अपनेपन से जाएगा डिप्रेशन

प्रकृति पोद्दार

ज़्यादातर मामलों में हम डिप्रेशन को मामूली समस्या मान लेते हैं। या कभी-कभी मरीज़ों का मज़ाक तक उड़ाया जाता है। डिप्रेशन ऐसी स्थिति है जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को अलग-अलग तरीके से प्रभावित कर सकती है। कई मामलों में यह बहुत कम हो सकता है तो कभी यह बहुत खतरनाक स्टेज तक भी पहुंच जाता है। इसका कोई एक कारण भी नहीं है..लेकिन यह जानना ज़रूरी है कि डिप्रेशन एक तरह का ब्रेन डिस्ऑर्डर है जो दो तरह की समस्याओं का कॉम्बिनेशन है। यह या तो जेनेटिक कारणों से हो सकता है या फिर एनवायरमेंटल फैक्टर इसमें बहुत बड़ा रोल अदा करते हैं। यानी हम कैसे माहौल में, किस तरह की परिस्थितियों में रहते हैं। लांसेट के मुताबिक 2017 में भारत में मेंटल डिस्ऑर्डर के 197.3 मिलियन केसेज़ थे। इनमें से 45.7 मिलियन लोगों को डिप्रेसिव डिस्ऑर्डर यानी अवसाद था जबकि 44.9 मिलियन लोगों को एंक्ज़ाइटी की समस्या थी । आर्थिक नुकसान का कारण भी आंकड़ों की माने तो देश में मेंटल हेल्थ बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान का कारण बनती है। एक अनुमान के मुताबिक डिप्रेशन का इलाज आसानी से हो सकता है लेकिन अगर समस्या ज्यादा हो जाये तो मन में सुसाइडल थॉट यानी खुदकुशी के विचार आने लगते हैं। ऐसे मरीज़ खुद को नुकसान पहुंचाने की सोचते रहते हैं। लेकिन अगर इसका वक्त रहते पता चल जाये और सही देखभाल हो जाये तो मरीज़ जल्द ही इस स्थिति से बाहर आ सकता है। डिप्रेशन के मरीज़ को सबसे ज्यादा मूड डिसऑर्डर होते हैं। डबल्यूएचओ इसे सुसाइड एपेडेमिक की संज्ञा देता है। उसके मुताबिक इस तरह के कदम वही लोग उठाते हैं जो बहुत वक्त तक इस दलदल से निकल नहीं पाते। मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 इस दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है। क्योंकि इससे पहले यह बीमारी साइलेंट किलर ही मानी जाती थी। इस पर लोग खुलकर बात नहीं करते थे। मेंटल हेल्थ पर खर्च होने वाला बजट भी बहुत कम है। एक अनुमान के मुताबिक कुल स्वास्थ्य बजट का केवल एक फीसदी ही मेंटल हेल्थ पर खर्च किया जाता है। बहरहाल ऐसे केसेज़ में देखा गया है कि इस मामले में क्लीनिकल थैरेपी का उतना असर नहीं होता जितना सामाजिक और पारिवारिक सपोर्ट इसमें अहम रोल अदा करता है। उनकी सुनें.... ज़रूरी है कि डिप्रेशन से घिरे लोगों की बात सुनें। उन्हें अहसास कराएं कि आप उनके साथ हैं। उनसे पूछें कि आखिर उनके डिप्रेशन का कारण क्या है, किस वजह से वे डिप्रेस्ड महसूस कर रहे हैं। सलाह न दें क्योंकि आप प्रोफेशनल नहीं हैं तो आपकी सलाह का गलत असर हो सकता है। सहयोग ज़रूर करें, उन्हें अपने साथ बाहर ले जायें। उनके चेकअप, मेडिसिन का ख्याल रखें। मूवीज़ दिखाएं। जब तनाव घेर ले डिप्रेशन के कारण इनसोमनिया हो सकता है। वज़न बढ़ना, शरीर में दर्द रहना, नसें सिकुड़ जाना, लिबिडो कम हो जाना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अपना ख्याल रखें, अच्छी और पूरी नींद लें। क्योंकि निजी ज़िंदगी में हुई घटनाएं ब्रेन पर बहुत असर डालती हैं। तलाक, नौकरी का खो जाना, किसी अपने की मौत इसके मुख्य कारण हैं। अगर आपके परिवार में किसी को डिप्रेशन है तो बहुत संभव है कि आपको भी यह समस्या हो। महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान बहुत से हार्मोनल और शारीरिक बदलाव होते हैं। नयी ज़िम्मेदारी आने से कई महिलाओं को प्रीनेटल या पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है। नशे का सेवन, क्रोनिक डिज़ीज से डिप्रेशन हो सकता है। किसी भी तरह का हार्मोनल असंतुलन या सिर में चोट लगने के कारण भी ऐसी परेशानी हो सकती है। लेखक पोद्दार फाउंडेशन मुंबई में मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट हैं।

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