तुरंत नहीं होना चाहिए न्याय, फिर यह प्रतिशोध बन जाता है

जोधपुर, 7 दिसंबर (एजेंसी)

तुरंत नहीं होना चाहिए न्याय, फिर यह प्रतिशोध बन जाता है

भारत के चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने शनिवार को कहा कि न्याय कभी तुरंत नहीं होना चाहिए। फिर तो यह यह प्रतिशोध बन जाता है। प्रतिशोध बनने पर न्याय अपनी विशेषता खो देता है। यहां राजस्थान हाईकोर्ट के नये भवन के उद्घाटन के दौरान जस्टिस बोबडे ने कहा, ‘मेरा मानना है कि न्याय उस वक्त अपनी विशेषता खो देता है जब यह प्रतिशोध का रूप धारण कर लेता है।' हैदराबाद में एक महिला पशु चिकित्सक से बलात्कार और उसकी हत्या के सभी चारों आरोपियों के मुठभेड़ में मारे जाने के तेलंगाना पुलिस के दावे के एक दिन बाद सीजीआई ने यह टिप्पणी की है। सीजेआई ने कहा कि ‘हमें बदलावों और न्यायपालिका के बारे में पूर्वधारणा से भी जरूर अवगत रहना चाहिए। ‘हमें न सिर्फ मुकदमे में तेजी लाने के तरीके तलाशने होंगे, बल्कि इन्हें रोकना भी होगा। ऐसे कानून हैं जो मुकदमे से पूर्व की मध्यस्थता मुहैया करते हैं।' प्रधान न्यायाधीश ने शीर्ष न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों द्वारा पिछले साल किए गये संवाददाता सम्मेलन को महज ‘खुद में सुधार करने का एक उपाय' भर बताया। गौरतलब है कि एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए शीर्ष न्यायालय के जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसफ ने 12 जनवरी 2018 को संवाददाता सम्मेलन किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि शीर्ष न्यायालय में सबकुछ ‘ठीकठाक नहीं' है। बाद में, उसी साल जस्टिस रंजन गोगोई तत्कालीन चीफ जस्टिस (सीजेआई) दीपक मिश्रा के सेवानिवृत्त होने पर इस शीर्ष पद पर नियुक्त हुए थे।

बलात्कार मामलों का शीघ्र हो निपटारा : रविशंकर प्रसाद कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सीजेआई और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया कि बलात्कार के मामलों का शीघ्रता से निपटारे के लिए एक तंत्र हो। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं तकलीफ में और संकट में हैं तथा वे न्याय की गुहार लगा रही हैं। मंत्री ने कहा कि 704 त्वरित अदालतें हैं तथा सरकार यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) और बलात्कार के अपराधों से जुड़े मुकदमों की सुनवाई के लिए 1,123 समर्पित अदालतें गठित करने की प्रक्रिया में जुटी हुई है।

क्या सभी के लिए सुलभ है न्याय : कोविंद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि सभी के लिए न्‍याय सुलभ होना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या हम, सभी के लिए न्याय सुलभ करा पा रहे हैं?' उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी न्याय की प्रक्रिया में होने वाले खर्च के बारे में बहुत चिंतित रहते थे। उनके लिए हमेशा दरिद्रनारायण का कल्याण ही सर्वोपरि था।' कोविंद ने कहा,‘मैं भलीभांति समझता हूं कि अनेक कारणों से न्याय-प्रक्रिया खर्चीली हुई है, यहां तक कि जन-सामान्य की पहुंच के बाहर हो गई है। विशेषकर हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में पहुंचना आम परिवादी के लिए नामुकिन हो गया है।'

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