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मजबूरी का नाम ऑनलाइन

Posted On June - 14 - 2020

आलोक पुराणिक

कोरोना महामारी के बाद जो क्षेत्र पूरे तौर पर बदल जायेंगे, शिक्षा का क्षेत्र उनमें से एक है। कोरोना महामारी के आने के बाद तमाम स्कूल , कोचिंग सेंटर, ट्यूशन सेंटर बदल गये हैं। कोचिंग सेंटर और ट्यूशन सेंटर तो निजी क्षेत्र में काम करते हैं, इसलिए यहां बदलाव की गति बहुत तेज थी। लॉकडाऊन के विस्तार के बाद तमाम सर और मैडम अब बच्चों को ऑनलाइन पढ़ा रही हैं-ज़ूम नामक एप्लीकेशन के ज़रिये छात्र और गुरुजी ऑनलाइन आपस में संवाद कर सकते हैं। कई कोचिंग सेंटर तो बहुत बड़े इश्तिहार इसी आशय के दे रहे हैं कि ऑनलाइन पढ़िये। ऑनलाइन कोचिंग बड़ा कारोबार है। कोरोना ने उसे बहुत ही बड़ा बना दिया है।
तकनीक से रूबरू हो रहे टीचर
कई गुरुजी और मैडमें नयी तकनीक के मॉडल पर काम कर रही हैं कि जूम, यूट्यूब वीडियो के जरिये वो पढ़ायेंगी और उनका भुगतान पेटीएम या किसी और ऑनलाइन माध्यम से हो जायेगा। यानी एक हद तक यह संभव हो जायेगा कि शिक्षा और फीस के आदान प्रदान के लिए एक दूसरे भौतिक तौर पर मिलना ज़रुरी नहीं है। तकनीक पर सवार होकर शिक्षा जायेगी और तकनीक पर सवार होकर फीस आयेगी। गुरु और चेले का संबंध तकनीक के ज़रिये ही संभव होगा। सोशल डिस्टेसिंग का एक परिणाम यह भी होगा कि टीचर और छात्रों के बीच दूरी बने। हालांकि इस दूरी के कई नकारात्मक निहितार्थ भी हैं। पर अब जो सिर पर आ पड़ी है कि शिक्षा का काम तकनीक के ज़रिये हो, ऑनलाइन हो, तब उन निहितार्थों पर चिंतन का समय किसी के पास नहीं है।
बदलाव ज़रूरी
दुनिया बदल रही है, शिक्षा की दुनिया बहुत ही तेज़ी से बदल रही है। और जो नहीं बदल रहे हैं, वो अप्रासंगिक होने के खतरे के साथ जी रहे हैं। दुनिया का हर बदलाव न्यायपूर्ण नहीं होता। हर बदलाव का वर्ग विश्लेषण करें, तो साफ होता है कि अपेक्षाकृत समर्थ और संपन्न वर्ग थोड़े बहुत समायोजन के साथ हालात का मुकाबला बेहतर तरीके से कर पाता है। विपन्न वर्ग के सामने ज्यादा समस्याएं आ जाती हैं।
जिस वर्ग के बच्चों के पास पहले से उनका एक निजी लैपटाप था, उनका निजी मोबाइल था, उनके लिए जूम या किसी और आनलाइन व्यवस्था से आनलाइन शिक्षा से जुड़ना मुश्किल ना हुआ। पर जिन परिवारों के पास और खासकर बच्चों के पास इंटरनेट की व्यवस्था नहीं है, उनके लिए दिक्कतें बढ़ी हैं। देश में स्थितियां अभी ऐसी नहीं हैं जब सारे पक्ष ऑनलाइन बहुत मजबूत तरीके से जुड़ें और फिर जुड़े रह पायें।
हर हाथ में मोबाइल का मतलब
मार्केट रिसर्च फर्म टेकआर्क के शोध के मुताबिक 2019 के अंत तक 50 करोड़ भारतीय स्मार्टफोन का प्रयोग कर रहे थे। पचास करोड़ का मतलब हुआ कि करीब 137 करोड़ की भारतीय जनसंख्या में करीब 37 प्रतिशत जनसंख्या के पास ही स्मार्टफोन हैं। हरेक पास स्मार्टफोन है, यह बात कहने को बहुत आसानी से कही जा सकती है। पर स्मार्टफोन हरेक के पास नहीं है, यह बात तथ्य बताते हैं। यानी इंटरनेट सबके लिए बहुत सहज सुलभ नहीं है। यह अलग बात है कि 50 करोड़ स्मार्टफोनों का आंकड़ा बहुत बड़ा है पर इससे यह बात साबित नहीं होती है कि भारत में हर परिवार के पास स्मार्टफोन है हर परिवार के बच्चे स्मार्टफोन के जरिये आनलाइन शिक्षा से जुड़ जायेंगे। इस वंचित तबके तक आनलाइन शिक्षा पहुंचा पाना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस चुनौती का सामना कैसे किया जाये, इस पर विचार करना होगा। क्योंकि विशेषज्ञ एक बात लगातार कह रहे हैं कि अब हम सबको कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। यानी कोरोना अभी जल्दी से जानेवाला नहीं है। कुछ विश्वविद्यालयों ने इस संबंध में योजना बनाना शुरु किया है कि आगामी सत्रों में कोर्स का एक हिस्सा ऑनलाइन पढ़ाया जायेगा।
