आरोग्यता का अमृत धनतेरस

दीपावली के रूप में विख्यात महापर्व स्वास्थ्य चेतना जगाने के साथ शुरू होता है। दिवाली के पंच पर्वों की शुरुआत होती है धन्वंतरि जयंती से। लोग इसे धनतेरस भी कहते हैं और इसका संबंध धन−वैभव से जोड़ते हैं। यह आरोग्य के देवता धन्वंतरि का अवतरण दिवस है। मान्यता है कि समुद्रमंथन के समय इसी दिन धन्वंतरि आयुर्वेद और अमृत लेकर प्रकट हुए थे। प्रचलित क्रम के अनुसार यम के निमित्त एक दीया जलाकर धनतेरस मनाया जाता है। दीया घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता है। कामना की जाती है कि वह दीप अकालमृत्यु के प्रवेश को रोके। ऐसा विवेक जगाए जो स्वास्थ्य, शक्ति और शांति दे। यम की बहन यमुना नदी जिन क्षेत्रों में बहती है, वहां यह विशेष पूजा का दिन भी है। उस दिन श्रद्धालु यमुना में स्नान कर यम को मनाने की भावना करते हैं। दीपावली महापर्व का पहला दीप जलाकर शुरू हुए महोत्सव का एक अंग नये बरतन खरीदना भी है, ताकि भगवान के लिए भोग-प्रसाद नये पात्र में तैयार किया जा सके। धनतेरस के बाद नरक चतुर्दशी और हनुमान जयंती महापर्व का दूसरा दिन है। ‘नरक’ विशेषण से स्पष्ट है कि इसका संबंध भी मृत्यु अथवा यमराज से है। यह दिन स्वास्थ्य साधना का दिन है। पर्व का विधान है कि इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए। सायंकाल दीपदान के लिए है। दीप यम के लिए जलाए जाते हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने का आशय आलस्य त्यागने से है। यम यदि मृत्यु के देवता हैं, तो संयम के अधिष्ठाता देव भी हैं। आशय यह है कि संयम-नियम से रहने वालों को मृत्यु से जरा भी भयभीत नहीं होना चाहिए। उनकी अपनी साधना उनकी रक्षा करेगी। नरक चतुर्दशी के दिन हनुमान जयंती भी मनाई जाती है। हनुमान जयंती यूं चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है, लेकिन उत्तर भारत के कई भागों में यह दिवाली से एक दिन पहले मनती है। पर्व का नाम नरक चतुर्दशी प्रचलित है। इसका यह नाम कृष्ण लीला से संबंधित भी है। पौराणिक कथा है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। उस राक्षस ने हजारों कुलीन स्त्रियों को बंदी बना लिया था। उसके आतंक से पृथ्वी के समस्त शूर और सम्राट थरथर कांपते थे। प्रतीक के तौर पर देखें तो नरकासुर उग्र अहं और वासना का उदाहरण है। ये प्रवृत्तियां कितना ही आतंक मचा लें, अंततः पराजित ही होती हैं। जब इनका अंत होता तो लोग उत्सव मनाते हैं। (awgp.org से साभार)

स्कंद पुराण के अनुसार प्रति वर्ष कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रदोषकाल में घर के दरवाजे पर दीप जलाने से अकाल मृत्य का भय नहीं रहता। दीप जलाते हुए यह मंत्र का जाप करते रहना चाहिये- मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात‍् सूर्यज: प्रीयतामिति।। अर्थात‍्- त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल और लक्ष्मी के साथ सूर्यनंदन यम प्रसन्न हों।

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