आज का एकलव्य

बाल कहानी

गोविंद भारद्वाज मास्टर श्याम दसवीं कक्षा में गणित पढ़ा रहे थे। पढ़ाते-पढ़ाते उनका ध्यान खिड़की की ओर गया। उनको लगा कि कोई बाहर की तरफ खड़ा है। उन्होंने खिड़की से झांक कर देखा तो वहां कोई नज़र नहीं आया। अगले दिन जब उन्होंने पढ़ाना शुरू किया तो उनको लगा कि फिर कोई खिड़की के बाहर खड़ा है। उन्होंने तुरंत खिड़की के बाहर झांका तो एक लड़का दीवार के साथ खड़ा दिखाई दिया। उस लड़के को देखकर उन्होंने आवाज़ लगायी-कौन है रे वहां? उनकी कड़कती आवाज सुनकर लड़का डर के मारे चुपचाप खड़ा रहा। सर ने एक कक्षा के मॉनीटर टीनू से कहा-टीनू ज़रा बाहर की तरफ जाकर देखो कौन लड़का खड़ा है खिड़की के पास? ‘जी सर अभी जाता हूं।’ टीनू ने जवाब दिया। टीनू कक्षा के पिछवाड़े गया। उसे वहां तो कोई नहीं दिखायी दिया। उसने वापस आकर सर को बताया-सर स्कूल के पीछे तो कोई भी नहीं है। कोई तो है जो रोज़ाना मेरे पीरियड में आकर चुपचाप खिड़की के पास खड़ा हो जाता है। -श्याम सर ने कहा। कुछ दिनों बाद दसवीं बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट घोषित हुआ। श्याम सर ने खुशी जताते हुए कहा-इस बार अपने स्कूल का परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत होने के साथ-साथ बच्चों ने अंक भी बहुत अच्छे लिये हैं। दसवीं के सभी बच्चे प्रथम श्रेणी से पास हुए हैं, कोई भी फेल नहीं है और गणित में सभी बच्चों ने सौ में से अस्सी से लेकर पिचानवे तक नम्बर लिये हैं।' सभी बच्चों ने जोरदार तालियां बजायीं। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच एक लड़का मिठाई का छोटा सा डिब्बा लेकर आया। उसने सबसे पहले सर के पैर छुए। सर ने आज से पहले उसे कभी देखा नहीं था। उन्होंने पूछा-बेटा तुम को मैंने पहचाना नहीं। कौन हो तुम? ‘जी मैं आपका विद्यार्थी हूं सर।’ लड़के ने बड़ी विनम्रता से कहा। पर मैंने तो तुम को कभी पढ़ाया ही नहीं..। -सर ने आश्चर्य से पूछा। लड़के ने कहा-आपने मुझे नहीं पढ़ाया होता तो आज मैं गणित में सौ में से सौ नम्बर कैसे लाता।-लड़के ने कहा। क्या? सौ में से सौ तो वो बच्चे भी नहीं लेकर आए जिनको मैंने पढ़ाया है। -सर ने अचम्भे से पूछा। उस लड़के ने गर्दन झुकाकर कहा-सर मुझे माफ करना.. मैंने जो आपसे सीखा है, उसके लिए न तो मैंने आपसे पहले कोई अनुमति ली और न ही आपको फीस दी। ‘बेटा तुम कैसी अजीब बातें कर रहे हो। आखिर तुम क्या कहना चाहते हो? -सर ने उस लड़के से पूछा। लड़का बोला-सर मेरा नाम विष्णु है और मैं वही लड़का हूं जो आपके पीरियड में खिड़की के पीछे खड़ा रहता था। आप जो पढ़ाते थे, मैं उसे बड़े ध्यान से सुनता व समझता था। मैं एक अनाथ हूं। अपने एक रिश्तेदार के यहां रहता हूं और उनके काम धंधे में हाथ बंटाता हूं। मैंने दसवीं के प्राइवेट फॉर्म भर रखे थे। इसलिए सिर्फ आपके पीरियड के लिए यहां रोज़ पढ़ने आता था। ...पर तुम और कोई विषय क्यों नहीं पढ़ते थे? सर ने विष्णु से पूछा। सर बाकी विषय तो मैं स्वयं ही समझ लेता था बस थोड़ी सी गणित की समस्या थी जो आपने हल कर दी। विष्णु ने कहा। सर ने उसकी सारी बात सुनकर कहा-वाह..विष्णु वाह.. तुमने साबित कर दिया कि आज के युग में भी कोई एकलव्य हो सकता है। मुझे तुम पर गर्व है। सर के मुख से विष्णु की तारीफ सुनकर सब बच्चों ने विष्णु के लिए तालियां बजायीं। विष्णु ने कहा-सर आप मेरे लिए द्रोणाचार्य से कम नहीं हैं। मैं आपको गुरु दक्षिणा तो नहीं दे सकता... बस ये छोटा सा मिठाई का डिब्बा लाया हूं। सर ने तुरंत मिठाई का डिब्बा खोला और उसमें से एक पीस निकाल कर विष्णु को खिलाते हुए कहा-आगे से मैं तुम्हें पढ़ाऊंगा और वो भी नि:शुल्क।

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