रचनाकार और उसकी रचना एक ही है’। यह ऐसा मर्यादामय स्थान था, जहां जाति-पाती और लिंगभेद से बनायी गई बनावटी असमानताओं को खत्म किया गया था, ‘हर प्राणी में ईश्वर का वास है’ इस सिद्धांत को स्वीकार करने वाले गुरुनानक के अनुयायियों से उम्मीद की जाती थी कि वे इस शिक्षा को आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक रूप से आत्मसात करेंगे। गुरुजी का 550वां जन्मदिवस अनुयायियों के लिए मौका है कि ऐसी नई लहर बनाएं जो उनके नजरिए के अनुरूप हो, जो उनकी शिक्षाओं का प्रतिरूप हो और ऐसा साहित्य प्रकाशित करें, जिससे कि अन्य लोग भी सिख पंथ के संस्थापक के बारे में जान पाएं। गुरुजी की दृष्टि समरसता वाली थी। जो कोई भी उनका नाम इस्तेमाल कर खुद का फायदा करना चाहते हैं, वे इस समता वाली भावना से कोसों दूर हैं। मौजूदा समय में जिस तरह के कार्यक्रम पेश किए गए हैं, उनमें गुरुजी के नजरिए की छाया तक ढूंढ़े नहीं मिल रही है। श्रेय लेने की होड़ शोचनीय है। इसके लिए हम नेताओं को दोष देते आए हैं, लेकिन एक सिख होने के नाते यह लिख रहा हूं कि यह समय आत्मविश्लेषण करने का है। क्या हम गुरुजी की मूल शिक्षा को रोजाना की जिंदगी में ढाल पाए? क्या हम फिर से उन्हीं रीति-रिवाजों में नहीं फंस गए जो गुरुजी के निर्देशों को परिलक्षित नहीं करते? दुनियाभर से सबसे ज्यादा सिखों की गिनती भारत के पंजाब में है। परंतु आज यह वह सूबा बन चुका है, जहां पर्यावरण-प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन हो रहा है, पराली जलाकर वातावरण में विषाक्त धुआं फैलाया जा रहा है। शिक्षा के स्तर में गिरावट हैै, नैतिकता में ह्रास और नशे की लत भावी पीढ़ी को खोखला कर रही है। आज हम गुरुजी और उनकी शिक्षाओं को बनावटी ढंग से जी रहे हैं। अब समय है उनका सच्चा अनुयायी बना जाए, गरीब की बांह पकड़ी जाए और भौतिकवाद जाल से मुक्त हों। दुनियाभर के सिख गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर जाना और वहां सेवा करना चाहते हैं। आज एक संकरे गलियारे की मार्फत तो हम उस जगह से जुड़ पाए हैं, जहां रहकर गुरुजी ने हमें सही मायने में जिंदगी कैसी जी जाए, इसका ढंग सिखाया था, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक वैसा संकरा गलियारा ऐसा भी है जो हमारे अंतस में बना हुआ है, वह हमें गुरुजी की शिक्षाओं की भावना से दूर लेकर जाता है, उसको पाटना होगा। गुरु नानक देव जी के प्रति असली श्रद्धांजलि यही है कि हम उनकी शिक्षा के प्रति खुद को प्रतिबद्ध करें। अपने सद‍्चरित्र के बूते अलग पहचान बनाएं। अपने अहं पर जीत पाएं और केवल सर्वशक्तिमान परमात्मा के सामने ही शीश झुकाएं न कि किसी मठाधीश या बाबा किस्म के लोगों के सामने। इस कामना के साथ कि गुरुजी का 550वां जन्मदिवस का अवसर उनके अनुयायियों की असल कायाकल्प प्रकिया की शुरुआत करे, उनको नमन है।

लेखक दि ट्रिब्यून में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं।

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