एकलव्य ने यहां दिया गुरुदक्षिणा में अंगूठा

तीर्थाटन नवीन पांचाल गुरु द्रोणाचार्य की कर्मस्थली गुरुग्राम के इतिहास में एक ऐसा पन्ना भी जुड़ा हुआ है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। देश का एकमात्र एकलव्य मंदिर गुरुग्राम में है। वही एकलव्य, जिन्होंने महाभारत काल में गुरु द्रोण की प्रतिमा को प्रतीकात्मक तौर पर अपना गुरु मानकर धनुर्विद्या हासिल की और बाद में गुरुदक्षिणा के रूप में अपने दाहिने हाथ का अंगूठा उन्हें दे दिया। महाभारत काल में खांडवप्रस्थ के नाम से जिस स्थान को जाना जाता था, वह गुरुग्राम जिले का गांव खांडसा है। चारों तरफ विश्व प्रसिद्ध औद्योगिक इकाईयों से घिरे इस गांव में ही स्थित है एकलव्य मंदिर। यह मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र व पाकिस्तान के कई हिस्सों में बसे निषाद भील समाज के लोगों की आस्था का केंद्र है। इस समाज से जुड़े लोग देशभर से यहां माथा टेकने आते हैं। घर में किसी नये सदस्य के आगमन पर निषाद-भील समाज के लोग इस मंदिर में धौंक लगाने भी आते हैं। मंदिर में हर साल मेला लगता है और देश-विदेश में बसे निषाद-भील समाज के लोग यहां आकर मनोकामना मांगते हैं। निषाद-भील समाज के लोगों की आस्था के कारण वर्ष 1721 में गांव खांडसा के लोगों ने यहां एक मढ़ी का निर्माण करवाया। इससे पहले मंदिर के नाम पर यहां सिर्फ एक चबूतरा बना हुआ था। कहा जाता है कि जिस स्थान पर चबूतरा बना था, वहां गुरु द्रोण ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में लिया हुआ अंगूठा दफनाया था। इसी चबूतरे पर निषाद-भील समाज के लोग माथा टेकने आते थे। अब यहां कुछ कमरे बनवा दिए गए हैं, ताकि दूर दराज से आने वाले आस्थावान लोग यहां रात्रि विश्राम कर सकें। गांव के लोग इस मंदिर को विशाल तीर्थ में रूप में विकसित करवाने की मंशा रखते हैं। मंदिर के पास ही स्थित एक इंडस्ट्री के संचालक व स्थानीय निवासी दीपक मैनी कहते हैं कि यह मंदिर भारतभर में गुरु-शिष्य की अनूठी परंपरा का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसे विकसित कर तीर्थ स्थल का रूप मिलना चाहिये। ग्रामीण कहते हैं कि अनदेखी के कारण ऐतिहासिक धरोहर सिर्फ कथा-कहानियों में सिमटकर रह गई है। ग्रामीण मान सिंह राघव बताते हैं कि एकलव्य मंदिर इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से कुरुक्षेत्र में होने वाले महाभारत के युद्ध की रणनीति तैयार की गई। महाभारतकालीन राजधानी हस्तिनापुर भी इसी खांडवप्रस्थ की नीति से चलती थी।

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