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लॉकडाउन में शहर की सैर

Posted On June - 20 - 2020

बाल कहानी

दिनेश चमोला

चंपा पहाड़ी की ओट में चंपई उद्यान में नीलू तितली का घर था। दिन भर फूलों पर इतराना, गाना-झूमना, शाम को निलय पर्वत की सैर कर दूर-दूर तक घूम आना व थककर शाम को बहुरंगी फूलों की कोमल पंखुड़ियों में सो जाना ही उसकी दिनचर्या थी। नानी ने कितनी बार शहर आने को कहा तो मुंह बना देती नीलू…..‘ऐसा स्वर्ग छोड़कर भला वैसे गंदे व नरक जैसे शहर वह क्यों आऊँगी मैं अपना रूप बिगाड़ने ?’
इस बार नानी ने मोबाइल से कॉल की तथा व्हाट्सएप से दिखाया व कहा-
‘नीलू! देख…. अब तुम्हारा जंगल पानी भरेगा हमारे शहर के सामने। इतना सुंदर, इतना स्वच्छ….. कि पूछो मत…गंगा देखना तो भूल जाओगी अपने पहाड़ों के झरने…..। आओ तो ?’
वास्तव में सुंदर व सुनसान शहर देख उसका मन शहर घूमने को मचलने लगा । वह तैयार हो गई । उसने नानी से पूछा-
‘नानी, गर्मियों की छुट्टियां हैं…मैं अपनी दो सहेलियों को लेकर आ जाँऊ फिर? ‘आओ बिल्लो! तुम्हारा घर है…दो नहीं, सौ सहेलियां लाओ….।’
बस फिर क्या था। निल्लो अपनी दो सुंदर सहेलियों के साथ अपनी बहुरंगी एयर साइकिल में सवार हो दूसरे ही दिन शहर पहुँच गई। रास्ते में रुकते-सुस्ताते थोड़ा देर भी हो गई….वैसे भी वह उस दिन जिलास्तरीय खेल प्रतियोगिता में जीत कर आई थी, इसलिए थकी थी। खा-पीकर उसे कब नींद पड़ गई पता ही न चला। नानी ने भी सोचा कि कल सुबह उसे तब ही उठाएंगे जब वह स्वयं उठना चाहेगी।
लेकिन रात अभी खुली भी न थी कि नीलू व उसकी सहेलियां उठकर पार्क की ओर चली गईं….यह जानने के लिए कि नानी ने जिस अच्छे शहर की बात की है, आखिर वह कैसा है ? पिछली बार तक तो वहां जाते ही दम घुटता था। पार्क में तो जाने का मन भी नहीं करता था। केवल वहां गली-मोहल्ले के लेंडी कुत्ते व अवारा पशु ही गंदगी करते व उछलते-कूदते दिखाई देते थे। लेकिन इस बार तो वास्तव में फिजा बदली हुई थी। वहां था तो कोई नहीं, लेकिन पार्क एकदम टनाटन था।
‘बहमी निल्लो! अब हो गया विश्वास….अपनी बूढ़ी नानी पर ?’ उसकी सहेली पिंकी ने चिकोटी काटी।
‘हां….यार, नानी कभी मजाक भी करती है…. केवल मुझे मिलने के लिए….। वैसे सच कहूं…. मुझे शहर अच्छे नहीं लगते।’
जैसे ही नीलू ने अपनी सहेलियों के साथ फूलों से सजे-धजे उस पार्क (उद्यान) में प्रवेश किया तो वह देख कर चौंक गई कि कितनी सुंदरता चारों ओर फैली हुई है। हरी-हरी दूर्वा पर मानो ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। जो फूल पौधे कभी कसैले व बदबूदार धूल-धक्कड़ से लदे अपना रूप व सौंदर्य दिखाने के लिए कसमसाते रहते थे वे आज इतने सुंदर कैसे दिखाई लग रहे थे ? कलियों से लेकर फूलों तक में अलग सी बहार थी । हरी-हरी दूब पर नन्हें-नन्हें चींटे-चींटियों से लेकर कीट-पतंगे, तितलियां, भंवरे आदि सब मानो झूम-झूम कर नाच रहे थे। उसे लगा कहीं आज कोई त्यौहार तो नहीं है । लेकिन वह फिर सोचने लगी त्यौहार तो पहले भी हुआ करते थे…..इतनी सुंदरता, इतनी शांति, इतनी स्वच्छता आज तक नहीं देखी । आखिर माजरा क्या है ? इससे पहले कि वह कुछ बोलती, पड़ोसिन लिल्लो नानी ने पंख फड़फड़ाते हुए कहा-
