अविस्मरणीय शेषन

लोकतंत्र को मर्यादित करने का ऋषिकर्म

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने वाले टी.एन. शेषन भले ही अब दैहिक रूप में विद्यमान नहीं हैं, मगर चुनाव आयोग के लिए वे ऐसी लक्ष्मण रेखा खींच गये कि जिसे लांघना राजनेताओं के बूते की बात नहीं है। शेषन से पहले चुनाव आयोग के एक पूर्व मुख्यायुक्त ने तीस रुपये की किताब खरीदने के लिए सरकार से लिखित अनुमति मांगी थी। उसी कुर्सी पर बैठने पर जीवट छवि व जुझारूपन के चलते उस पद की ऐसी गरिमा व ताकत बनी कि लोग कहने लगे थे कि नेता या तो भगवान से डरते हैं या शेषन से। मजाक में शेषन कहा भी करते थे कि मैं नाश्ते में राजनेताओं को खाता हूं। उन्हें उस दौर में चुनाव आयोग की कमान मिली जब देश में चुनाव के वक्त बूथ लूटना और हिंसक संघर्ष आम बात थी। चुनावी हिंसा व धांधली के लिए कुख्यात बिहार में पहली बार चार चरणों में मतदान करवाकर उन्होंने निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को अंजाम दिया। तिरुनेल्लेई नारायण अय्यर शेषन अर्थात टी.एन. शेषन 1955 बैच के तमिलनाडू कैडर के आईएएस अधिकारी थे। उन्होंने 21 वर्ष की आयु में आईएएस परीक्षा टॉप की। वे इतने निर्भीक और बेवाक अधिकारी थे कि वर्ष 1962 में तमिलनाडू में एक भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने पर महज छह घंटे में उनका छह बार तबादला किया गया। फिर एक मंत्री उन्हें सुनसान इलाके में उतारकर चले गये। बहरहाल, शेषन जिस भी मंत्रालय में गये, वहां का कायाकल्प कर गये। लेकिन वे चेन्नई के ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति को सबसे यादगार मानते हैं। उन्हें एक चालक ने चुनौती दी कि जब आपको बस चलानी नहीं आती, आप इंजन के बारे में कुछ नहीं जानते तो आप कैसे ड्यूटी निभाएंगे? तो चुनौती के रूप में उन्होंने वर्कशाप में इंजन के बारे में सीखा  और यात्रियों से भरी एक बस को अस्सी किलोमीटर तक सुरक्षित चलाकर ले गये। शेषन बारह दिसंबर, 1990 से ग्यारह दिसंबर, 1996 तक देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त रहे। इससे पहले वर्ष 1989 में सबसे कम समय तक कैबिनेट सचिव भी रहे। तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के साथ पटरी न बैठने पर उन्हें हटाकर योजना आयोग भेज दिया गया। कहते हैं कि उन्हें राजीव गांधी की सलाह पर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया। तब उनकी सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही थी। बहरहाल, शेषन ने चुनाव आयोग की वास्तविक ताकत का अहसास राजनीतिक दलों को करवाया। भारत का दसवां चुनाव आयुक्त धनबल, बाहुबल और सत्ताबल के खिलाफ चट्टान बनकर खड़ा हुआ। उनके कार्यकाल में चुनाव आयोग का यह रुतबा था कि राजनेता भय खाते थे। उन्हें चुनाव प्रक्रिया में शुचिता व पारदर्शिता स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। शेषन ने चुनाव प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने के लिए मतदाता पहचानपत्र की शुरुआत करवायी। राजनेताओं ने इस प्रक्रिया को खर्चीली बताकर इसका विरोध किया। मगर शेषन डटे रहे। कुछ राज्यों में मतदाता पहचानपत्र न बनने के कारण चुनाव स्थगित भी कराये गये। दरअसल, शेषन ने तमाम ऐसी बुराइयों को दूर किया जो पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया में बाधक थीं। अब चाहे उम्मीदवारों के बेतहाशा खर्चे पर नियंत्रण करना हो या फिर चुनाव प्रचार में सरकारी हेलिकॉप्टर का उपयोग रोकना हो, दीवारों पर नारे व पोस्टर लगाने पर रोक हो अथवा लाउडस्पीकरों के शोर पर रोक लगाना हो या फिर सांप्रदायिक तनाव फैलाने वाले भाषणों पर प्रतिबंध लगाना हो, शेषन ने सख्ती से अंकुश लगवाया। शेषन की स्पष्ट धारणा थी कि मैं सिर्फ कानून का अनुपालन करता हूं।  आपको यदि पसंद नहीं तो कानून बदल दीजिए, मगर मैं कानून टूटने नहीं दूंगा। शेषन द्वारा स्थापित सुव्यवस्थित चुनाव प्रक्रिया ने पूरी दुनिया को पारदर्शी चुनाव कार्यक्रम के लिए प्रेरित किया। उनके इस विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1996 में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे अवार्ड भी दिया गया। यह एक विडंबना ही है कि वे जब राष्ट्रपति का चुनाव लड़े तो उन्हें असफलता ही हाथ लगी।

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