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प्रामाणिकता का पैमाना नहीं

Posted On June - 14 - 2020

यू ट्यूब यूनिवर्सिटी

रेशू वर्मा

यू-ट्यूब पर इन दिनों कोरोना महामारी से लड़ने के उपायों की हर तरफ चर्चा है। कुछ लोग किसी आसन से कोरोना दूर कर रहे हैं तो किसी के पास होम्योपैथी की कोई दवाई है, जो कोरोना को दूर भगा देगी। किसी के पास कोई काढ़ा है, जिससे कोरोना दूर भाग जायेगा। ज्ञान की जितनी धाराएं-उपधाराएं हैं, वो सब किसी ना किसी सूरत में यू-ट्यूब पर बह रही हैं। इन्ही में कुछ व्हाट्सअप के ज़रिये भी आगे बहायी जा रही हैं। सूचनाएं, ज्ञान बिखरा पड़ा है, बहुत बिखरा पड़ा है। बस एक एक छोटे सा सवाल अनुत्तरित है, इनमें बांटी जा रहे ज्ञान की ज़िम्मेदारी किसकी है। यह सवाल अपनी जगह अब भी बना हुआ है। यह अनायास नहीं है, इन दिनों डॉक्टरों के यहां इस आशय का नोटिस लगा रहता है कि गूगल, व्हाट्असप और यू-ट्यूब पर उपलब्ध बीमारियों के इलाज से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए अलग से भुगतान करना होगा।
यूट्यूब की कला
यू-ट्यूब ने शक्ति दी है, इसमें कोई शक नहीं है।
कोई गृहिणी कोई कला सीखना चाहती है, तो उसे यू-ट्यूब में अपने काम के कुछ वीडियो मिल सकते हैं। पर मूल मसला वही है प्रामाणिकता का। प्रामाणिकता, जिम्मेदारी की बात जहां तक आती है, वहां यू-ट्यूब समेट कई आनलाइन माध्यम सवालों के घेरे में खड़े हो जाते हैं। मनोरंजन के लिए, हाबी के कुछ कुछ करना, सीखना अलग बात है। पर गंभीर विषयों पर प्रामाणिक ज्ञान का आदान-प्रदान एक अलग विषय है। फरवरी 14, 2005 में जब जावेद करीम, स्टीव चेन और चाड हर्ले ने एक ऑनलाइन वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म के रूप में यू-ट्यूब की शुरुआत की तब उन्होंने इसके आज के रूप की कल्पना भी नहीं की होगी। यू-ट्यूब अब महज एक ऑनलाइन वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म नहीं रह गया है, यह अपने आप में सिनेमा है, यूनिवर्सिटी है जिसमें हर एक को काम की चीज मिल ही जाती है।
क्लासरूम बन रहा प्लेटफॉर्म
यू-ट्यूब शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति के रूप में सामने आया है। एक समय जहा पढ़ाई का मतलब पुस्तकालय और क्लासरूम हुआ करते थे वहीं अब सिलेबस से लेकर रोज़ाना की जानकारी तक सब कुछ यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। यू-ट्यूब पर अलग अलग विषयों से सम्बन्धित वीडियो तो काफी पहले से प्रचलित रहें हैं लेकिन पिछले कुछ समय से इसने पूरी तरह से क्लासरूम का रूप ले लिया है। छोटी से छोटी कक्षा से लेकर विश्वविद्यालयों के भारी भरकम लेक्चर तक सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध है।
यू ट्यूब यूनिवर्सिटी के नफे नुकसान
क्लासरूम के यू-ट्यूब पर आने के अपने फायदे नुकसान हैं। ज्ञान की सीमायें जहां एक तरफ क्लासरूम की सीमायें तोड़ कर विश्वव्यापी हो गयी हैं वहीं दूसरी ओर उसकी गुणवत्ता और प्रामाणिकता सदैव कटघरे में रहती है। यू-ट्यूब पर कक्षाएं लेने की शुरुआत कोचिंग कक्षाएं के विकल्प के रूप में शुरू हुई थी। इसके पहले बड़े-नामी व्याख्याताओं के वीडियो ही यूट्यूब पर देखने को मिलते थे जिनकी प्रामाणिकता पर संदेह नहीं होता था। लेकिन जब से कोचिंग कक्षाओं के नाम पर हर तरह के वीडियो यू-ट्यूब पर सामने आ रहे हैं, तब से उनकी उपयोगिता और प्रामाणिकता पर सवाल उठने लगे हैं। यू-ट्यूब कक्षाओं में एक जब आपका शिक्षक एक स्क्रीन होता है तब उसमें वो भावनात्मक जुड़ाव कम आ पाता है। ऑनलाइन कक्षाएं में छात्र को सिर्फ शिक्षक की सुननी होती है, अपने संशय वो कमेंट बॉक्स में लिख कर पूछ सकते हैं। लेकिन इस तरह की प्रक्रिया में सतत सवाल जवाब प्रक्रिया बाधित होती है।
