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बांस का आशियाना

Posted On June - 28 - 2020

पर्यावरण को लेकर जताई जा रही चिंताओं में कंक्रीट के जंगलों का तेजी से बढ़ना और हरियाली का उजड़ना शामिल है। विशेषज्ञ कहते हैं कि निर्माण कार्य में अगर बांस का इस्तेमाल बढ़ाया जाये तो इसके दोहरे फायदे हैं। बांस तेजी से बढ़ता है और इसे काटने में कोई कानूनी अड़चन भी नहीं है। पूर्वोत्तर के राज्यों में लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े बांस को हर जगह आम जन से जोड़े जाने के फायदे बता रही हैं निवेदिता खांडेकर

बांस। कभी इसे पेड़ माना गया। फिर कानून में बदलाव कर इसे घास की श्रेणी में डाला गया। ताकि इसे काटने, इधर से उधर ले जाने में कोई कानूनी अड़चन न आये। हरा-भरा बांस जहां लगा होता है, वहां की छटा तो निराली होती ही है, इसके और भी कई गुण हैं। यह ऑक्सीजन प्रदान करता है, अच्छी-खासी मात्रा में कार्बन डाई आक्सॉइड को अवशोषित करता है। इससे फर्नीचर बनता है। कुटीर उद्योगों में चटाई और पंखे बनते हैं। घर बनते हैं। पर्यावरण अनुकूल घर। पूर्वोत्तर के राज्यों में तो लोगों की दुनिया बांस से ही बसी है। अब बांस को निर्माण क्षेत्र में और विस्तारित करने की योजनाओं पर काम चल रहा है। इस साल की शुरुआत में दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में तो बांस का कॉटेज लोगों को बहुत दिनों तक लुभाता रहा। असल में इस सेंटर के प्रांगण में मध्य दिसंबर के मौके पर ‘वार्षिक गृह समिट’ के दौरान 240 वर्ग फुट के बांस के कॉटेज को स्थापित किया गया। यह एक आरामदायक घर की तरह था। समिट खत्म होने के बावजूद लंबे समय तक यहां लोग आते रहे और इस कॉटेज के पास सेल्फी लेते रहे। बांस के संबंध में कई जानकारियों वाला पोस्टर भी यहां लगाया गया। ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी) ने इसे ‘वेणु कुटीर’ (बांस को संस्कृत में वेणु कहते हैं) नाम दिया। ‘वेणु कुटीर’ स्थापित करने के पीछे सोच यह थी कि बांस की महत्ता को निर्माण क्षेत्र में स्थापित किया जाये। निर्माण क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली सामग्री जैसे कि स्टील, कंक्रीट, अल्युमिनियम और शीशा, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के बड़े कारक हैं। इसके कारण वातावरण पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

