कम नहीं किताबों के कद्रदान

अभिषेक कुमार सिंह

किताब संग डेट पर चलेंगे? यह सवाल थोड़ा अजीब है पर पुस्तक मेलों से लेकर जयपुर, भोपाल, पटना, कोलकाता, लखनऊ, चंडीगढ़ से लेकर हरिद्वार तक में आयोजित होने वाले लिट-फेस्ट पर नज़र डालें तो लगता है कि किताब के साथ डेट करने के इच्छुक लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले से भी लग रहा है कि किताबें एक बार फिर डिमांड में हैं। यहां हर कोई कागज़ पर छपे सम्मोहक शब्दों के संग दोस्ती की खोज में आया हुआ है। दावा है कि अब से कुछ साल पहले तक कई दशकों का ऐसा दौर चला, जहां कम से कम हिंदी में तो पाठक खोजे नहीं मिलते थे और किताबें सिर्फ लाइब्रेरियों की शोभा बढ़ाती थीं। लेकिन अब पुस्तक मेलों, साहित्य महोत्सवों को मिलने वाली चर्चा और उनमें उमड़ने वाली भीड़ बता रही है कि चुनौतियां चाहे जितनी हों, किताबों के कद्रदानों की कोई कमी नहीं है।एक मुहावरा है कि किताबें इनसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं और एक अच्छे दोस्त की तलाश तो सभी को होती है। एक ज़माना था जब लोग अपने शौक़ के लिए किताबें लिखते थे। वे जिंदगी के अपने तजुर्बे को साहित्य की विभिन्न शैलियों और विधाओं को अपनाते हुए किताब की शक्ल में लाते थे और उन्हें पढ़कर लोग आह-वाह करते थे। लेकिन फिर एक दौर ऐसा भी आया, जब किताबें खालिस बिजनेस का जरिया बनकर रह गईं। एक तरफ वह लेखक था जो किसी मंडली का मुखिया हुआ करता था या किताबों की सरकारी खरीद उसके इशारे पर हुआ करती थी, तो दूसरी तरफ वे प्रकाशक थे, जिन्हें अच्छी रचना या अच्छे साहित्य से ज्यादा मतलब इस बात से था कि किस तरह जुगाड़ लगाकर उनकी छापी किताबों को लाइब्रेरियों में खपाया जाए। इस पूरे बिजनेस में वह पाठक केंद्र में कभी नहीं रहा, जिसे अच्छा लिटरेचर पढ़ने की भूख थी। चूंकि पूरा का पूरा प्रकाशन जगत स्कूल-कॉलेज और दफ्तरों के पुस्तकालयों के लिए होने वाली सरकारी थोक खरीद पर आकर टिक गया था, लिहाजा वहां केवल वही किताब प्राथमिकता में थी जिसे लाइब्रेरी में खरीदा जाता है। पांच-छह दशक तक चले इस सिलसिले में कई ऐसे लेखक भी महान बन गए, जिनका कोई पाठक वर्ग तो नहीं था, लेकिन पुस्तकालयों के लिए किताब-चयन समिति में बैठे लोगों के ये प्रिय हुआ करते थे। इससे पाठक और उपेक्षित हुआ। साथ ही वे लेखक भी हाशिये पर चले गए जो पाठकों के लिए लिखते थे, न कि पुस्तकालयों के लिए। इसके अलावा सरकारी खरीद के बल पर लाइब्रेरियों में पहुंची बेहद प्रशंसित, बेहद सम्मानित और बेहद नामी लेखकों की पुस्तकें जब आम पाठकों ने पढ़ीं, तो उन्हें किताबें छल करती लगीं। उन्हें इसका अहसास हुआ कि ये किताबें वे नहीं थीं, जो प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा जैसे लेखक लिखते थे। बल्कि ये उन कथित “महान” लेखकों की थीं, जिन्हें उनके और प्रकाशक के रचे छद्म ने चोटी पर बिठाया था, उनकी रचना ने नहीं। पाठकों का भ्रम टूटा तो वह किताबों से विमुख होता चला गया। ऐसे लेखक भी किताब छपवाने के सिलसिले से दूर हो गए जो असल में पाठकों के लिए लिखते थे।

