इस दिवाली पुराने को नया बनाएं, खुशियां फैलाएं

रेनू सैनी

दिवाली पर्व नजदीक आते ही सब ओर सफाइयां होनी शुरू हो जाती हैं। घरों से कबाड़ निकाला जाता है और वह एक ढेर में परिवर्तित हो जाता है। इन दिनों तो सिंगल यूज प्लास्टिक को खत्म कर भारत को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान जोरों पर है। प्रदूषण खत्म हो जाएगा तो कालिमा भी छंट जाएगी और रोशनी की किरण नजर आएगी। दिवाली का अर्थ होता है जीवन में प्रकाश और खुशियों का होना। मन में उमंग, तरंग और हर्ष की हिलोर उठना। बेशक दिवाली वर्ष में एक बार आती है, लेकिन इसका उद्देश्य है पूरे साल सबके जीवन में उज्ज्वल प्रकाश करना, लोगों के होंठों पर मुस्कराहट लाना, सबके जीवन में धन, स्वास्थ्य और समृद्धि की बरसात करना। लक्ष्मी लोगों के रूप में चलकर ही जरूरतमंदों तक पहुंचती है। जिस व्यक्ति के हृदय में देने की भावना उत्पन्न हो जाती है, वहां लक्ष्मी का निवास स्वयं हो जाता है। देने की भावना का विकास व्यक्ति के अंदर तभी उत्पन्न होता है, जब वह कठिन कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है। एक बहुत ही प्रमुख प्रेरक सिद्धांत है, ‘अगर आप सिर्फ आसान काम करने के इच्छुक हैं, तो जिंदगी मुश्किल होगी। यदि मुश्किल काम करने के इच्छुक हैं तो जिंदगी आसान होगी।’ यह पूर्णतः सच है। हम बड़े-बड़े व्यवसायियों की दौलत पर नजर डालकर तुरंत यह धारणा बना लेते हैं कि उनकी जिंदगी बहुत आसान है। उनके पास सब कुछ उपलब्ध है। लेकिन, यह धारणा बनाते समय हम यह भूल जाते हैं कि उनकी जिंदगी आसान इसलिए है, क्योंकि उन्होंने कठिन कार्य करने के संकल्प लिए। व्यक्ति का मस्तिष्क बेहद शक्तिशाली होता है, उसमें थोड़ा-सा मेहनत को जोड़ दिया जाए तो चमत्कार हो जाते हैं। ऐसा ही चमत्कार किया है मुंबई के श्रेयांश भंडारी और रमेश भंडारी ने। स्पोर्ट्स शूज बहुत महंगे आते हैं। लोग उन्हें खराब होने पर अकसर कूड़े में डाल देते हैं। यही सब देखकर दो युवाओं ने स्पोर्ट्स शूज से चप्पल बनाना आरंभ किया। इन चप्पलों को वे गांव के स्कूली बच्चों को निशुल्क प्रदान करते हैं, ताकि उन्हें पहनकर वे आराम से स्कूल जा सकें। रमेश और श्रेयांश भंडारी अपने स्टार्टअप ग्रीन सोल के जरिए अब तक 13 राज्यों के 3 हजार गांवों में 3 लाख चप्पलें जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचा चुके हैं। शुरुआत में उन्हें अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। आईआईटी स्तर पर प्रतियोगिता में जीते लाखों रुपये लगा दिए, लेकिन सफलता नहीं मिली। श्रमिकों ने भी मना कर दिया और कहा कि आप रुपये बर्बाद कर रहे हो, कुछ हाथ नहीं लगने वाला। लेकिन श्रेयांश और रमेश ने हार नहीं मानी। घोर अंधकार में जब कहीं से आशा की एक किरण झांकती है तो फिर दीयों को जलाना बेहद सरल हो जाता है। पूर्ण प्रकाश और जगमग रोशनी को लाने के लिए अंधकार से टकराना ही होता है। यह याद रखिए कि आप एक चीज में 100 फीसदी सुधार बेशक न कर पाएं, लेकिन 100 चीजों में एक-एक फीसदी सुधार जरूर कर सकते हैं। यदि आपने इतना सुधार कर दिया, तो अंधकार के किले को तो भेद ही दिया न। तो आइए इस दिवाली कुछ नया करें, नया सोचें, नये काम अपनाएं ताकि हर जरूरतमंद के घर में एक दीपक जरूर जगमगाए और जगत से अंधकार की छाया हट जाए।

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