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प्रशंसा का इंद्रजाल

Posted On June - 7 - 2020

महाराज ययाति ने दीर्घकाल तक राज्य किया था। अंत में सांसारिक भोगों से विरक्त होकर अपने छोटे पुत्र पुरु को उन्होंने राज्य दे दिया और स्वयं वन में चले गये। वन में कन्दमूल खाकर, क्रोध को जीत कर, वानप्रस्थाश्रम की विधि का पालन करते हुए पितरों एवं देवताओं को संतुष्ट करने के लिए वे तपस्या करने लगे। वे नित्य विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते। जो अतिथि आते उनका आदरपूर्वक कन्दमूल फल से सत्कार करते और स्वयं खेत में गिरे हुए अन्न के दाने चुनकर तथा वृक्ष से गिरे फल लाकर जीवन-निर्वाह करते।
इस प्रकार पूरे एक सहस्र वर्ष तप करने के बाद महाराज ययाति ने केवल जल पीकर तीस वर्ष व्यतीत कर दिये। फिर एक वर्ष तक केवल वायु के आहार पर रहे। उसके पश्चात एक वर्ष तक वे पंचाग्नि तापते रहे। अंत के छह महीने तो वायु के आहार पर रहकर एक पैर से खड़े होकर वे तपस्या करते रहे।
इस कठोर तपस्या के फल से राजा ययाति स्वर्ग पहुंचे। वहां देवताओं ने उनका बड़ा आदर किया। वे कभी देवताओं के साथ स्वर्ग में रहते और कभी ब्रह्मलोक चले जाते। उनका यह महत्व देवताओं की ईर्ष्या का कारण हो गया। ययाति जब कभी देवराज के भवन में पहुंचते, तब इंद्र के साथ उनके सिंहासन पर बैठते। देवराज इंद्र उन परम पुण्यात्मा को अपने से नीचा आसन नहीं दे सकते थे। परंतु इंद्र को बुरा लगता था। इसमें वे अपना अपमान अनुभव करते थे। देवता भी चाहते थे कि किसी प्रकार ययाति को स्वर्ग-भ्रष्ट कर दिया जाए।
एक दिन ययाति इंद्र-भवन में देवराज के साथ एक सिंहासन पर बैठे थे। इंद्र ने मधुर स्वर में कहा, आप तो महान पुण्यात्मा हैं। आपकी समानता भला कौन कर सकता है? मेरी यह जानने की बहुत इच्छा है कि आपने कौन-सा ऐसा तप किया है, जिसके प्रभाव से ब्रह्मलोक में जाकर वहां इच्छानुसार रह लेते हैं?
ययाति बड़ाई सुनकर फूल गये और वे इंद्र की मीठी वाणी के जाल में आ गये। वे अपनी तपस्या की प्रशंसा करने लगे। अन्त में उन्होंने कहा, इंद्र! देवता, मनुष्य, गन्धर्व और ऋषियों में कोई भी तपस्या में मुझे अपने समान दिखाई नहीं पड़ता।
बात समाप्त होते ही देवराज का भाव
बदल गया। कठोर स्वर में वे बोले, ययाति! मेरे आसन से उठ जाओ। तुमने अपने मुख से अपनी प्रशंसा की है, इससे तुम्हारे सब पुण्य नष्ट हो गये। देवता, मनुष्य, गन्धर्व, ऋषियों में किसने कितना तप किया है, यह बिना जाने ही तुमने उनका तिरस्कार किया, इससे अब तुम स्वर्ग से गिरोगे। आत्म-प्रशंसा ने ययाति के तप के फल को नष्ट कर दिया। वे स्वर्ग से गिर गये। उनकी प्रार्थना पर देवराज ने कृपा करके यह सुविधा उन्हें दे दी थी कि वे सत्पुरुषों की मंडली में ही गिरें।
(महाभारत)


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