तलाश पाठक की गौर करें कि इस पूरे दौर में पब्लिशरों ने जिस बात का सबसे ज्यादा रोना रोया है, वह यही है कि उनकी किताबों के पाठक नहीं हैं। खास तौर से हिंदी में। लेकिन इसके लिए पाठकों को कठघरे में लाना सरासर नाइंसाफी है। जब उसे किताबों से अपने मन की चाही चीज़ें नहीं मिलेंगी तो वह उन्हें भला क्यों खरीदना और पढ़ना चाहेगा। पाठकों के इस अलगाव का प्रकाशकों ने खूब फायदा उठाया। उन्होंने रद्दी साहित्य को रद्दी कागज़ पर छापा और गठजोड़ के बल पर मनमाने दामों में उन किताबों को उन लाइब्रेरियों में भर दिया, जहां वे सिर्फ धूल खा सकती थीं। यही नहीं, इस दौर में हालत यह हो गई कि पुस्तक मेले लगते तो उनमें बच्चे और युवा किताबें कम, स्टेशनरी खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। बीते पांच-छह दशक इसी के लिए जाने जाएंगे कि इस दौरान सरकारी खरीद के लिए प्रकाशक-एजेंट-लेखकीय गठजोड़ ने उस किताब को मार दिया, जो पाठकों की जिंदगी में नई रोशनी भरती थी। बीते जमाने के कई फिल्मी मेलों में अक्सर लोग बिछड़ते थे, पर कुछ अरसा पहले तक जो पुस्तक मेले देश में होते थे, उनमें असल में गुमशुदा पाठक की तलाश रहती थी। ऐसे पाठकों को खोजा जाता था जो कायदे की किताबें खरीदकर पढ़ना जानता है। ऐसे पाठक खोजे जाते थे जो पुस्तक मेले से लाई किताबों को पढ़ते हुए रात में सिरहाने रखकर अक्सर सो जाया करता था। ऐसे पाठकों को ढूंढ़ा जाता था जो किताबों को ड्राइंग रूम में या कॉफी-टेबल पर सजाने के लिए नहीं बल्कि उनमें रचे तिलिस्म को गहराई से खोजने के लिए खरीदता था। इन वजहों से हमारे देश में खासकर हिंदी पट्टी में एक आम धारणा बनी कि लोगों ने पढ़ना बंद कर दिया है। पर साफ है कि बात यह नहीं थी। पाठक हमेशा अच्छी किताबों की तलाश में रहा है और जैसे ही कुछ बेहतरीन किताबों के सामने आने का सिलसिला बना है, किताबों को पाठकों का संकट नहीं रहा है। इस बारे में एक आकलन बुक-फेरी नामक मुहिम चलाने वाली लंदन के हैंपशायर की निवासी क्रोडेलिया ऑक्सले का है। वर्ष 2012 से एक परी के रूप में किताबों को पेश करने के विशिष्ट आइडिए को अमल में लाने वाली क्रोडेलिया बताती हैं कि लंदन में ही बीते तीन-चार वर्षों में किताबों की बिक्री बेतहाशा बढ़ी है। खास बात यह है कि लोगों ने किताबों की दुकानों पर और पुस्तक मेलों में जाना शुरू किया है। भारत में विविध सर्वेक्षण करने वाली संस्था नीलसन की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत किताबों का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है और यहां अंग्रेजी भाषा में ही 9 हजार से अधिक प्रकाशक हैं जो साल भर में 90 हजार किताबें छापते हैं। इसी तरह इंटरनेशनल पब्लिशर्स एसोसिएशन की रिपोर्ट है कि वर्ष 2017 में भारत में किताबों का 6.9 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि शैक्षिक संस्थानों के अलावा आम लोगों ने भी किताबें खरीदने में खासी रुचि दिखाई है और पाठकों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसी का असर छोटे शहरों में तेजी से शुरू हुए पुस्तक मेलों में भी दिखाई देता है।

