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मौन के वृक्ष पर शांति के फल

Posted On June - 7 - 2020

मधुसूदन शर्मा
ईश्वर की खोज के लिए किसी भी आध्यात्मिक पथ पर जाएं, उसमें सफलता के लिए ‘मौन’ का अभ्यास आवश्यक है। मौन साधक को ‘अन्तर्मुखी’ बनाता है, जो कि ध्यान में सहायक होता है। भारत के साधु-संत अकसर ही, अपनी साधना के दौरान मौन साध लेते हैं। महर्षि रमण, महात्मा बुद्ध और दूसरे संत-महात्माओं ने ईश्वर के साक्षात्कार के लिए मौन को साधना का जरूरी सोपान माना है। आचार्य विनोबा भावे कहते थे ‘मौन और एकांत आत्मा के सर्वोपरि मित्र हैं।’
एक अरबी लोकोक्ति है ‘मौन के वृक्ष पर शांति के फल फलते हैं’। जो लोग मौन साधना करते हैं, वह अपने जीवन में एक अद‍्भुत आंतरिक शांति का अनुभव करते हैं। मौन से व्यक्तित्व में एक चुम्बकीय आकर्षण का विकास होता है। शरीर में शक्ति का संचरण होता है और विचार सकारात्मक रहते हैं।
वैसे तो सामान्य बोलचाल की भाषा में मौन का अर्थ चुप रहना समझा जाता है, परन्तु मौन का यह बड़ा ही सतही अर्थ है। मौन केवल चुप्पी मात्र नहीं है, संत कबीर कहते हैं- कबीरा यह गत अटपटी, चटपट लखि न जाए। जब मन की खटपट मिटै, अधर भया ठहराय।।
अर्थात जब मन की खटपट (अशांति) मिट जाएगी, तभी होंठों का चलना शांत होगा। जब तक मन का शोर शांत नहीं होगा, तब तक होंठों पर बलपूर्वक लगाई गई चुप्पी की लगाम का कोई अर्थ नहीं।
मौन जीवन का सबसे गहरा संवाद है। एक प्रचलित कहावत है ‘एक चुप सौ को हराये, एक चुप सौ को सुख दे जाए।’ आम जीवन में मितभाषी लोगों को श्रेष्ठ माना गया है। योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के संस्थापक श्रीश्रीपरमहंस योगानंद के अमेरिका में आरंभिक काल से ही उनके निकटतम शिष्यों में रहीं श्रीश्री दया माता, मौन के बारे में गुरु के विचार बताती हैं-‘गुरुजी गपशप के बहुत अधिक विरोधी थे। वे इसे उन बुरी एवं क्रूर आदतों में से एक मानते थे, जिनमें मानव लिप्त है। जो व्यक्ति उनके पास गपशप करने आते थे, उनसे वे प्रायः कहा करते थे, मैंने दूसरों के विषय में तुम्हारे आलोचनात्मक शब्द सुन लिए हैं। अब मैं चाहता हूं कि तुम अपने विरुद्ध बोलो। मुझे अपने दोषों के बारे में बताओ, क्योंकि तुम्हारे अंदर भी ये सब हैं।’
‘शब्द’ ब्रह्म है। बोलने से पहले शब्दों के चयन में बहुत सावधानी बरतनी चाहिये। इस जगत में ज्यादातर समस्याएं वाणी में शब्दों के दुरुपयोग के कारण ही होती हैं। महाभारत युद्ध के मूल में दुर्योधन के लिए ‘अन्धस्य पुत्रः अन्धः’ अर्थात अंधे का पुत्र अंधा कटाक्ष ही माना जाता है। परमहंस योगानंद जी ने अपने शिष्यों को एक प्रवचन के दौरान कहा, ‘यह हमारा छोटा सा मुंह एक तोप के समान है और शब्द बारूद के समान। ये बहुत कुछ नष्ट कर देते हैं। व्यर्थ बातें मत करो और तब तक मत बोलो, जब तक तुम्हें यह न लगे कि तुम्हारे शब्द कुछ अच्छा करने जा रहे हैं।’
मौन केवल होंठों को सिलना मात्र नहीं है। जब तक मन शांत नहीं होता, ऐसे चुप रहने का लाभ नहीं। अगर मन कुंठित है, विचलित है, झंझावातों में फंसा है, तो यह मौन अधूरा है। मौन की पूर्णता केवल तभी है, जब व्यक्ति जिह्वा और मन दोनों से शांत रहे। अंदर और बाहर दोनों से शांत रहने से ही मौन फलित होता है।
मौन रहने से विभिन्न मनोविकार जैसे तनाव, व्यग्रता, अवसाद, नकारात्मक सोच से मुक्ति पाई जा सकती है। वर्तमान दौर में प्रतिस्पर्धात्मक और पाश्चात्य प्रभावित जीवनशैली के चलते मनोदैहिक रोग बढ़ते जा रहे हैं।
ऐसी शारीरिक बीमारियां जिनके मूल में मनोवैज्ञानिक कारण हों, मनोदैहिक रोगों के अंतर्गत आती हैं। उच्च रक्तचाप, माइग्रेन, श्वसनतंत्र और पाचन तंत्र की कई बीमारियां, त्वचा की बीमारियां जैसे-एग्जीमा, सोरायसिस आदि मनोदैहिक रोगों के अंतर्गत आती हैं। क्योंकि मौन से मन शांत होता है, इसलिए इन रोगों में भी मौन रहने से लाभ मिलता है।

