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प्रभु से मिलाप का मार्ग प्रेम और श्रद्धा

Posted On June - 28 - 2020

संत राजिन्दर सिंह जी महाराज
प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा एक शब्दहीन अवस्था है। यह ऐसा अनुभव है जो आत्मा के स्तर पर ही किया जाता है। प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा, हमारी आत्मा के प्रभु से मिलाप का मार्ग है। जरूरत है इसे विकसित करने की। इसके लिए उन बाधाओं और हलचलों को दूर करना होगा, जो हमें इस अंतर्मुख वास्तविक अवस्था को पाने से रोकती हैं।
प्रेम और श्रद्धा वह रहस्यमयी कुंजी है जिससे हमारी आत्मा का मिलाप परमात्मा से हो सकता है। प्रभु प्रेम हैं और हमारी आत्मा भी प्रेम है। दोनों के बीच मध्यस्थता का पुल भी प्रेम है। इस पर चलने के लिए, प्रभु की ज्योति और श्रुति से संपर्क के लिए, मदद करता है ध्यान-अभ्यास। यह कोई भौतिक प्रक्रिया नहीं है, क्योंकि भौतिक विज्ञान तो भौतिक संसार के नियमों के अनुसार कार्य करता है। प्रभु, आत्मा, ज्योति एवं श्रुति चेतन हैं, इस भौतिक जगत से परे हैं। जब हम अंतर्मुख ज्योति और श्रुति की धारा के साथ जुड़ते हैं, तब हमारी आत्मा इस धारा पर सवार होकर प्रभु के पास पहुंच जाती है। इसी तरह प्रेम भी भौतिक अवस्था नहीं है। यह आत्मा की अवस्था है। दिव्य प्रेम आत्मा की, परमात्मा की, ज्योति और श्रुति की अवस्था है। जब हम ध्यान-अभ्यास करते हैं, हम दिव्य प्रेम की अवस्था में लीन हो जाते हैं। हमारा उस अवस्था में लीन होना ही श्रद्धा है।
फिर वह क्या है जो हमें इस प्रेम से दूर रख रहा है? हमारा मन और अहंकार जो लगातार हस्तक्षेप कर रहे हैं, ताकि हम उस दिव्य प्रेम से न जुड़ पाएं। वे लोग जिनके पास सोचने के लिए बहुत कुछ होता है, उन्हें मन को शांत करना मुश्किल लगता है। अगर हम अपनी सांस और दिल की धड़कन में प्रेम और श्रद्धा का विकास कर सकें, तो हम प्रभु की गोद में वापस पहुंच जाएंगे।
ध्यान-अभ्यास की सफलता प्रभु के प्रति हमारे प्रेम और श्रद्धा पर निर्भर करती है। जितना अधिक हम अंतरीय ज्योति और श्रुति पर ध्यान टिकाते हैं, उसमें डुबकी लगाते हैं, उतना ही अधिक प्रभु-प्रेम हमारे भीतर हिलोर मारता है। समय के साथ, हम प्रभु के प्रेम की सराहना करने लगते हैं। अंततः जब हम प्रभु के प्रति प्रेम विकसित करते हैं, तो ध्यान-अभ्यास के निर्देशों को गंभीरता से लेते हैं। जब हम ऐसा करते हैं, हम अपनी रूहानी तरक्की में परिणाम देखना शुरू करते हैं। हम उस बिन्दु पर पहुंच जाते हैं, जहां अपने मन और अहंकार से उपजी इच्छाओं के बजाय प्रभु से अधिक प्रेम करते हैं। हम प्रभु के प्रति आकर्षित हो जाते हैं और आध्यात्मिक तरक्की करते हैं। हमें सिर्फ प्रभु के प्रति प्रेम व श्रद्धा विकसित करने की आवश्यकता है। आइए! हम ध्यान-अभ्यास, निष्काम सेवा एवं स्वयं में सद‍्गुणों का विकास करके प्रभु के प्रति अपना प्रेम और श्रद्धा दर्शाएं।


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