इंटरनेट ने बदला निज़ाम प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद से किताब की जो छवि हमारे दिमाग में रही है, वह कागज पर छपी और एक आकर्षक कवर के साथ बाइंडिंग की गई (जिल्द चढ़ी) किताब की है। ध्यान रहे कि किताब की शक्ल में क्या लिखा जा रहा है या लिखा जाएगा, यह तय करने में भी उस तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिसके जरिए लिखा हुआ पाठक तक पहुंचता है। इसलिए जब इंटरनेट आया और ई-बुक्स की शुरुआत हुई, तो पहली आशंका यही उठी कि कागज वाली किताबों के दिन अब लदने वाले हैं। यही नहीं, किताब खरीद के उस निजाम के भी तबाह होने की आशंका जताई गई, जो सदियों से देश में बना हुआ था। यह तथ्य भी बेहद उल्लेखनीय है कि हमारे देश में ऑनलाइन खरीदारी की शुरुआत किताबों के कारोबार से हुई थी- फ्लिपकार्ट का आविष्कार इसके जरिये किताबें बेचने के लिए हुआ था- इस तथ्य को जानकर आज शायद कई लोग हैरान हो जाएं। पर जब इंटरनेट और ई-बुक्स का दौर आया तो दुनिया में हर कोई कहता था कि आने वाले वक्त में सबसे बड़ी चुनौती ई-बुक्स से मिलेगी। कहा गया कि इससे लेखक-पाठक का रिश्ता तो मजबूत होगा, लेकिन प्रकाशक की इजारेदारी कम हो जाएगी। बेशक, इंटरनेट ने किताबों के मामले में कुछ चीज़ें तो बदल ही दी हैं। जैसे, आज हर कोई जब चाहे, एक क्लिक से अपनी मनपसंद किताबें घर बैठे मंगवा सकता है। किताबों को ऑनलाइन बेचना अपने आप में एक व्यापार बन गया है। इंटरनेट की बड़ी होती लकीर और फेसबुक-ट्विटर- इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया ने साहित्य को समाज के बेहद करीब ला खड़ा किया है। इससे ‘कमर्शियल फिक्शन’ लिखने वाले उन लेखकों की चांदी हो गई है, जिन्होंने इंटरनेट को अपने फायदे के लिए और अपनी किताबों को चर्चा दिलाने के लिए इस्तेमाल करना सीख लिया है। इसीलिए चेतन भगत और अमीश त्रिपाठी जैसे लेखकों की किताबों की लाखों प्रतियां शहरों से लेकर गांव-कस्बों तक जा पहुंची हैं। ये लेखक अंग्रेजी के हैं, लेकिन पहले अंग्रेजी साहित्य से आक्रांत रहने वाला हिंदी पाठक भी अब इन अंग्रेजी लेखकों की हिंदी में अनूदित रचनाएं पढ़ने या ड्राइंगरूमों में सजाने का सुख पा रहा है। इंटरनेट की पहुंच के कारण आम तौर पर ‘बड़े-बड़े’ लेखकों को छोटे-छोटे पुस्तकालयों में खपा देने वाले प्रकाशकों ने भी बाजार की ओर देखना शुरू कर दिया है। इंटरनेट ने धीरे-धीरे बड़े पैमाने पर हिंदी-जगत को प्रभावित करना शुरू कर दिया है और कहा जा रहा है कि आने वाले समय में उसकी भूमिका निर्णायक होने वाली है। अब हिंदी की समस्या यह नहीं रही है कि उसके पाठक कम हैं, बल्कि समस्या यह है कि उसके लेखकों में लोकप्रिय होने का माद्दा नहीं है या उन्हें इंटरनेट से चर्चा पाकर फायदा उठाने के ज्यादा गुर अभी पता नहीं हैं। अन्यथा वे भी साल में 10 लाख प्रतियों को बेचकर मुनाफा काटने की हैसियत में आ चुके होते।