‘आज हमारी निल्लू बेटी क्यों परेशान है सुबह-सुबह ? क्या कुछ हुआ है निल्लो ?’ नहीं नानी, विशेष तो कुछ नहीं, लेकिन बगीचे में इतनी स्वच्छता नहीं देखी आज तक। रंग-बिरंगे फूलों से सजा हुआ यह बगीचा कभी फूलों से कम व चिप्स, कुरकुरे, फ्रूटी, चॉकलेट, टॉफी व बिस्किट आदि के रैपरों से लाल-पीला हुआ रहता था। जगह-जगह कूड़ा व कसैले धुएं से लिपटे फूल बाहर आने को शर्माते रहते थे। तो परेशान हूं नानी…. कि यह सब कैसे ?’
‘मेरी बिल्लो रानी! घबरा मत…आजकल देश में कोरोना काल चल रहा है न….लॉक डाउन है चारों तरफ…शैतान मनुष्य…सारे घरों में कैद हैं….सारी गंदगी की जड़ वही तो हैं अकेले….. ।’
‘लेकिन नानी इतना स्वच्छ आसमान ?’
‘ ैर्य रख! बताती हूँ….लॉक डाउन के चलते सारे वाहन बंद हैं, फैक्ट्रियां बंद हैं…..दुकान, मॉल व बाजार बंद हैं….तो बता, कहाँ से होगी गंदगी ?’
‘पर क्यों बंद है आखिर…..हुआ क्या है?’
‘अरे! कहते हैं कि एक बहुत ही छोटा व भयानक दैत्यनुमा वायरस है, उसने लाखों मनुष्यों को मौत के घाट उतार दिया है …पर छोड़ यह सब…तेरी नानी व हमने तुम्हें शहर घूमने के लिए गाड़ी बुक की है…अभी आती ही होगी आधे घण्टे तक ।’
लेकिन यह क्या, गाड़ी आ गई। उसमें से नानी उतर रही है नीलू की…..हाथ में पिकनिक का ढेर-सारा सामान लेकर । फटाफट वे भी चढ़ गई गाड़ी में। गाड़ी फर-फर चलने लगी। सैकड़ों मील दूर के बर्फीले पहाड़ साफ दिखाई दे रहे थे…गंगा शीशे के समान साफ दिखाई दे रही थी। हरे-भरे खेत, पेड़ व प्रकृति खिलखिलाती लग रही थी। नानी मछलियों के लिए भी खाना लाई थी।
उन्होंने गाड़ी रोकी। वे घाट की सीढ़ियां उतर कर नदी के पास आईं। गंगा के स्वच्छ पानी में एक्वेरियम की तरह साफ दिखाई दे रही थीं। उन्हें देखकर वे सब उन्हें मिलने आ गईं। उन्होंने उन्हें जीभर खाना खिलाया। उनमें से एक बड़ी मछली ने प्रेम से कहा-
‘बहनो! आप भी आओ न हमारे घर ? हम तुम्हें वर्षों बाद समुद्र से आई हमारी दीदी व्हेल मछली से भी मिलाएंगे….उन्हें बहुत अच्छा लगेगा।’
‘लेकिन हम जाएंगे कैसे ?’
‘हम हैं न ……आओ…बैठो हमारी पीठ पर!’ कहकर लगभग दस-बारह मछलियां किनारे आ गईं । वे दो-दो कर उनमें बैठ गईं। उन्होंने उन्हें दूर-दूर तक घुमाया ।
एकाएक सुनसान सड़क पर कुछ लोग इकठ्ठे होने लग गए थे। दो-चार पुलिस की गाड़ियां भी आ गईं थीं। नीलू की नानी ने सबको सचेत करते हुए कहा था-
‘लग रहा है लॉक डाउन खुल गया है । अब हमें जल्दी ही घर लौट जाना चाहिए….अब कभी भी पहले जैसे हालात लौट सकते हैं। यहां रुकना खतरे से खाली नहीं है। मनुष्य ही तो सब समस्याओं की जड़ है…जैव-विविधता के विनाश का मूल है।’
अब वे सब कुछ छोड़ अपने-अपने घरों तक पहुंचना ही सबसे बड़ी समझदारी समझ
रहे थे ।


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