आ गई समझ

आशा शर्मा ‘आह!! ये मेरी जड़ों में झनझनाहट-सी क्यों हो रही है?’ बूढ़ा पेड़ दर्द से कसमसाया। ‘आपकी जड़ें कामजोर हो गई बाबा!’ नन्हा पौधा दांत निकाल कर खिलखिलाया। ‘नहीं छोटे! बाबा सही कह रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से ये समस्या मेरी जड़ों में भी हो रही है। कभी-कभी तो मैं दर्द के मारे मुंह ऐसे टेढ़ामेढ़ा बनाने लगता हूं जैसे वो सामने वाले घर में रहने वाला दीपक आइसक्रीम खाते समय बनाता है। और वो पिंकी दांतों में लगी कैविटी से। ऐसा लगता है मानो हम जड़ से उखड़ जाएंगे।’ एक युवा वृक्ष ने बाबा का पक्ष लिया। ‘तो क्या आपकी जड़ों में भी कैविटी लगी है?’ नन्हे को फिर मजाक सूझा। ‘हां! इसे कैविटी ही कहा जा सकता है। हमारी जड़ें धीरे-धीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं।’ गुलमोहर बोला। यह वार्तालाप सुबह-सुबह बगीचे में हो रहा था। यहां आम, नीम, जामुन आदि के बड़े पेड़ों के साथ साथ गुलाब, चमेली, मोगरे आदि के छोटे पौधे और लताएं भी लगी हुई थी। शहर के बीचोंबीच स्थित इस बगीचे में सुबह बहुत से लोग प्रात: भ्रमण, योगा और कसरत के लिए आते हैं वहीं शाम को यह बगीचा बच्चों के शोरगुल से चहक उठता है। पिछले कुछ दिनों से यहां लगे हुए छोटे पौधे सूखने-मुरझाने से लगे हैं। पत्ते समय से पहले पीले पड़ने लगे हैं और फूलों की खुशबू भी कम होने लगी है। आज जब बूढ़े पेड़ ने अपनी जड़ों में झनझनाहट महसूस की तो सबने हामी भरी कि समस्या सबके साथ भी है। ‘बाबा! आप तो सबसे बुजुर्ग हैं। आपका अनुभव क्या कहता है?’ जामुन ने पूछा। ‘जहां तक मेरा अनुभव कहता है, कहीं न कहीं खाद-पानी में ही कुछ गड़बड़ है। आजकल पानी में वो पहले जैसा स्वाद नहीं रहा।’ बाबा ने अपना अनुभव बताया। ‘हां! इन दिनों मुझे भी पानी का स्वाद कसैला सा लगता है।’ नीम ने बातचीत में हिस्सा लिया। ‘ये लो! इनकी सुनो। अब नीम को भी कड़वा लगने लगा।’ नन्हा फिर बीच में कूदा। ‘तुम बहुत चुलबुले हो गये हो नन्हे। बड़ों की बात का यूं मजाक नहीं उड़ाते।’ आम ने उसे टोका तो नन्हा चुप होकर बैठ गया। ‘याद है मुझे! सालों पहले इस बगीचे के पीछे एक नदी बहती थी, पहले उसमें इतना मीठा पानी था कि क्या बताऊं। लेकिन जब से फैक्टरियों का गंदा और केमिकल वाला पानी इसमें गिरने लगा है तब से इसका पानी जहरीला हो गया है। इसकी सारी मछलियां भी मर गई। और तो और... अब तो नदी भी एक गंदे नाले जैसी ही रह गई है।’ बरगद बाबा ने बताया। ‘सही कहा बाबा आपने। यही जहरीला पानी तो हमारी जड़ों तक पहुंच कर हमें बीमार और कमजोर कर रहा है। और वो उधर पार्क के कोने में देखो तो... एक बार किसी ने जरा सा कूड़ा क्या फेंका, सबने कूड़ा डाल-डालकर उसे कचरे का ढेर ही बना दिया। अब हमें खाद की जगह गंदगी खानी पड़ रही है। छी!’ मोगरे की बेल भी दुखी थी। ‘तो क्या करें? क्या उपाय है हमारे पास? कैसे अपने आपको इस प्रदूषण से बचाया जाए? हम तो खुद चलकर किसी के पास शिकायत करने भी नहीं जा सकते।’ आम सिसका। ‘जब तक खुद मनुष्य को अपनी गलती का अहसास नहीं हो जाता तब तक सुधार की उम्मीद कम ही है।’ पीपल ने चिंता जाहिर की। ‘और मनुष्य तो अपनी गलती कभी मानता ही नहीं।’ नन्हे से रहा नहीं गया तो वह फिर बीच में बोल पड़ा। ‘आह!!! अब मेरी जड़ें और अधिक दर्द सहन नहीं कर पा रही। ये उखड़ रही हैं। लगता है मेरा अंतिम समय आ गया।’ बरगद ने कराहते हुए कहा और इसके साथ ही जड़ों ने जमीन को छोड़ दिया। बरगद के नीचे गिरते ही पूरा बगीचा उदास हो गया। सबको अपना अंत अब निश्चित लग रहा था। नन्हा भी जोर-जोर से रोने लगा। तभी सबने देखा कि स्कूली बच्चों का एक दल नदी के सफाई अभियान में जुटा है। कुछ बच्चे नए पौधे लेकर पार्क में लगाने आ रहे हैं। ‘देखो देखो!!! क्या हो रहा है?’ नन्हा अपनी डालियां हिलाने लगा। ‘आ हा! लगता है लोग जागरूक होने लगे हैं। अब हमें बाबा की तरह समय से पहले अपनी जमीन नहीं छोड़नी पड़ेगी।’ आम खुश हुआ। ‘वो देखो! बड़ी सी मशीन और कचरा उठाने वाली गाड़ी भी आई है...पार्क का कचरा भी साफ हो रहा है।’ चमेली की बेल लहराने लगी। सब पेड़-पौधे खुशी से झूमने लगे।

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