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हक की रोटी

Posted On June - 21 - 2020

एक राजा के यहां एक संत आये। प्रसंगवश बात चल पड़ी हक की रोटी की। राजा ने पूछा- महाराज! हक की रोटी कैसी होती है? महात्मा ने बतलाया कि आपके नगर में अमुक जगह अमुक बुढ़िया रहती है, उससे हक की रोटी मांगनी चाहिये। राजा पता लगाकर उस बुढ़िया के पास पहुंचे और बोले- माता! मुझे हक की रोटी चाहिये। बुढ़िया ने कहा- राजन! मेरे पास एक रोटी है, पर उसमें आधी हक की है और आधी बेहक की। राजा ने पूछा, आधी बेहक की कैसे? बुढ़िया ने बताया- एक दिन मैं चरखा कात रही थी। शाम का वक्त था। अंधेरा हो चला था। इतने में उधर से एक जुलूस निकला। उसमें मशालें जल रही थीं। मैं अलग अपना चिराग न जलाकर उन मशालों की रोशनी में कातती रही और मैंने आधी पूनी कात ली। आधी पूनी पहले कती थी। उस पूनी का आटा लाकर रोटी बनाई। इसलिए आधी रोटी तो हक की है और आधी बेहक की। इस आधी पर उस जुलूस वाले का हक है। राजा ने सुनकर बुढ़िया को सिर नवाया।
(साभार : कल्याण सतकथा अंक)


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