अविस्मरणीय सबक

मधु गौतम

संसार में आने वाला प्रत्येक प्राणी अनगढ़ पत्थर की भांति होता है, जिसे एक शिल्पी तराशकर सुंदर मूर्ति में बदल सकता है। वह शिल्पकार माता-पिता व शिक्षक के रूप में समाज में विद्यमान होते हैं जो बालक को संवार कर खूबसूरत व्यक्तित्व प्रदान करते हैं। कभी-कभी उनकी कही कोई बात इतनी प्रभावी हो जाती है और स्वतः चारित्रिक गुणों का विकास करने में सक्षम हो जाती है। मैं 1975 में बनस्थली विद्यापीठ से एमएड कर रही थी। विद्यापीठ एक आश्रम रूपी आवासीय शिक्षण संस्थान है जहां से बाहर जाने के लिए प्राचार्य से अनुमति लेनी पड़ती थी। एक बार हमारी मित्रमंडली ने कार्यक्रम बनाया जयपुर जाकर घूमने-फिरने व सिनेमा देखने का। पांचों पहुंच गए प्राचार्य के पास और निवेदन किया कि जयपुर जाना चाहते हैं तीन दिन के लिए। सबसे पहला मेरा नम्बर था। उन्होंने पूछा- क्यों जाना चाहते हो? मैंने उत्तर दिया-अपने घर दिल्ली फोन करके बात करनी है। प्राचार्य जी जो बहुत बड़े शिक्षाविद् व बाल मनोविज्ञान के ज्ञाता थे, उन्होंने तुरंत उत्तर दिया-फोन तो हम यहीं से करवा देंगे। जो सच है वही कहो। यदि पिक्चर देखने जाना है, घूमने जाना है, वही कहो, क्या होगा अधिक से अधिक मैं नाराज़ हो जाऊंगा, थोड़ी देर के लिए गुस्सा करूंगा, क्या फर्क पड़ेगा। क्यों असत्य बोलना, क्यों झूठ बोलना। यह कहते हुए उन्होंने हम सबकी छुट्टी स्वीकृत कर दी पर उनका ये वाक्य मुझे जीवन की इतनी बड़ी सीख दे गये कि मैंने उसी क्षण ये निर्णय लिया कि जीवन में जहां तक संभव होगा झूठ नहीं बोलूंगी और इस निर्णय पर काफी हद तक कायम रही। साथ ही अपने बच्चों में भी इस गुण का विकास कर सकी। मैं गर्व से कह सकती हूं कि हमारे परिवार की नींव सत्य पर ही टिकी है। विद्यालय में प्राचार्या के रूप में भी मैंने यही प्रेरणा अपने विद्यार्थियों को देने का प्रयास किया और उसका सकारात्मक परिणाम भी पाया। जीवन के छोटे-छोटे अनुभव हमारा उचित मार्गदर्शन करके हममें चारित्रिक दृढ़ता लाते हैं और कब कौन से शब्द हम पर कितना सकारात्मक प्रभाव डाल दें, पता ही नहीं चलता।

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