ओंकार में जीना ही असली जागरण

ओशो सिद्धार्थ औलिया नानक का प्रसिद्ध वचन है- एक ओंकार सतनाम अर्थात परमात्मा एक है, वह ओंकार स्वरूप है, वही सत्य है और उसी को नामतत्व कहा गया है। नानक ओंकार को जहाज और इसके श्रवण को, इसकी सिद्धि को भवसागर पार कराने वाला कहते हैं। भवसागर से पार यानी कर्मबंधन से मुक्ति। अन्य संतों ने भी नाम की बड़ी महिमा गाई है। नानक कहते हैं- सखीयो सहेलड़ियो मेरा पीर वणजारा राम। गोविन्द ही मेरा प्रियतम है। प्रेम के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं जिससे गोविन्द को पाया जा सके। वस्तुतः, परमात्मा के प्रति जब प्रेम जगता है, तभी परमात्मा को पाना संभव होता है। कबीर भी यही कहते हैं- पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े से पंडित होय। नानक कहते हैं कि नाम का रस अमोल है- रसमोल अपारा राम। जिसके पास श्रद्धा की पूंजी है और जिसका चित्त प्रेम से भरा हुआ है, केवल वही उस नाम रस को प्राप्त कर सकता है। जो जीवात्मा उस नामरस को प्राप्त कर लेती है, वही भली है। प्रभु उसे ही पसंद करता है, क्योंकि वह गुरुमुख हो गया है और उसने ओंकार से अपना शृंगार किया है। नानक कहते हैं कि गोविंद परमसमर्थ है और इस जगत में जो भी कार्य होता है, सबका कर्ता गोविंद ही है- करन कारन समरथ श्रीधर। और, गुरु गोविंद का ही रूप है। इसलिए, जो स‍द‍्ग‍ुरु को पा लेता है, उसके जीवन में उत्सव ही उत्सव होता है। वस्तुतः, उत्सव वही मना पाता है, जिसे गुरु से सतनाम मिल जाता है। फिर, भक्तों का काम गोविंद स्वयं करता है- नानक आपे ही पति रखसी कारज सवारे सोइ। जो गोविंद भक्तों का इतना ध्यान रखता है, उसे छोड़कर किसी और का सहारा लेने का कोई प्रयोजन भी नहीं है। उस गोविंद की जिस पर कृपा दृष्टि हो जाती है, उसका जीवन धन्य हो जाता है और वह शबद की, ओंकार की साधना कर निर्भय हो जाता है। नानक कहते हैं कि हरि के सुमिरन में निरंतर जीने वाले पर मैं  कुर्बान हूं। नानक कहते हैं कि जैसे सुबह का तारा देखते-देखते विदा हो जाता है, हमारी जिंदगी भी ऐसी ही है। जिस धन और यौवन को हम अपनी संपदा मान बैठे हैं, वे क्षणभंगुर हैं, आज हैं, कल नहीं होंगे। जो कुछ भी पैदा हुआ है, उसे एक दिन विदा होना ही है। लेकिन यह जो ओंकार है, वह इस जीवन के बाद भी साथ रहने वाला है। यह बोध ही असली जागरण है। जो ओंकार को निष्प्रयास सुनने लगता है, उसे इसकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है। ओशो इसी ओंकार के सुमिरन को कल्पवृक्ष के नीचे खड़ा होना कहते हैं। जिस दिन आपको गोविंद से प्रेम हो जाता है, जिस दिन आप गोविंद को पुकारने की कला जान लेते हैं, उस दिन गोविंद आपकी हर इच्छा पूरी कर देता है। (लेखक ओशोधारा नानक धाम, मुरथल के संस्थापक हैं)

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