कैरों से पंडितजी को मिला शेर के सियासी शिकार का जिम्मा

दिनेश भारद्वाज/ट्रिन्यू झज्जर, 13 सितंबर यह नवाबों का शहर है। यहां के लोगों की कुर्बानी के दर्जनों किस्से हैं। मोहब्बत की कई कहानियां हैं। सियासत का यह अखाड़ा रहा है। जी हां, हम झज्जर की ही बात कर रहे हैं। यहां की बर्फी हरियाणा के सभी मुख्यमंत्रियों की पहली पसंद रही है। इस शहर में बनने वाली सुराही ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति हासिल की है। इस इलाके की मिट्टी को मानो वरदान था। कहा जाता है कि यहां मिट्टी से बनने वाली सुराही में पानी फ्रिज की तरह ठंडा रहता था। झज्जर की झझरी यानी सुराही को लेकर छावनी मोहल्ला के कुम्हार इंद्रपाल खोहाल को राष्ट्रपति अवार्ड भी मिल चुका है। झज्जर की स्थापना छज्जु नामक जाट ने की थी। इसलिए पहले इसे ‘छज्जु नगर’ कहा जाता था। बाद में इसका नाम झज्जर पड़ा। इन दिनों मौसम चुनावी है। पूरे हरियाणा में इसी से जुड़े किस्से सुनाई पड़ रहे हैं। ऐसे में झज्जर कैसे अछूता रह सकता है। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री भी तो यहीं से थे। पंजाब से अलग होने के बाद पृथक हरियाणा के पहले मुख्यमंत्री पंडित भगवत दयाल शर्मा झज्जर के बेरी इलाके के रहने वाले थे। पंडितजी का निर्वाचन क्षेत्र भी झज्जर ही रहा। एक बड़ा रोचक किस्सा है। बात तो संयुक्त पंजाब के समय की है, लेकिन राजनीतिक चर्चा में आज भी अहम है। असल में प्रदेश के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार रहे प्रो. शेर सिंह कांग्रेस से अलग हो चुके थे। प्रताप सिंह कैरों उन्हें निपटाने की योजना बना चुके थे। कैरों ने बड़ी होशियारी के साथ उस समय जाट बहुल झज्जर में प्रो. शेर सिंह के सामने कांग्रेस टिकट पर पंडित भगवत दयाल शर्मा को चुनावी मैदान में उतार दिया। बताते चलें कि झज्जर विधानसभा हलका 1977 से पहले जनरल था। राजनीति के इतिहास में 1962 में हुआ झज्जर का चुनाव अपने आप में अनूठा था। उस वक्त हेलीकॉप्टर से प्रचार के लिए पंफलेट बंटवाए गए। प्रताप सिंह कैरों क्योंकि खुलकर पंडितजी की मदद कर रहे थे, इसलिए उन्होंने ही उस जमाने में चुनाव को हाईटैक बनाने के लिए हेलीकॉप्टर का प्रबंध किया। दो दिन की आजादी : अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी के दौर में झज्जर ऐसा पहला शहर था, जो आजादी से 25 साल पहले ही आजाद हो गया था। बेशक, यह आजादी दो दिन की थी लेकिन इसकी गूंज लंदन तक सुनने को मिली थी। विख्यात स्वतंत्रता सेनानी, इतिहासकार और पत्रकार पंडित श्रीराम शर्मा 1921 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। असहयोग आंदोलन के दौरान ही उन्होंने 1922 में झज्जर के घंटाघर पर तिरंगा लहरा दिया था। दो दिन घंटाघर पर तिरंगा लहराता रहा। इससे अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे धकेल दिया। लगातार जीत का रिकॉर्ड भुक्कल के नाम 1951 से लेकर 2014 तक के विधानसभा चुनावों में लगातार दो बार जीतने का रिकार्ड केवल मौजूदा विधायक गीता भुक्कल के नाम दर्ज है। वे 2009 में भी यहां से विधायक बनीं और 2014 में भी चुनी गईं। उनसे पूर्व ऐसे कई नेता हैं जो दो या इससे अधिक बार विधायक तो रहे लेकिन लगातार जीत नहीं सके।

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