असल में अध्ययनों से यह बात स्थापित हो चुकी है कि उगते समय बांस आक्सीजन छोड़ता हैं और भारतीय बांस की कुछ प्रजातियां सालाना प्रति हेक्टेयर 200 मीट्रिक टन तक कार्बन डाईऑक्साइड अवशोषित करती हैं। इसलिए, भवन निर्माण के लिए बांस अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री है। वास्तव में, बांस का उपयोग स्थायी और आधुनिक भवन निर्माण के लिए किया जा सकता है। उत्तर पूर्व भारत के लगभग सभी राज्यों में बांस से आकर्षक आशियाने बने हैं। यहां ऐसे घरों की कई तरह की वैराइटियां मिल जाएंगी। यहां लोगों ने बांस से यूनीक डिजाइन वाले घर बनाये हैं। हाल के वर्षों में रिसॉर्ट में बांस का प्रयोग बढ़ा है, परंतु अभी भी निर्माण कारोबार में बांस का उपयोग पूरी तरह नहीं किया जा रहा है। पारंपरिक रूप से पूरे भारत में भवन निर्माण के लिए लकड़ी और बांस सबसे पसंदीदा सामग्री रहे हैं। पहले बांस को पेड़ की श्रेणी में डाला गया, जिससे इसका खुला प्रयोग कठिनाई भरा हो गया, लेकिन दिसंबर 2017 में नीतियों में बड़ा बदलाव तब हुआ जब केंद्र ने बांस को ‘पेड़’ की श्रेणी से निकालकर पुनः घास की श्रेणी में डाल दिया। बांस को लेकर बेशक चीजें बदल रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर तभी दिखेगा जब बांस इको सिस्टम का हिस्सा बन जाएगा। लकड़ी या बांस को निर्माण क्षेत्र में उतारने से होने वाले इसके लाभों में पहला तो, सीमेंट और इस्पात उत्पादन से होने वाली ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन से बचाना है। दूसरा, यह इमारतों को कम कार्बन वाली श्रेणी में ला सकता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि लकड़ी या बांस को भवन निर्माण में उतारने के साथ ही वन प्रबंधन पर भी जोर देना होगा क्योंकि वनों की कटाई भी पर्यावरण को असंतुलित कर सकती है। विशेषज्ञ कहते हैं कि बांस को व्यापक रूप से उगाकर इसके वाणिज्यिक इस्तेमाल से अनेक फायदे होंगे।
पर्यावरण बचाने को उठाने होंगे कदम
नीति निर्माता और आम जन यह नहीं समझ पा रहे हैं कि ज्यादातर निर्माण सामग्री पर्यावरणीय क्षति का कारण हैं। आज कोई भी सामग्री जिसका हम निर्माण में उपयोग करते हैं, मसलन-स्टील, सीमेंट, अल्युमिनियम, पर्यावरण विनाश का निशान छोड़ती हैं। हम पर्यावरण नुकसान को कब तक जारी रख सकते हैं? आर्किटेक्ट, टाउन प्लानर और दिल्ली अर्बन आर्ट्स कमीशन के पूर्व अध्यक्ष प्रो. केटी. रविंद्रन कहते हैं, ‘जल्द ही पूरे भवन उद्योग के लिए संकट पैदा होने वाला है, विशेषतौर पर जलवायु परिवर्तन को देखते हुए।’ रविंद्रन खुद अपने विभिन्न प्रोजेक्टों में लकड़ियों का प्रयोग व्यापक रूप से कर रहे हैं। वह लकड़ी के लिए मुख्य वनों को काटे जाने की वकालत नहीं करते। उनके अनुसार कम महत्व की लकड़ी का उपयोग करने की प्रचुर गुंजाइश है। यह कम समय में उगती हैं और उनके यहां विभिन्न प्रकार के आप्शन मौजूद हैं। वे बांस के उपयोग की वकालत करते हैं, जो सभी जगह बहुत कम समय में तैयार होता है। बांस कम उपज वाला उत्पाद है। यह अपने आप भी लग जाता है और व्यावसायिक तौर पर भी इसे उगाया जा सकता है। यह बहुत जल्दी उगता है। यह एक गेमचेंजर साबित हो सकता है, अगर बुद्धिमानी से मकानों के दोनों ऊपरी सिरों पर केमिकल प्रोसेस्ड बांसों का उपयोग किया जाए तो इनसे बने घर बहुत सस्ते होंगे। यह न सिर्फ बांस उत्पादकों की आय को कई गुणा बढ़ाने में सहायक होगा, बल्कि धरती माता को हो रहे नुकसान को भी कम करेगा।
बहुत हैं उपयोग, शुरुआत तो हो
दिल्ली मुख्यालय वाले गैर लाभकारी संगठन इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट्स एंड कल्चरल हेरिटेज (इनटैक) ने निर्माण संबंधी तकनीक का दस्तावेजीकरण शुरू किया। राज्यवार सूची में सबसे आम पारंपरिक निर्माण सामग्री लकड़ी और बांस के रूप में सामने आई। इंडियन फेडरेशन आफ ग्रीन एनर्जी के संदीप थेंग का मानना है, ‘अब भारतीय भवन निर्माण कंपनियां कई चीजों को बांस के साथ बदलने के लिए जाग रही हैं। बांस से बोर्ड, फर्श, प्लाईबोर्ड, फर्नीचर आदि चीजें बन रही हैं। बांस के उत्पादों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।’ कुछ लोगों को बांस के प्रचुर मात्रा में उपयोग को लेकर संशय भी है। ऐसे लोग कहते हैं कि लकड़ी या बांस केवल एक या दो मंजिले भवन के लिए अच्छा हो सकता है। यह तेजी से बढ़ते भवन व्यवसाय को कैसे बदल सकता है? थेंग कहते हैं, ‘लोगों को इसकी जानकारी नहीं है कि बांस के लचीलेपन की ताकत स्टील से बहुत ज्यादा है। ऊंची इमारतों में इसका प्रयोग बहुत अच्छी तरह किया जा सकता है।’ रविंद्रन कहते हैं, ‘ऐसे भी ऊंची इमारतों का तेजी से बनना बहुत अच्छा नहीं हैं। वे न सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी महंगे हैं।’ लकड़ी और बांस की इमारतों का उपयोग शहरों में सार्वजनिक सेवा के भवनों और सरकारी विभागों के निर्माण के लिए शुरू किया जा सकता है। बस स्टाप, कार शेड्स, बिल पेमेंट कियोस्क, शैक्षिक संस्थानों, सामुदायिक भवनों और तमाम अन्य तरह की इमारतें, जो अत्यधिक ऊंची नहीं होतीं, को आसानी से लकड़ी और बांस से बनाया जा सकता है। थेंग सलाह देते हैं, ‘मंत्रालय द्वारा कभी भी किसी भी तरह के भवन के निर्माण में बांस के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए एक नीति होनी चाहिए।’
जैसा इलाका, वैसा घर
एक समय था जब वास्तुकला, क्षेत्र विशेष की परिस्थिति के हिसाब से होती थी। एक हिमाचली घर की छत पत्थर से बनी होगी जिसे सपोर्ट देने के लिए उसके नीचे मोटी लकड़ी लगी होगी। ऐसे ही कोंकण तटीय क्षेत्र में एक ढलान वाली (कावेलू) लाल छत वाले घर होंगे। मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र का घर मिट्टी के फर्श/मिट्टी की दीवार वाले होंगे जो गाय के गोबर के घोल से लिपी पुती होती हैं। ऐसे ही अरुणाचल प्रदेश में एक पारम्परिक मकान बनाने के लिए बांस का प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है। आज भारत के किसी भी शहर की यात्रा कीजिए, सभी एक जैसे दिखाई देते हैं-समान रूप से विशालकाय डरावनी आरसीसी की इमारतें, जिनमें सुंदरता न के बराबर होती है। फर्श और दीवारों पर पत्थर की टाइलें। हाल के दशकों में मकानों के अगले भाग में शीशे लगाए जाने लगे। अब तो सीमेंट और कंक्रीट के घर बनने का वायरस ग्रामीण इलाकों में भी फैल रहा है। सरकार की पक्का मकान देने की योजना भी ईंट और सीमेंट की इमारतों की ओर इशारा करती है।
जलवायु परिवर्तन से लड़ने में कारगर
अंतर्राष्ट्रीय बांस और रतन संगठन (इनबार) ने बांस से होने वाले फायदों की सूची तैयार की है। विशेषतौर पर जलवायु परिवर्तन की चिंता के समय। बांस और बांस से बने कई टिकाऊ उत्पाद संभावित रूप से कार्बन नेगेटिव हो सकते हैं क्योंकि वे आपस में कार्बन सिंक में बंद होते हैं। आज उच्च बेरोजगारी दर और कृषि संकट के बीच बदलते जलवायु के समय बांस से परिस्थितियां अनुकूल होने की संभावना है। बांस और उससे तैयार उत्पाद वर्षभर की जीविका मुहैया करा सकते हैं। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी (यूके) और यूनिवर्सिटी आफ नेचुरल रिसोर्सेज एंड लाइफ साइंसेज इन विएना (ऑस्ट्रिया) के शोधकर्ताओं का एक शोध ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित हुआ। उसमें बताया गया कि बांस की तापीय चालकता की जांच से पता चला है कि ‘इमारतों में आवश्यक हीटिंग और कूलिंग की मात्रा मौलिक रूप से उस सामग्री के गुणों से संबंधित होती है।’ बांस का उपयोग पारंपरिक निर्माण सामग्री की तुलना में उत्सर्जन को नाटकीय रूप से कम कर सकता है और जलवायु परिवर्तन पर मानव प्रभाव को कम करने में मदद करता है, जलवायु समाचार नेटवर्क ने कैंब्रिज में आर्किटेक्चर विभाग के दर्शिल शाह के हवाले से बताया, ‘लोग बांस की इमारतों की अग्नि सुरक्षा के बारे में चिंता कर सकते हैं। इसके लिए हमें निर्माण सामग्री के थर्मल गुणों को समझना होगा। बांस में फाइबर की मोटी दीवार होती है जो तेज़ी से आग पकड़ती है। निर्माण के दौरान इमें इसका ध्यान रखना होगा। क्योंकि अगर यह फाइबर की दीवार आग के संपर्क में आती है तो बहुत जल्दी नरम पड़ने लगती है और आग तेज़ी से फैल सकती है। यह सारी बातें हमें उचित तरीके से इमारत को सुदृढ़ करने के लिए काम करने में मदद करती हैं।’ कुछ समय पहले, पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च द्वारा जारी एक बयान में दलील दी गई थी कि अगर इमारतें सीमेंट और स्टील की जगह लकड़ी से बनीं तो वैश्विक कार्बनडाई ऑक्साइड की मात्रा कम हो सकती है। शहरी निर्माण में सीमेंट और स्टील की जगह लकड़ी की सामग्री के उपयोग के बदलाव की क्रांति जलवायु स्थिरीकरण के लिए दोहरे लाभ दे सकती है।


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