डिजिटल युग में भी नहीं बदली किताबें इस बीच एक डर बेबुनियाद साबित हुआ है कि इंटरनेट के जरिए आने वाली डिजिटल किताबें यानी ई-बुक्स असली किताबों को खा जाएंगी– जिसकी आशंका कुछ साल पहले सबसे ज्यादा थी। कहा जा रहा था कि युवा पीढ़ी इलेक्ट्रोनिक फॉर्म में किताबें पढ़ना ज्यादा पसंद करेगी, ये बातें गलत साबित हो रही हैं। वर्ष 2018 में अमेरिकी जर्नल ‘इलेक्ट्रॉनिक मार्केट्स’ में छपे एक वृहद सर्वेक्षण के मुताबिक, आज की युवा पीढ़ी भी ई-रीडर्स के बजाय कागजी किताबों को ज्यादा तवज्जो देती है और उनके बीच यह क्रेज़ उनसे ज्यादा उम्र के लोगों से भी अधिक है। इस शोध में शामिल रही अमेरिका के एरिजोना विश्वविद्यालय की संयुक्त प्रोफेसर सब्रीना हेल्म ने बताया कि किताबों के मामले में ‘स्वामित्व’ का फैक्टर काफी अहम भूमिका निभाता है। यानी अगर लोगों का किसी किताब पर पूरा नियंत्रण नहीं है तो उसे वे प्राथमिकता नहीं देते हैं। चूंकि डिजिटल बुक्स या ई-बुक्स की अपनी सीमाएं हैं, जैसे इन्हें दोस्तों के साथ शेयर करना, गिफ्ट करना और सर्कुलेट करना कठिन है। साथ ही इन किताबों की बिक्री भी नहीं की जा सकती जो इनकी वैल्यू और कम करता है। पहले ऐसा लग रहा था कि साहित्य इंटरनेट के साथ युद्ध में है, लेकिन संभावनाओं और आशंकाओं के विपरीत छपी हुई किताबें अपने नवागत बिरादर ई-बुक के साथ अब भी अस्तित्व में हैं। यही नहीं, डिजिटल तकनीक के माध्यम से और उसकी मदद से प्रकाशक और वितरक किताबों को नए पाठकों तक पहुंचा रहे हैं। सच तो यह है कि ई-बुक्स, ऑडियो पुस्तक, हार्ड बाउंड किताबें तथा पेपर बैक किताबें, ये सब अलग-अलग चीजें हैं और सभी का बाजार भी अलग-अलग है। जिसको जो जहां से चाहिए, आज उसे वो बाजार से मिल रहा है। वक्त के साथ किताब के जो नए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम आए हैं, वे अपने पुराने माध्यमों (छपी कागज़ी किताबों) के समानांतर अपनी जगह बना रहे हैं, लेकिन उनसे कागज की किताबों की बिक्री कम नहीं हुई है। बल्कि प्रचार-प्रसार के ज्यादा मौके मिलने से उनकी चर्चा, पहुंच और खरीद, सभी में इजाफा हुआ है और सच में किताबें अब सबसे से ज्यादा जीने लगी हैं।

विवाद का तड़का बनाए बेस्ट सेलर हमारे देश में किताबों के मामले में बेस्ट-सेलर की टैगिंग पहले नहीं होती थी। इसे बीते आठ-दस वर्षों की देन माना जा सकता है, जब बेस्ट-सेलर लेखकों और बेस्ट-सेलर किताबों की चर्चा उठने लगी है। प्रकाशक के लिए बेस्ट-सेलर किताब बेचना आसान होता है, तो लेखक के लिए खुद को बेस्ट-सेलर कहना गर्व की अनुभूति कराने वाला होता है- शर्म की नहीं क्योंकि अब तो यह एक बाजार है और बाजार के इस हमाम में सब नंगे हैं। लेकिन कोई लेखक या किताब बेस्ट-सेलर कैसे बने? आसान फॉर्मूला है—किसी तरह किताब को विवाद में खींच लाइए। जब फिल्में विवादित होकर हिट हो सकती हैं, तो किताबें क्यों नहीं। करीब पांच साल पहले 2015 में पूर्व कांग्रेसी