आनंद का झरना
परमहंस योगानंद जी अपने शिष्यों से कहा करते थे- ‘मौन की गहराइयों से परमानंद का झरना अवश्य फूटता है और मनुष्य के अस्तित्व पर प्रवाहित होता है।’

सांसों से साधें मन
आरंभ में मौन रहना कष्टसाध्य प्रतीत होता है। जैसे ही हम चुप रहने का प्रयास करते हैं, हमारा अशांत मन विद्रोह करने लगता है। मन को नियंत्रित करना योगियों का प्रमुख कार्य होता है। योगियों ने अपने अनुभवों से जाना कि मन में उठते विचारों और श्वास का आपस में घनिष्ठ संबंध है। मन की चंचलता का कारण श्वास के आने-जाने के प्रवाह की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि मन को शांत करना है, तो श्वास को लयबद्ध और शांत करना होगा। हमारे ऋषि मुनियों ने श्वास को शांत करने के लिए एक बहुत ही सरल प्रयोग किया है। उन्होंने बताया कि अपनी आती और जाती श्वासों का साक्षी भाव से अवलोकन करना चाहिए। इससे श्वास शांत होने लगेगा, फलस्वरूप मन भी शांति की ओर जाने लगेगा। मन शांत होगा, तो मौन में आनंद आएगा।

दिव्यता और सफलता
मौन के कारण मन की चंचलता समाप्त होने लगती है और व्यक्ति दिव्यता को प्राप्त होने लगता है, जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का लाभ प्राप्त करने लगता है। एक बार परमहंस योगानंद जी ने एक प्रवचन के दौरान अपने शिष्यों को बताया, ‘किसी मुख्य निर्णय के पूर्व आपको मौन बैठकर परमपिता से उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। तब आपकी शक्ति के पीछे ईश्वरीय शक्ति, आपके मस्तिष्क के पीछे उनका मस्तिष्क एवं आपकी इच्छा के पीछे उनकी इच्छा होगी।’ सामान्य जीवन में मौन का शत प्रतिशत पालन करना संभव नहीं हो पाता। लेकिन हम कम बोलने का अभ्यास तो कर ही सकते हैं। अल्पभाषी बनकर हम बहुत सारी सामाजिक बुराइयों से निजात पा सकते हैं। अवकाश के दिनों में कुछ घंटों के लिए पूर्ण मौन रखा जा सकता है। श्रीश्री परमहंस योगानंद जी आम लोगों को मौन के लिए यह संदेश देते हैं- लोगों के साथ मौन रहिए, अमूल्य शक्ति एवं समय को निरर्थक वार्तालाप में बरबाद मत कीजिए। भोजन के समय मौन रहिए, कार्य करते समय मौन रहिए। ईश्वर को मौन से प्रेम है।


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