कटना ‘जामुन का पेड़’

जाहिद खान

आईसीएसई ने हिन्दी-उर्दू के मशहूर अफसानानिगार कृश्न चंदर की क्लासिक कहानी ‘जामुन का पेड़’ को दसवीं क्लास के निर्धारित पाठ्यक्रम से अचानक हटा दिया है। बोर्ड के इम्तिहानों से महज तीन महीने पहले यह आश्चर्यजनक फैसला लिया गया। संस्था की दलील है कि कहानी को इसलिए हटाया गया, क्योंकि यह दसवीं के विद्यार्थियों के लिए ‘उपयुक्त’ नहीं थी। बीती सदी के साठ के दशक में लिखी गई कृश्न चंदर की यह कहानी साल 2015 से आईसीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल थी। व्यंग्यात्मक शैली में लिखी गई कहानी, ‘जामुन का पेड़’ सरकारी महकमों की कार्यशैली, अफसरों के काम करने के तौर-तरीकों और लाल फीताशाही पर गंभीर सवाल उठाती है। ‘बड़ी देर की मेहरबान आते-आते’ के नाम से इस कहानी का नाट्य रूपान्तरण भी हुआ है। दरअसल, यह एक ऐसे शख्स की कहानी है, जो सरकारी परिसर के लॉन में लगे एक जामुन के पेड़ के नीचे दब जाता है। सुबह जब माली को इस बात की खबर होती है, तो वह इसकी जानकारी अपने ऑफिस में देता है। तमाम सरकारी कर्मचारी और अधिकारी जामुन के पेड़ के नीचे दबे इस शख्स को निकालने के बजाय एक-दूसरे महकमे और मंत्रालयों पर जिम्मेदारियां डालकर, अपने कर्तव्य से बचते रहते हैं। जैसे तैसे इस शख्स को पेड़ के नीचे से निकालने का सरकारी आदेश आता है, लेकिन तब तक उसकी दर्दनाक मौत हो जाती है। ‘जामुन का पेड़’ में नौकरशाही पर तगड़ा व्यंग्य है। कहानी पाठकों को सच से रू-बरू करवाती है। इस कहानी को पाठ्यक्रम से हटा लिया गया, यह सोचे-समझे बिना कि कृश्न चंदर को साहित्य और भारतीय समाज में क्या योगदान, हैसियत और क्या आला मुकाम हासिल है? 24 नवम्बर, 1914 को अविभाजित भारत के वजीराबाद, जिला गूजरांवाला में जन्मे कृश्न चंदर महज एक अदीब ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने मुल्क की आजादी की लड़ाई में भी सक्रिय हिस्सेदारी की थी। वे बाकायदा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। आजादी के संघर्ष में वे एक बार शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ गिरफ्तार हो जेल भी गए थे। बंटवारे के बाद कृश्न चंदर लाहौर, पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ गए। बंटवारे के बाद मिली आजादी को कृश्न चंदर हमेशा त्रासद आजादी मानते रहे और उसी की नुक्ता-ए-नज़र में उन्होंने अपनी कई कहानियां और रचनाएं लिखीं। उनकी कहानी ‘पेशावर एक्सप्रेस’ भारत-पाक बंटवारे की दर्दनाक दास्तां को बयां करती है। कृश्न चंदर ने कहानियां, उपन्यास, व्यंग्य लेख, नाटक यानी साहित्य की सभी विधाओं में खूब काम किया। उन्होंने अपनी कहानियों में व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए। कृश्न चंदर की किताबों की संख्या तीन दर्जन से ज्यादा है। कृश्न चंदर की अनगिनत साहित्यिक उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने उन्हें नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया है, तो वे सोवियत संघ के प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ से भी नवाजे गए हैं। ‘जामुन का पेड़’ जैसी रचनाएं, नई पीढ़ी को शिक्षित और जागरूक करने का काम करती हैं। व्यवस्था की गड़बड़ियों को ठीक करने की बजाय, उसका ठीकरा लेखक के सिर पर फोड़ना कहां तक जायज है?

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