हालात अगर ना सुधरे तो कई विश्वविद्यालयों को परीक्षाएं भी आनलाइन लेनी होंगी। कुछ विश्वविद्यालयों ने इस दिशा में काम शुरु किया है। एक योजना यह है कि ओपन बुक एक्जाम यानी खुली किताब परीक्षाएं हों। परीक्षार्थी घर पर इंटरनेट के जरिये प्रश्न-पत्र को डाउनलोड करें और फिर उत्तर लिखकर उत्तर-पत्रिका को वापस अपलोड कर दें।
यह भी न्यूनतम प्रशिक्षण की मांग करता है। स्थिति यह है कि ऑनलाइन शिक्षा की तरफ सुचिंतित तरीके से अग्रसर होते, तो स्थितियां बेहतर होतीं। जल्दबाज़ी में जो कमियां, समस्याएं रह सकती हैं, वो रहेंगी। उनके साथ ही समायोजन की व्यवस्था करनी होगी। कक्षा दस से ऊपर के बच्चों को वरिष्ठ बच्चों या एक हद तक परिपक्व बच्चों की संज्ञा दी जा सकती है। पर कक्षा एक या दो के बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है। शिक्षाविदों के सामने चुनौती है कि किस तरह से छोटे बच्चों का, छोटी कक्षाओं का शिक्षण ऑनलाइन किया जा सकता है। कई विषय ऐसे हैं जिन्हें आनलाइन पढ़ाना आसान नहीं है। फिजिक्स की प्रयोगशालाओं को ऑनलाइन स्तर पर लाना मुश्किल काम है। सोशल डिस्टेसिंग की जब बात है, तो विद्यालयों को अपने ढांचे पर ज्यादा खर्च करना होगा। एक कक्षा में चालीस बैठते थे, अब बीस बैठेंगे यानी कक्षाओं की संख्या बढ़ानी होंगी। इसके चलते लागत बढ़ेगी। निजी स्कूल बढ़ी हुई लागत अगर अभिभावकों से वसूलना चाहेंगे तो आसान न होगा। कई स्कूलों के अभिभावक पहले ही मोर्चा खोले हुए हैं कि कोरोना महामारी के चलते आर्थिक मंदी फैली है और उसमें सबके रोज़गार धंधे चौपट हो गये हैं, तो फीस माफ रखी जाये। फीस माफ रखने की मांग इधर है, उधर लागत बढ़ने के इंतज़ाम हैं, स्कूली शिक्षा और खासकर निजी क्षेत्र की स्कूली शिक्षा बहुत चुनौतियों से दो चार होने वाली है।
इंटरनेट की स्पीड
आधारभूत ढांचे का एक सिरा जुड़ता है इंटरनेट की गति से। इस आशय की ढेर खबरें इधर आयी हैं कि कई लोगों के घर से काम करने के कारण इंटरनेट की गति धीमी हो गयी। धीमी गति के इंटरनेट में ऑनलाइन कक्षाएं मुश्किल से चलती हैं। वीडियो रुक जाता है। पढ़ाने की गति बाधित होती है। एक विकल्प यह है कि टीचर अपना वीडियो लेक्चर तैयार करके ईमेल कर दे छात्रों को या यू ट्यूब पर अपलोड कर दे या व्हाट्सअप के ज़रिये बच्चों को भेज दे। लाइव क्लास के लिए इंटरनेट की गति ठीक ठाक होना ज़रुरी है। इसलिए सरकार को इस बात को ध्यान में लेना होगा कि कक्षाओं के लिए दुरुस्त इंटरनेट गति सुनिश्चित करायी जाये। कोरोना महामारी के नतीजे अगर लंबे समय तक रहे और ऑनलाइन शिक्षा पर निर्भरता बढ़ी, तो फिर यह भी सुनिश्चित करना होगा कि हर छात्र के पास एक स्मार्टफोन भी रहे। गरीब तबके के छात्रों के लिए स्मार्टफोन की व्यवस्था करनी होगी। तकनीक के जरिये ही अगर ज्ञान पहुंच रहा है, तो तकनीक सबको उपलब्ध होनी चाहिए। मानव संसाधन विकास संबंधी स्टैंडिंग कमिटी ने फरवरी, 2017 में ‘भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र के समक्ष चुनौतियां और समस्याएं’ पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इस समिति का एक निष्कर्ष यह था कि उच्च शिक्षा के सामने संसाधनों का संकट है। उच्च-शिक्षा से जुड़ी व्यवस्थाएं आनलाइन हों, इसके लिए शिक्षकों को भी प्रशिक्षण की ज़रुरत होगी। एक तरीका तो यह है कि आक्रामक तरीके से निजी क्षेत्र की मदद ली जाये। पर यह भारतीय संदर्भों में इतना आसान नहीं है। निजी क्षेत्र सार्वजनिक शिक्षा को एक सीमा तक को मदद कर सकता है, पर व्यापक मदद के लिए निजी क्षेत्र बदले में कुछ चाहेगा। कुल मिलाकर भारतीय उच्च शिक्षा संसाधनों के जिस संकट से जूझ रही है। स्कूली शिक्षा की बात अगरऑनलाइन संदर्भों में करें, तो निजी क्षेत्र के स्कूल तो इसके खर्च का ठीकरा देर सबेर अभिभावकों के सिर फोड़ ही देंगे। पर सरकारी स्कूलों को इसके लिए अतिरिक्त फंड लाना होगा। वह सरकार से ही आयेगा।


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