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फिर याद आई नानी की कहानी

Posted On June - 7 - 2020

क्षमा शर्मा

बचपन में जब पिताजी उड़ते हुए घोड़े की कहानी सुनाते थे तो वास्तव में वह घोड़ा उड़ता हुआ दिखाई देता था। कभी परी, कभी जादूगर, कभी कोई राक्षस तो कभी कई बोलने वाला बैल, हाथी, तोता, मोर, सब हमारी दादी, नानी, दादा, दादी मौसी, चाची ताई की सुनी कहानियों में आता था। संयुक्त परिवार के दौर में कहानी सुननेे और सुनाने वालों कमी नहीं थी। गरमी की दोपहर या गरमी की रातें जहां सब छत पर या आंगन में सोते थे। अंधेरी रात में चमकते सितारों या चांद की चांदनी के बीच न जाने कितनी कहानियां कही सुनी जाती थीं। गांवों और शहरों में बच्चों को अपने बीते ये दिन और इनसे जुड़ी कहानियां हमेशा याद रहती थीं। दिलचस्प बात ये है कि ये कहानियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यात्रा करती रहती थीं। समय और देशकाल के अनुसार कहानियों में थोड़ा बहुत परिवर्तन भी होता रहता था। इन कहानियों के कथानक हमारी श्रुत परंपरा से जुड़े होते थे। यही नहीं ये तीनों कालों अतीत, वर्तमान, भविष्य की यात्रा करते थे।
रोज़ी-रोटी की तलाश में छूटे गांव
धीरे-धीरे समय बदला। गांवों से छोटे शहरों, कस्बों, महानगरों तक रोज़ी-रोटी की तलाश में लोगों की आवाजाही बढ़ी। लोग यहां से निकले तो कभी लौटे ही नहीं। इसी अनुपात में संयुक्त परिवार भी टूटे। परिवार बिखरे तो दादी-नानी की कहानियां भी पृष्ठभूमि में चली गईं। परिवार छोटे हुए। जिन परिवारों में माता-पिता दोनों नौकरी करते थे, वहां बच्चे घरेलू सहायिकाओं और डे केयर सेंटर के भरोसे पलने लगे। माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बिताया जाने वाला समय लगातार कम होता गया। सिर्फ बच्चे ही नहीं वृद्धों का भी अकेलापन बढ़ा।
पिछले दिनों जब से लॉकडाउन शुरू हुआ, सब घरों में रहने को मजबूर हुए। बहुत से परिवार ऐसे भी थे जहां बच्चों के साथ बुजुर्ग मां-बाप भी थे।
अब जब साथ रह रहे हैं, बाहर की दुनिया के दरवाज़े इतने लम्बे समय तक बंद हैं तो सब आपस में मन लगाने की सोच रहे हैं। वे बच्चे जो अक्सर इस तलाश में रहते थे कि कब मम्मी-पापा, दादा, दादी या किसी बड़े का मोबाइल हाथ लगे और उस पर मनपसंद खेल खेलें या यू ट्यूब पर कोई फिल्म देखें। लेकिन जब से घर में बंद हुए तब से सिवाय मोबाइल, कम्प्यूटर टी वी के कुछ नहीं बचा है। न दोस्तों का साथ है न फुटबाल, बैडमिंटन या कोई और आउटडोर खेल खेलने का मौका है। ऐसे में पुराने वाले सारे खेल जैसे लूडो, कैरम, शतरंज आदि के दिन बहुर गए हैं। परिवार के अधिकांश सदस्य इन्हें मिलकर खेल रहे हैं। एक तरह से घर के बुजुर्ग और बच्चे बहुत खुश भी हैं। इतना समय इकट्ठा तो कभी नहीं बिताया।
लौट आई नानी की कहानी
यहां तक कि रात को दादी- नानियों की कहानियों के दिन भी लौट आए हैं। हालांकि अब दादी-नानियां भी वे नहीं रहीं जिन्हें हम चित्रों में देखते आए हैं। वे इस दौर की दादी-नानियां हैं। पढ़ी-लिखी भी हैं। इसलिए उनकी कहानियां भी बदल गई हैं। लोककथाओं परीकथाओं के साथ-साथ दादी नानी की कहानियों में आधुनिक कथों को भी जगह मिलने लगी है। हालांकि लगता है कि यह बदलाव ठीक भी है। इस लेखिका ने सांस्कृतिक मंत्रालय की बाल पत्रिकाओं में छपी लोककथाओं पर काम किया था। तब एक दशक में छपी बहुत सी कहानियों को पढ़ा था। उन्हें पढ़कर लगा था कि वे समय के साथ नहीं बदली हैं। अब भी उनमें लैंगिक भेदभाव, जाति का ऊंच-नीच, रंगभेद, अमीर गरीब का फर्क और ऐसी बातों को सही ठहराना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। छपाने वालों ने भी यह नहीं सोचा कि वक्त के साथ इन कहानियों में बदलाव होना चाहिए।
बच्चों के विकास में कहानी को रोल
