32 देशों के 239 वैज्ञानिकों ने कहा-हवा में भी है कोरोना! !    श्रीनगर में लगा आधा ‘दरबार’, इस बार जम्मू में भी खुला नागरिक सचिवालय! !    कुवैत में 'अप्रवासी कोटा बिल' पर मुहर, 8 लाख भारतीयों पर लटकी वापसी की तलवार !    मुम्बई, ठाणे में भारी बारिश !    हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे पर ढाई लाख का इनाम, पूरे यूपी में लगेंगे पोस्टर !    एलएसी विवाद : पीछे हटीं चीन और भारत की सेनाएं, डोभाल ने की चीनी विदेश मंत्री से बात! !    अवैध संबंध : पत्नी ने अपने प्रेमी से करवायी पति की हत्या! !    कोरोना : भारत ने रूस को पीछे छोड़ा, कुल केस 7 लाख के करीब !    भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साधा राहुल गांधी पर निशाना !    राहुल का कटाक्ष : हारवर्ड के अध्ययन का विषय होंगी कोविड, जीएसटी, नोटबंदी की विफलताएं !    

योगमय गीता सुखमय जीवन की राह

Posted On June - 21 - 2020

आचार्य बलविंदर
योग भारतीय जीवन दर्शन एवं अध्यात्म का एक प्रमुख विषय है, जो हमारे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का सर्वसिद्ध माध्यम है। भारतीय अध्यात्मवाद के लगभग प्रत्येक ग्रंथ में किसी न किसी रूप में योग का वर्णन गहन रूप से विद्यमान है, जो मनुष्य के सर्वांगीण विकास की राह प्रशस्त करता है। भारतीय अध्यात्म के एक महत्वपूर्ण एवं आधारभूत ग्रंथ श्रीमद‍्भगवद‍्गीता में भी योग का ज्ञान लगभग प्रत्येक अध्याय में स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यही वजह है कि गीता को योगशास्त्र की उपमा भी दी जाती है। मानवमात्र को योगमय जीवन का संदेश देने के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण को योगेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि गीता में वर्णित योगमय जीवन मनुष्य को अपने कर्म-दायित्वों का मनोयोग से निर्वहन करते हुए जीवन की आदर्श राह दिखाता है। इसमें योगमय जीवन के व्यावहारिक पक्षों पर बल दिया गया है, जिसका अनुसरण आज पूरी दुनिया में धर्म, जाति, क्षेत्र व भौगोलिक सीमाओं से परे मनोयोग से किया जा रहा है। विभिन्न विद्वानों के अनुसार गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का प्रमुख रूप से वर्णन किया गया है।
तार्किक मान्यता है कि संपूर्ण गीता ही योगमय है। कुछ विद्वानों ने तो गीता में वर्णित सभी 18 अध्यायों को ही योग के विभिन्न स्वरूपों के अंतर्गत वर्गीकृत किया है– अध्याय 1 विषाद योग, अध्याय 2 सांख्य योग, अध्याय 3 कर्म योग, अध्याय 4 ज्ञानकर्म संन्यास योग, अध्याय 5 कर्म संन्यास योग, अध्याय 6 आत्मसंयम योग, अध्याय 7 ज्ञान-विज्ञान योग, अध्याय 8 अक्षर ब्रह्मयोग, अध्याय 9 राजविद्याराजगुह्य योग, अध्याय 10 विभूति योग, अध्याय 11 विश्वरूपदर्शन योग, अध्याय 12 भक्ति योग, अध्याय, 13 क्षेत्रक्षत्रज्ञविभाग योग, अध्याय 14 गुणत्रयविभाग योग, अध्याय 15 पुरुषोत्तम योग, अध्याय 16 देवासुरसंपद्विभाग योग, अध्याय 17 श्रद्धात्रयविभाग योग, अध्याय 18 मोक्ष-संन्यास योग।
कर्म, भक्ति और ज्ञानयोग
गीता के प्रथम छह अध्यायों में योग की विभिन्न साधना प्रणालियों का वर्णन है। विभिन्न विद्वानों द्वारा इनको प्रायः कर्मयोग की श्रेणी के अन्तर्गत रखा गया है। गीता के दूसरे अध्याय में कर्मयोग के विस्तृत स्वरूप का स्पष्ट वर्णन करते हुए कहा गया है-
‘समत्वं योग उच्यते।’ गीता 2/48
अर्थात‍् जब व्यक्ति का चित्त सिद्धि और असिद्धि में समभाव से युक्त होता है, तो उस व्यक्ति का मन सुख-दुख, मान-अपमान, लाभ-हानि, जय-पराजय, शीत-उष्ण और भूख-प्यास आदि द्वंद्वों में समभाव युक्त तथा संतुलित बना रहता है। इसी समत्व भाव की अवस्था का नाम योग है। इसी की निरंतरता को विस्तार देते हुए आगे कहा गया है-
‘योग: कर्मसु कौशलम‍्’। गीता 2/50
यानी फलासक्ति का त्याग करके कर्म करना ही कर्मकौशल युक्त कर्मयोग है। इसके अनुसार कर्मों के प्रति पूर्ण समर्पण और एकाग्रता में ही जीवन की कुशलता का रहस्य छुपा है। गीता के अगले छह अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण ने विभिन्न योग के स्वरूपों के साथ-साथ मुख्यतः भक्ति योग का उपदेश दिया है। गीता के अंतिम छह अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान योग के कुछ विशिष्ट एवं रहस्यात्मक सिद्धांतों के उपदेश दिए हैं। इस ज्ञान योग का मुख्य उपदेश है कि यह समस्त दृश्य जगत परमात्मा से ही उत्पन्न होता है और अंत में परमात्मा में ही लीन हो जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत का उद‍्भव एवं प्रलय का मूल कारण परमात्मा है। इस ज्ञान की अनुभूति मोक्ष का हेतु बनती है।
योगी व्यक्तित्व का स्वरूप
विभिन्न योग के स्वरूपों के साथ-साथ गीता में एक वास्तविक योगी व्यक्ति के स्वरूप एवं जीवनचर्या पर भी प्रकाश डाला गया है। गीता के पांचवें और छठे अध्याय में इस विषय पर विस्तार से वर्णन उपलब्ध है।
योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थित:। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह:।। गीता 5/10

योग एवं ध्यान हेतु उपयुक्त स्थान का वर्णन करते हुए कहा गया है– पवित्र स्थान में, जिसके ऊपर क्रमश: कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछा हुआ हो। यह आसन न अधिक ऊंचा हो और न अधिक नीचा, ऐसे आसन पर अपने शरीर को स्थिर करते हुए बैठकर साधना करनी चाहिए। आसन पर सिर और गर्दन एक सीध में रखते हुए चित्त और इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके योगसाधक अपने अन्त:करण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।
इसी संदर्भ में कहा है कि योग जिज्ञासु को स्थिरतापूर्वक सीधे बैठकर अपनी दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर स्थिर करते हुए ध्यान का निरंतर अभ्यास करना चाहिए। इससे साधक का मन सहज रूप से एकाग्र हो जाता है। ध्यानयोग के लिए उपयुक्त आहार-विहार, शयनादि नियम और उनके फल का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है कि योग न तो बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है और न तो बहुत कम खाने वाले का। योग न तो ज्यादा सोने वाले का और न सदा जागते रहने वाले का सिद्ध होता है। यानी सम्यक आहार-विहार होना चाहिए।


Comments Off on योगमय गीता सुखमय जीवन की राह
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.