अपने परिसर में सुरक्षा बैंक की जि़म्मेदारी

पुष्पा गिरिमाजी

मैं अपने खाते में 60 हजार रुपये जमा करना चाहता था जो मैंने कृषि उत्पादों को बेचकर कमाए थे। जब मैंने पैसे निकाले और बैंक में कैशियर को सौंपने के लिए इसे गिनना शुरू किया तो किसी ने मुझे पीछे से धक्का दे दिया। मैं किसी तरह अपना संतुलन ठीक करने की कोशिश कर ही रहा था कि उस आदमी ने मुझसे पैसा छीना और भाग गया। दरवाजे पर सुरक्षाकर्मी नहीं था और किसी ने भी उस चोर को रोकने की जहमत नहीं उठाई। मैंने पुलिस को घटना की सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराई, लेकिन पुलिस अब तक अपराधी को नहीं पकड़ पाई। क्या मैं उपभोक्ता फोरम में इस मामले की शिकायत दर्ज करा सकता हूं। निश्चित रूप से आप ऐसा कर सकते हैं, क्योंकि अभी पिछले महीने ही शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि बैंक परिसर में ग्राहक द्वारा पैसा जमा कराने या निकालते वक्त सुरक्षा प्रदान करना बैंकों का कर्तव्य है। ऐसा न कर पाना विफलता है और इस कमी के लिए ग्राहक मुआवज़े का हकदार है। यह बेहद महत्वपूर्ण आदेश है क्योंकि इसमें साल 2013 में शीर्ष उपभोक्ता अदालत के पहले के विरोधाभासी आदेश को पलटा गया, इसकी जगह इसी तरह के एक अन्य फैसले (2005) को लागू किया गया, जिसमें उपभोक्ता को मुआवजा देने का आदेश सुनाया गया था। क्या आप इन मामलों का विस्तृत विवरण दे सकते हैं? ये वास्तव में मेरी शिकायत में मदद करेंगे। 28 अप्रैल, 2005 में कर्नल डीएस सच्चर (रिटायर्ड) बनाम पंजाब एंड सिंध बैंक (2003/ए के आरपी नंबर 1046) में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने कहा, ‘बैंक परिसर के अंदर जमा और/या निकाले जाने वाले धन की सुरक्षा सुनिश्चित करना, बैंक द्वारा किसी ग्राहक को दी जाने वाली सेवा का एक हिस्सा है।’ इस मामले में एक उपभोक्ता के हाथों से 45 हजार रुपये छीन लिए गए थे। प्रवेश/निकास द्वार पर कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था और मुख्य द्वार के निकास मार्ग पर जरूरत के मुताबिक जंजीर नहीं लगाई गई थी। यहां आयोग ने बैंक को सेवा में कमी का जिम्मेदार माना और बैंक को आदेश दिया कि वह ग्राहक को 45 हजार रुपये 9 प्रतिशत की ब्याज दर के हिसाब से लौटाये और ब्याज की यह राशि 5 हजार रुपये आंकी गयी। हालांकि स्टेट बैंक ऑफ पटियाला बनाम कृष्ण कौल (2012 के आरपी नंबर 1554) के 25 अक्तूबर 2013 के ऐसे ही मामले में राष्ट्रीय आयोग ने इसके विपरीत फैसला दिया। यहां भी उपभोक्ता ने समान परिस्थितियों में 25 हजार रुपये गंवाये, लेकिन आयोग ने किसी तरह का मुआवजा नहीं दिलाया। असल में माना गया, ‘यदि बैंक परिसर में किसी ग्राहक द्वारा दूसरे ग्राहक के साथ मारपीट की जाती है, तो हमें नहीं लगता है कि सिविल या आपराधिक कार्यवाही में बैंक या उसके सुरक्षा गार्ड को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। हम राज्य आयोग के निष्कर्षों से सहमत नहीं हैं कि बैंक सुरक्षा गार्ड को ग्राहकों को शरारती तत्वों से बचाना था और बैंक अपने ग्राहकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए बाध्य था।’ अब पहली नवंबर 2019 के हालिया आदेश में रिशभ कुमार सोगानी बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (2018 के आरपी नंबर 1668) में आयोग ने एक बार फिर से अपने परिसर में उपभोक्ताओं और उनके धन की सुरक्षा करने में असफल रहने पर बैंक को जिम्मेदार ठहराया। असल में यह आदेश बैंक के ‘देखभाल के कर्तव्य’ के बारे में बताता है और कर्तव्य में किसी कोताही के कारण किसी तरह भी चोटिल होने के लिए बैंक को उत्तरदायी ठहराता है। यह इंगित करते हुए कि सीसीटीवी फुटेज से पता चला है कि चोरी बैंक परिसर में हुई थी, आयोग ने माना कि बैंक द्वारा ‘देखभाल के कर्तव्य’ के तहत अपने ग्राहकों को दी गई सेवा जिसमें सीसीटीवी कवरेज की निगरानी/चौकसी किसी ग्राहक को बैंक में धन जमा और/या निकासी के दौरान विपरीत घटनाओं से सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। आयोग ने निष्कर्ष निकाला, ‘...हमारा यह सुविचारित मत है कि शिकायतकर्ता द्वारा अपने पास रखी गई धनराशि की देखभाल को लेकर सुरक्षा सुनिश्चित करने में बैंक ने अपने कर्तव्य में कोताही बरती और ग्राहक ने यह राशि बैंक परिसर में गंवाई, इसलिए हम मानते हैं कि बैंक परिसर के भीतर कोई भी सुरक्षा चूक सेवा की कमी है।’ आयोग ने बैंक को निर्देश दिया कि वह उपभोक्ता को 50 हजार रुपये जुर्माने और 10 हजार रुपये लागत के तौर पर अदा करे। इस मामले में शिकायतकर्ता ने उन 76 हजार रुपयों को गंवाया, जिन्हें वह जमा कराने के लिए लाया था। सीसीटीवी फुटेज में दिखा कि ग्राहक के पीछे खड़े व्यक्ति ने उन पैसों को लिया।

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