पिछले दिनों दादी-नानी की कहानियों पर दिल्ली की हिंदी अकादमी ने एक गष्ठी भी की थी। इसमें भी रेखांकित किया गया था कि बच्चों के विकास में ये कहानियां बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जैसे कि सही गलत की पहचान, किसी कमज़ोर को कभी न सताना, ज़रुतमंद की मदद करना, अपने माता-पिता दादा-दादी का सम्मान, पशु-पक्षियों की देखभाल पर्यावरण की रक्षा आदि बातें इन कहानियों में यूं ही चलती चली आती हैं इन्हें अलग से नहीं बताना पड़ता। वैसे भी कहानियों के संदेश कहानियों के भीतर ही होने चाहिए। पहले पुस्तकों में कहानी के बाद अक्सर बोल्ड अक्षरों में कहानी का संदेश लिखा रहता था। इसे अच्छा भी नहीं माना जाता। अच्छी कहानी वह मानी जाती है जिसमें संदेश अलग से न बताकर कहानी के भीतर ही हो। वह पात्रों के आपसी व्यवहार के रूप में सामने आए।
कहानी के संदेश और मनोविज्ञान
इसके अलावा अगर ध्यान से देखें तो दादी- नानी की कहानियों में कथानक प्रमुख होता था। वह बच्चों के भोलेपन और उनकी जिज्ञासाओं जैसे कब, क्यों, कहां, किसने का समाधान करता था। जबकि छपी हुई पत्र पत्रिकाओं की कहानियों में अकसर बदलाव होते रहे हैं। एक समय में कहानी के संदेश कहानी के खत्म होने के बाद छपे रहते थे। इस दौर में कथानक प्रमुख होता था । जैसे कि सत्तर प्रतिशत कथानक और तीस प्रतिशत चित्र। फिर एक ऐसा दौर आया जब कहा जाने लगा कि बच्चों की कहानियों में चित्र अधिक और कथानक कम होना चाहिए। लेकिन तब विशेषज्ञों ने यह भी माना कि अनेक बार चित्र बच्चों की कल्पना शीलता को कुंद करते हैं। अगर बता दिया गया कि एक शेर था और चित्र में दिखाया गया कि वह कैसा था तो बच्चा कल्पना तो करेगा ही नहीं कि शेर कैसा हो सकता है। कई बार कल्पना के जरिये हर बच्चे का शेर अलग हो सकता है। लेकिन चित्र में देखने पर सब बच्चे एक ही तरह के शेर को समझेंगे। फिर एक वक्त ऐसा भी आया जब लोग कहने लगे कि ज़रूरी नहीं कि कहानी में जो हो वह चित्र में भी दिखाया जाए।
लॉकडाउन ने बदला परिदृश्य
लेकिन अब फिर से वह वक्त आ गया है जब कथानक का महत्व बढ़ता है। लॉकडाउन ने बताया है कि सुनी जाने वाली कहानियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि पढ़ी जाने वाली कहानियां। यही नहीं अब फिर से इस बात पर जोर दिया जाने लगा है कि चित्र बच्चों की मनोभावना के अनुकूल हों।
मशहूर पत्रकार अलका सक्सेना ने आज से तीन दशक पहले एक लेख लिखा था कि पहले जब बच्चों के लिए खिलौने बनाए जाते थे, वे बच्चों की भावनाओं के अनुकूल ही होते थे। हिंसक पशु जैसे शेर बाघ, मगरमच्छ जैसे खिलौनों के चेहरों पर भी एक भोलापन होता था।
इंटरनेट गेम्स का दौर
हालांकि वह दौर भी हमने देखा जब बच्चों की जिंदगी में ऐसे चरित्रों ने जगह बनाई जो हंसी से भरपूर थे। बच्चों की दुनिया में हिसक बंदूकों और दुर्घटना करती कराती कारों के खेल भी बहुत लोकप्रिय हुए।
स्पाइडर मैन, बैटमैन, सुपरमैन मिकी माउस डोनाल्ड डक, बास बेबी, तमाम किस्म के रोबोट अब भी बच्चों की दुनिया में हैं। समय समय पर विशेष इनके खिलाफ चेताते भी रहे हैं। पिछले साल फ्रांस के एक बड़े खिलौना स्टोर में इस लेखिका ने ऐसे ही खिलौनों की भरमार देखी थी।
दादी-नानी की कहानियों का मुकाबला नहीं
लेकिन यह भी सच है कि दादी-नानी या घर परिवार के अन्य सदस्यों अथवा अध्यापकों द्वारा सुनी गई कमल कहानियों का आज भी कोई मुकाबला नहीं है। आम तौर पर अच्छे और बुरे का फर्क बताने वाली कहानियों का बच्चों के जीवन पर गहरा असर पड़ता है। इस दौर में जब परिवार कह रहे हैं कि सब एक –दूसरे के साथ समय बिताना सीख रहे हैं , एक –दूसरे के नज़दीक आ रहे हैं ऐसे में अगर बच्चों के जीवन में दादी-नानी की कहानियां भी जगह बना रही हैं तो कितना अच्छा है।
एक बार अमिताभ बच्चन ने कहा था कि हर कहानी में रामायण और महाभारत की कहानियां ही दोहराई जा रही हैं। जिनका मूल मकसद है बुराई पर अच्छाई की विजय। बरसों पहले एक बार मशहूर लेखक निर्मल वर्मा ने दिल्ली के इंडिया गेट पर एक पुस्तक मेले का उद्धघाटन करते हुए कहा था कि बचपन में मैं जैसे ही पढ़ता था कि एक शेर था, तो मैं सब कुछ छोड़कर शेर के पीछे चल देता था।


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