स्कूल की कक्षाओं का विकल्प नहीं
यू-ट्यूब कक्षाएं परिपक्व छात्रों के लिए और उनके लिए जो विशेष विषय की पढ़ाई कर रहे या जो आमने-सामने की कक्षाओं में समय या धन के अभाव के कारण नहीं जा सकते, के लिए तो एक विकल्प हो सकता है। लेकिन ये आमने-सामने की कक्षाओं का विकल्प नहीं हो सकता। लॉक डाउन के समय अब तो कक्षा एक दो के विषय भी यू-ट्यूब पर आ गए हैं, ऐसे में शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य कैसे प्राप्त हो पायेगा, यह तो समय ही बतायेगा। छोटे बच्चे जिन्हें स्कूल के क्लास रूम में बैठा कर पढ़ना और समझाना ही अपने आप में एक चुनौती होती हैं, उन्हें इस तरह ऑनलाइन शिक्षा देना कितना सार्थक होगा, इस सवाल का जवाब समय देगा। ऑनलाइन कक्षाओं में सिर्फ शिक्षक को सुनते रहने से एकरसता सी होती है और साथ ही वीडियो में शिक्षक सहज नहीं होते क्योंकि सामने बोल कर पढ़ना और कैमरे के सामने पढ़ाना दोनों अलग बातें होती हैं, ज़रूरी नहीं है कि एक अच्छा शिक्षक एक अच्छा कैमरा-वक्ता हो। कैमरे का सामना करना अलग तरह की हुनर है, हरेक में यह हुनर हो, यह ज़रुरी नहीं है। इसके साथ ही ऑनलाइन कक्षाओं में छात्रों में अनुशासन की कमी भी होती है, क्लासरूम में जहां निश्चित समय के लिए बैठ कर पढ़ना होता है वहीं ऑनलाइन कक्षाओं में ना तो पूरे समय वहां बैठने का अनुशासन आता है और लगातार स्क्रीन पर देखने से उसका दुष्प्रभाव आंखों पर भी होता है। शिक्षा सिर्फ किताबों में लिखे शब्दों को कंठस्थ करना नहीं है, शिक्षा का अर्थ है उन शब्दों को आत्मसात करना और साथ ही साथ व्यक्तित्व का विकास करना और इसके लिए पारम्परिक शिक्षा प्रणाली में ही सुधार की आवश्यकता है ना कि ऑनलाइन शिक्षा को एक विकल्प के रूप में अपनाने की।
ऑनलाइन शिक्षा-गांव बनाम शहर
इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया-आईएएमएआई के अध्ययन के मुताबिक नवंबर 2019 में गांवों में सक्रिय इंटरनेट यूज़र्स की संख्या 22 करोड़ 70 लाख थी, शहरी क्षेत्रों में सक्रिय इंटरनेट यूज़र्स की संख्या 20 करोड़ 50 लाख थी। यानी गांवों में इंटरनेट यूज़र्स की संख्या शहरों के मुकाबले ज्यादा है। पर इस आंकड़े से इस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाज़ी होगी कि गांवों में ऑनलाइन शिक्षा के लिए ज़मीन तैयार है। यह जानने के लिए अर्थशास्त्री होना ज़रुरी नहीं है कि गांवों में तमाम क्षेत्रों में आधारभूत ढांचा शहरों के मुकाबले विपन्न स्थिति में है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में शहरों में आधारभूत ढांचा बहुत शानदार स्थिति में है। इसका मतलब यह है कि शहरों के मुकाबले गांव पीछे ही चलते हुए दिखायी देते हैं। शिक्षा के मामले में भी स्थिति अलग नहीं है। गांवों की शिक्षा के सामने ऑनलाइन होने में चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं। इसलिए शिक्षा को अधिकाधिक ऑनलाइन करते जाने की प्रक्रिया में गांवों की विशिष्ट स्थितियों को देखना समझना ज़रुरी है। शहरी स्कूलों के बच्चे जूम के जरिये पढ़ पा रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि गांवों के बच्चों तक भी जूम के ज़रिये उनके शिक्षक पहुंच रहे हैं। दूसरे शब्दों में, ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन शिक्षा के लिए सघन प्रशिक्षण की ज़रुरत पड़ेगी। इसकी तैयारियां को जितनी जल्दी किया जाये, उतना ही बेहतर है। गांव और शहर के बीच जो खाईयां हैं, ऑनलाइन शिक्षा के मामले में वो बहुत ज्यादा गहरी दिखायी देंगी।


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