और गांधी परिवार के करीबी नेता नटवर सिंह की आत्मकथा की शक्ल में आई किताब ‘वन लाइफ इज नॉट एनफ’ औपचारिक तौर पर रिलीज भी नहीं हुई थी, फिर भी किताब की 50 हजार प्रतियां बुक हो चुकी थीं। नटवर सिंह नामी साहित्यकार नहीं थे, लेकिन किताब की लॉन्चिंग से ऐन पहले नटवर सिंह ने सोनिया गांधी के पीएम न बनने के फैसले पर खुलासे करके हंगामा मचा दिया था। कुछ ऐसी ही चीजें पीएमओ के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के बाजार में आने से पहले की गईं। बारू ने अपनी इस किताब में मनमोहन सिंह को कमजोर पीएम और सोनिया गांधी को ताकतवर बताया था, जिससे विवाद उठ खड़ा हुआ। स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित अपनी किताब ‘द रेड साड़ी’ (एल सारी रोजो) में दावा किया कि राजीव गांधी की मौत ने सोनिया को ऐसा झकझोरा कि वे फौरन सब कुछ समेट कर वापस अपने मुल्क जाने की सोचने लगी थीं। इस तथ्य से किताब को बेहिसाब चर्चा और बिक्री नसीब हुई। पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने अपनी किताब ‘जिन्ना : इंडिया पार्टिशन इंडिपेंडेंस’ में ऐसे विवादित तथ्य डाले, जिनके कारण उन्हें किताब के लिए अपनी ही पार्टी की आलोचना झेलनी पड़ी लेकिन लॉन्च होने के तीन हफ्ते में करीब 50 हजार कॉपियां भारत में और 12-13 हजार कॉपियां पाकिस्तान में ही बिक गईं। खिलाड़ियों ने भी अपनी किताबों के लिए विवादों को खूब हवा दी है। जैसे रिकी पॉन्टिंग की आत्मकथा ‘पॉन्टिंग एट द क्लोज ऑफ प्ले’ और मैथ्यू हेडन की ‘स्टैंडिंग माया ग्राउंड’ में किया गया। क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की आत्मकथा ‘प्लेइंग इट माइ वे’ को विवाद में खींचने के लिए प्रकाशक ने किताब को औपचारिक तौर पर बाजार में उतारने से पहले उसके कुछ अंश लीक कर दिए, जिससे किताब की रातोंरात प्री-बुकिंग बढ़ गई। सचिन की किताब में तत्कालीन भारतीय क्रिकेट टीम के कोच ग्रैग चैपल द्वारा सौरभ गांगुली के अपमान, राहुल द्रविड़ की कप्तानी, मंकी गेट विवाद और टीम को तोड़ने जैसे खुलासे किए गए थे। इन सभी किताबों ने बाजार में आने से पहले विवादों की पब्लिसिटी चखी और खासी बिक्री की।

रोमांस का चोखा कारोबार कहने को तो हमारे पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मोटिवेशनल किताबें बाज़ार में खूब बिकती हैं, लेकिन इस मामले में वैश्विक चलन पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि सेक्स और रोमांस पर आधारित चटखारेदार लेखन सबसे ज्यादा कमाई कराने वाला साबित होता है। बच्चों के लिए हैरी पॉटर जैसी सीरीज कम ही कामयाब होती है, लेकिन अध्ययनों से साबित हुआ है कि सेक्स और रोमांस के साहित्य की मांग कभी कम नहीं हुई है। ई. एल. जेम्स की चर्चित इरॉटिक सीरीज-फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे तो इस मामले में रिकॉर्ड ही तोड़ चुकी है। इस अकेली किताब ने जेम्स को करोड़पति- अरबपति बना दिया।

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