अंकित की गुल्लक

ललित शौर्य

अंकित आजकल घर पर ही था। लॉकडाउन के चलते उसका घर से निकलना बंद था। घर पर ही इंडोर गेम्स खेल कर वो अपना मन बहला रहा था। उसकी छोटी बहन प्रियांशी और अंकित कैरम और लूडो खेलते। कभी-कभी वे आपस में झगड़ने लगते। फिर मम्मी आकर उन दोनों को शांत कराती। मम्मी दोनों के झगड़े से थोड़ा परेशान भी हो चुकी थी। अंकित और प्रियांशी की ऑनलाइन क्लास शुरू हो चुकी थी। उनके स्कूल से रोज़ वीडियो कॉल पर दोनों की दो-दो घंटे क्लास चलती थी। ‘मम्मी हम स्कूल कब जाएंगे। घर पर बैठे-बैठे बोर हो गए हैं।’ प्रियांशी ने कहा। ‘जल्दी ही बेटा। एक बार ये महामारी खत्म हो जाये।’ मम्मी ने कहा। ‘मम्मी ऑनलाइन क्लास में वो मज़ा नहीं आता जो रियल क्लास में आता था। अब तो बस स्कूल खुलने का इंतज़ार है। पूरी छुट्टियों के मज़े एक साथ करूँगा।’ अंकित बोल पड़ा। ‘हां, हां। कर लेना मजे । लेकिन अभी होमवर्क कर लो जो स्कूल से मिला है।’ मम्मी ने हंसते हुए कहा।  ‘ओके मम्मी।’ कहते हुए अंकित अपना होमवर्क करने लगा। प्रियांशी ड्रॉइंग बना रही थी। अंकित के पापा घर से ही ऑफिस का काम कर रहे थे। डिस्टर्ब न हो इसलिए वो अपने कमरे में रहकर ही काम करते। काम खत्म होने के बाद ही कमरे से बाहर निकलते। एक दिन शाम को पापा, मम्मी ,अंकित और प्रियांशी चारों बैठकर टीवी पर समाचार सुन रहे थे। समाचार में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के बारे में बताया जा रहा था। संक्रमितों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। देश में ऐसे भी लोग थे जो इस समय बहुत ज्यादा परेशान थे। उनका रोज़गार खत्म हो गया था। टीवी देखते हुए पापा ने कहा, ‘हमें भी लोगों की मदद करनी चाहिए।’ ‘हाँ जरूर । ऐसे समय में हमारा, हमसबका, हरएक देशवासी का कर्तव्य बनता है कि हम एक दूसरे की मदद करें।’ मम्मी ने कहा। ´ मैं सोच रहा हूँ कि मैं कुछ रुपये डोनेट कर दूं।’ पापा ने कहा। ‘ये तो बहुत अच्छी बात है। आप प्रधानमंत्री राहत कोष में रुपये जमा करवा दीजिये। जिससे ये रुपया ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंच सके।’ मम्मी ने कहा। ‘हां ,यही ठीक रहेगा।’ पापा ने कहा। अंकित बड़ी ध्यान से ये सब बातें सुन रहा था। वह सोचने लगा, ‘जब हर व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वो दूसरों की मदद करे। तो वो कैसे पीछे रह सकता है। इस संकट के समय में उसे भी लोगों की मदद करनी चाहिए। पर कैसे?’ अंकित ने निर्णय ले लिया था कि वह कल सुबह पापा को अपना गुल्लक दे देगा। जिससे वो उसमें से रुपये निकाल कर ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचा सकें। अगले दिन सुबह अंकित पापा के कमरे में गया। उसके हाथ में गुल्लक था। उसने गुल्लक पापा को देते हुए कहा, ‘पापा मेरा गुल्लक भी ले लीजिए।’‘मैं क्या करूंगा इस गुल्लक का।’ पापा ने आश्चर्य से पूछा। ‘आप इससे रुपये निकाल कर किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दे दें।’ अंकित ने कहा। ‘अरे , वाह हमारा अंकित इतना बड़ा हो गया है। अब वो दूसरों की मदद भी करने लगा है। लेकिन तुम्हें के आइडिया आया कहां से।’ पापा ने अंकित के माथे पर हाथ रखते हुए कहा। ‘कल आप और मम्मी टीवी देखते हुए बातें कर रहे थे कि प्रधानमंत्री राहत कोष में कुछ रुपये जमा करेंगे। तो मैंने भी सोचा मैं भी अपना गुल्लक देकर मदद करूंगा।’ अंकित बोला। ‘ओह्ह। ये तो बहुत अच्छी बात है।’ पापा अंकित के गुल्लक से रुपये निकाल कर गिनने लग गए। गुल्लक से इक्कीस सौ रुपये निकले। पापा ने अंकित से कहा इन रुपयों से मोहल्ले के सफाईकर्मियों के लिए सेनेटाइज़र और हैंडवाश खरीद कर देंगे। जिससे वो लोग अपना काम और अधिक सुरक्षा के साथ कर सकें। ये सुनकर अमित बहुत खुश हुआ। उसी समय मम्मी और प्रियांशी भी कमरे में आ गए। पापा ने मम्मी को सारी बात बता दी। मम्मी भी अंकित के इस निर्णय से बहुत ख़ुश हुई। मम्मी ने अंकित को गले से लगा लिया।

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